कोविड-19 संक्रमण से उबरने के बाद कई लोग लंबे समय तक तमाम लक्षणों से जूझ रहे हैं। इसे दीर्घ कोविड कहा जाने लगा है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की तंत्रिका वैज्ञानिक एथेना अक्रामी ने 3,500 से अधिक लोगों पर किए अध्ययन में दीर्घ कोविड के 205 लक्षण पाए हैं। इनमें थकान, सूखी खाँसी, सांस में तकलीफ, सिरदर्द और मांसपेशीय दर्द वगैरह शामिल हैं। थकान, काम के बाद अस्वस्थता और संज्ञानात्मक विकार जैसे लक्षण छह महीने तक बने रहे। वैसे लक्षणों की तीव्रता लगातार एक जैसी नहीं रहती, लोग बीच-बीच में थोड़ा बेहतर महसूस करते हैं।
महामारी की शुरुआत
में गंभीर मामलों से निपटने की प्राथमिकता में दीर्घ कोविड की अनदेखी हुई। लेकिन
मई 2020 में, पीड़ितों का एक
फेसबुक ग्रुप बना जिसमें वर्तमान में 40,000 से अधिक लोग जुड़े हैं।
अब दीर्घ कोविड
सार्वजनिक-स्वास्थ्य समस्या के रूप में पहचाना जा चुका है। जनवरी में WHO ने कोविड-19 उपचार के दिशानिर्देशों में
जोड़ा है कि दीर्घ कोविड के मद्देनज़र कोविड-19 के रोगियों की संक्रमण उपरांत देखभाल
तक पहुँच होनी चाहिए।
कई फंडिंग एजेंसियाँ
भी दीर्घ कोविड के विभिन्न अध्ययनों को
वित्तीय समर्थन देने के लिए आगे आई हैं। यूके बायोबैंक ने स्व-परीक्षण किट उपलब्ध
कराने की योजना बनाई है ताकि कोविड-19 से संक्रमितों की पहचान की जा सके और उन्हें
अध्ययनों में शामिल किया जा सके।
दीर्घ कोविड से
सम्बंधित चार बड़े सवालों पर नेचर पत्रिका ने प्रकाश डालने की कोशिश की है।
दीर्घ कोविड कितने
लोगों में होता है, कौन
अधिक जोखिम में है?
फिलहाल पक्के तौर
पर यह नहीं कहा जा सकता कि यह कुछ ही लोगों को क्यों होता है और अधिक जोखिम किसे
है। अधिकांश शुरुआती अध्ययन उन लोगों पर ही हुए थे जो गंभीर कोविड-19 के कारण
अस्पताल में भर्ती हुए थे। कोलंबिया युनिवर्सिटी इरविंग मेडिकल सेंटर की
कार्डियोलॉजिस्ट अनी नलबंडियन और उनके साथियों ने नौ अध्ययनों के आधार पर पाया कि
कोविड-19 से उबरने के बाद 32.6 से 87.4 प्रतिशत रोगियों में कम से कम एक लक्षण कई
महीनों तक बना रहता है।
लेकिन वास्तव में
कोविड-19 से संक्रमित अधिकांश लोग इतने बीमार नहीं पड़ते कि उन्हें अस्पताल में
भर्ती होना पड़े। ऐसे लोग अध्ययनों से छूट जाते हैं। इसलिए यूके के राष्ट्रीय
सांख्यिकी कार्यालय (ONS)
ने अप्रैल 2020 के बाद से कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए 20,000 से अधिक लोगों पर नज़र
रखी। ONS ने पाया कि उबरने के 12 हफ्ते बाद भी 13.7 प्रतिशत
लोगों ने कम से कम एक लक्षण अनुभव किया। आम तौर पर संक्रमण मुक्त होने के बाद 4
हफ्ते से अधिक समय तक लक्षण बने रहते हैं तो इसे दीर्घ कोविड कहा जाता है। पुरुषों
की तुलना में महिलाओं में यह स्थिति अधिक दिखती है - 23 प्रतिशत महिलाओं और 19
प्रतिशत पुरुषों में संक्रमण के पाँच सप्ताह बाद भी लक्षण मौजूद थे।
इसके अलावा अधेड़
लोगों में भी इसका जोखिम अधिक है। ONS के अनुसार, 35 से 49 वर्ष की आयु के 25.6 प्रतिशत
लोगों में पाँच सप्ताह बाद भी लक्षण बरकरार थे। युवाओं व वृद्ध लोगों में ये कम
दिखे। हालांकि अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि बुज़ुर्गों में दीर्घ कोविड कम दिखने
की एक वजह यह हो सकती है कि अधिकतर संक्रमित बुज़ुर्गों की मृत्यु हो जाती है। 2-11
वर्ष के लगभग 10 प्रतिशत संक्रमित बच्चों में पाँच सप्ताह बाद भी लक्षण दिखे हैं।
अभी तक की समझ के
आधार पर, अधिक जोखिम में कौन है इसका पूर्वानुमान
करने में उम्र, लिंग और संक्रमण के पहले सप्ताह में लक्षणों
की गंभीरता महत्वपूर्ण लगते हैं।
लेकिन कई
अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं। खासकर यह स्पष्ट नहीं है कि दीर्घ कोविड से महज 10
प्रतिशत लोग ही क्यों प्रभावित होते हैं?
लेकिन यदि मात्र 10 प्रतिशत लोग भी प्रभावित होते हैं, तो भी यह आंकड़ा लाखों में होगा।
दीर्घ कोविड क्यों
होता है?
अध्ययनों में देखा
गया है कि कुछ हफ्तों बाद यह वायरस शरीर से लगभग खत्म हो जाता है इसलिए यह संभावना
तो कम है कि संक्रमण ही इतना लंबा चल रहा है। लेकिन वायरस के अवशेष (जैसे प्रोटीन
अणु) ज़रूर महीनों तक शरीर में बने रह सकते हैं। भले ही ये अवशेष कोशिकाओं को
संक्रमित न करें, लेकिन
हो सकता है कि वे शरीर के कामकाज में कुछ बाधा डालते हों।
इसके अलावा एक
संभावना यह है कि दीर्घ कोविड प्रतिरक्षा प्रणाली के अति सक्रिय होने और शरीर के
बाकी हिस्सों पर हमला करने की वजह से होता है। यानी दीर्घ कोविड एक ऑटोइम्यून
बीमारी हो सकती है। अलबत्ता, यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि इनमें से कौन-सी परिकल्पना सही है। यह भी हो
सकता है कि अलग-अलग लोगों के लिए कारण अलग-अलग हों।
इसके कारण को बेहतर
समझने के लिए पोस्ट हॉस्पिटलाइज़ेशन कोविड-19 स्टडी (PHOSP-COVID) के तहत
यूके के 1000 से अधिक रोगियों के रक्त के नमूनों में शोथ, हृदय
सम्बंधी समस्याओं और अन्य परिवर्तनों का पता लगाया जा रहा है। इसके अलावा, शोधकर्ताओं के एक दल ने कोविड-19 से पीड़ित 300 लोगों के हर चार महीने के
अंतराल पर रक्त और लार के नमूने लेकर उनमें शोथ, रक्त का
थक्का बनाने वाली प्रणाली में बदलाव और वायरस की मौजूदगी के प्रमाण तलाशे। अध्ययन
में उन्होंने रक्त में साइटोकाइन्स (जो प्रतिरक्षा का नियमन करते हैं) का स्तर
परिवर्तित पाया। इससे लगता है कि प्रतिरक्षा प्रणाली असंतुलित थी। इसके अलावा ऐसे
प्रोटीन संकेतक भी मिले जो तंत्रिका तंत्र सम्बंधी विकार की ओर इशारा करते हैं।
शोधकर्ता इस काम में मशीन लर्निंग की भी मदद ले रहे हैं।
इसी कड़ी में PHOSP-COVID अध्ययन में
शामिल रेचेल इवांस और उनके साथियों ने अपने अध्ययन में कोविड-19 से संक्रमित हो
चुके 1077 लोगों में शारीरिक दुर्बलता, दुश्चिंता जैसी
मानसिक-स्वास्थ्य सम्बंधी तकलीफों और संज्ञानात्मक क्षति को जांचा। उन्होंने इसमें
उम्र और लिंग जैसी बुनियादी जानकारी शामिल की और जैव रासायनिक डैटा (जैसे
सी-रिएक्टिव प्रोटीन) का स्तर भी रिकॉर्ड किया। गणितीय विश्लेषण की मदद से देखा
गया कि क्या एक जैसे लक्षण वाले रोगियों के समूह दिखाई देते हैं? कोविड-19 की गंभीरता, या अंगों की क्षति के स्तर और
दीर्घ कोविड की गंभीरता के बीच बहुत कम सम्बंध पाया गया।
विश्लेषण में दीर्घ
कोविड के भिन्न-भिन्न लक्षणों वाले चार समूहों की पहचान हुई। तीन समूहों में
अलग-अलग स्तर की मानसिक और शारीरिक दुर्बलता थी, जबकि संज्ञानात्मक समस्या नहीं या बहुत कम थी। चौथे समूह के
लोगों में मध्यम स्तर की मानसिक और शारीरिक दुर्बलताएँ थी, लेकिन
संज्ञानात्मक समस्याएँ अत्यधिक थीं।
क्या यह
संक्रमण-उपरांत लक्षण है?
कुछ वैज्ञानिक के लिए दीर्घ कोविड की स्थिति कोई हैरत की बात नहीं थी। संक्रमण ठीक होने के बाद लंबे समय तक लक्षण बने रहना कई मामलों में देखा गया है। दरअसल मायेल्जिक एन्सेफलाइटिस या क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम (ME/CFS
) वायरस संक्रमणों के बाद उपजी एक स्थिति है जिसमें लोग सिरदर्द, थोड़े से काम के बाद काफी थकान जैसे लक्षणों का अनुभव करते हैं।वायरस या
बैक्टीरिया से संक्रमित हो चुके 253 लोगों पर हुए एक अध्ययन में देखा गया था कि
लगभग 12 प्रतिशत लोगों में 6 महीने बाद भी थकान, मांसपेशीय-कंकालीय दर्द, तंत्रिका
सम्बंधी समस्या और मनोदशा में गड़बड़ी जैसे लक्षण मौजूद थे। यानी दीर्घ कोविड
संक्रमण-उपरांत लक्षण हो सकता है।
लेकिन दीर्घ कोविड
के लक्षण ME/CFS से काफी
अलग हैं। उदाहरण के लिए दीर्घ कोविड वाले लोगों में सांस की तकलीफ ME/CFS वाले लोगों की तुलना में अधिक दिखती है।
क्या किया जा सकता
है?
चूंकि इस विकार को
अभी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है इसलिए उपचार/मदद सम्बंधी विकल्प काफी सीमित हैं।
जर्मनी, इंगलैंड वगैरह कुछ देशों में दीर्घ कोविड
से पीड़ित लोगों के लिए क्लीनिक खोले जा रहे हैं। यह एक अच्छी पहल है, लेकिन इस विकार से निपटने के लिए कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों की ज़रूरत है
क्योंकि दीर्घ कोविड शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित करता है। दीर्घ कोविड से
पीड़ित हर व्यक्ति में औसतन 16-17 लक्षण दिखाई देते हैं, लेकिन
अक्सर क्लीनिकों में सभी के उपचार की व्यवस्था नहीं होती।
इसकी सामाजिक और
राजनीतिक चुनौती सबसे बड़ी है। दीर्घ कोविड से जूझ रहे लोगों को आराम की ज़रूरत है, अक्सर कई महीनों तक वे बहुत काम नहीं कर
सकते और ऐसे में उन्हें सहयोग की आवश्यकता है। खास तौर से श्रमिक वर्ग के लिए यह
एक बड़ी चुनौती हो सकती है। एक सुझाव है कि उनकी स्थिति को विकलांगता के रूप में
पहचाना जाना चाहिए।
कुछ लोग इसकी दवा
खोजने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। यूके के HEAL-COVID
नामक अध्ययन का उद्देश्य दीर्घ कोविड की स्थिति बनने से रोकना है। इसमें कोविड-19
के अस्पताल में भर्ती रोगियों को ठीक होने के बाद विशिष्ट दवाइयाँ दी जाएँगी।
और अंत में यह सवाल
कि कोविड-19 के टीके इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं? बेशक ये टीके कोविड-19 के खिलाफ कारगर हैं
लेकिन क्या वे दीर्घ कोविड से भी बचाव करते हैं?
हालिया अध्ययन में
दीर्घ कोविड से पीड़ित 800 लोगों पर टीके के प्रभाव जाँचे गए। इनमें से 57 प्रतिशत
लोगों के लक्षणों में सुधार दिखा, 24 प्रतिशत में कोई परिवर्तन नहीं दिखे और 19 प्रतिशत लोगों की हालत टीके
की पहली खुराक के बाद और बिगड़ गई। अनुमान है कि यदि संक्रमण पश्चात वायरस के कुछ
अवशेष शरीर में छूट भी गए हैं तो टीका उनका खात्मा कर सकता है या प्रतिरक्षा
प्रणाली में आए असंतुलन को ठीक कर सकता है।
कुल मिलाकर दुनिया भर के शोधकर्ता दीर्घ कोविड को समझने और लोगों को उससे उबारने की जद्दोजहद में हैं। (स्रोत फीचर्स)
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