June 06, 2020

पिगसन हिंग्लिश स्कूल

पिगसन हिंग्लिश स्कूल
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
बहुत पहले श्री डंडीमार चोकरवाला भूसा-टाल चलाया करते थे। भूसे में कूड़ा-कचराकंकड़-पत्थर मिलाकर अच्छी-खासी बिक्री हो जाया करती थी। संयम का जीवन जीते थे। चार पैसे हाथ में हो गए। पैसे का क्या जोड़नाखली खाना,कम्बल ओढ़ना। पैसे पास में होंतो मूर्ख आदमी भी समझदारी की बातें करने लगता है। डंडीमार की बुद्धि निखरने लगी। सोचाभूसा-टाल चलाने में एक दिक्कत है। भूसे की धूल दिन भर नाक में घुसती रहती हैछींकते-छींकते इतना बुरा हाल हो जाता है कि नाक को जड़ से कटवाने की बात मन में उठने लगती है। क्यों न कोई स्कूल खोला जाए। भूषा बेचने से स्कूल चलाना ज्यादा आसान है। समस्या थी अच्छी जगह की। भूसा-टाल में स्कूल नहीं चल सकतागाय-बकरी बाँधी जा सकती है। वैसे तो कई स्कूल भूसा-टालसे भी बदतर जगहों में चल रहे हैं। डंडीमार के दिमाग में बिजली-सी कौंध गई। दिमाग के भूसे में चिंगारी-सी सुलग उठी। टाल के बराबर वाला सरकारी गोदाम खाली पड़ा है। सरकार सबकी होती हैपर सरकार का कोई माई-बाप नहीं होता। सरकारी सम्पत्ति हड़पने का आनन्द ही कुछ और होता है। हाजमा दुरुस्त हो जाता हैसरकार चुस्त हो जाती है। दिल कड़ा करके डंडीमार ने सरकारी गोदाम का ताला तोड़ डाला। ताला टूटने का पता सिर्फ़ ताले को ही चलासरकार को बिल्कुल नहीं। यह रोमांचित कर देने वाला कृत्य था।
पम्फलेट छपने थे। टीचर्स रखने थे। एडमिशन करने थे। समाज में जाग्रति लानी थी। सबसे पहले समस्या आई स्कूल के नाम की। आरोपित बुद्धिजीवियों के लिए नामकरण का कार्य सर्वाधिक कठिन है। इंग्लिश नाम का अपना महत्त्व है। इंग्लिश स्कूल से मतलब जहाँ अमीर माँ-बाप के बच्चे पढ़ते हैं। अमीर लोग पहाड़ों पर घूमने जाते हैं। पहाड़ उनका बहुत आभार मानते हैं। जहाँ पहाड़ होते हैंवहाँ गर्मी कम होती है। बड़े लोगों को गर्मी बहुत लगती हैइसीलिए वे विदेशों में भी घूमने जाते हैं। स्कूल के लिए बहुत सारे नाम स्मृति-पटल पर उभरेजैसे-अपहिलडाउनहिलनीदरलैंड,फाकलैंडग्रीनलैंडलोलैंडनो मैंसलैंड तथा साथ में हिंग्लिश (हिंदी और इंग्लिश से बना चूरन) स्कूलपरन्तु एक भी नाम डंडीमार को नहीं जँचा। मैट्रिक तक पढ़े गए दो-चार शब्द उन्हें अभी तक याद थे।
इसी बीच ऊधम मचाता हुआ उनका बच्चा बंटी घर में घुसा। ऊधम मचाना डंडीमार को सख्त नापसंद था। उन्होंने शाकाहारी भाषा का प्रयोग करते हुए उसको डाँटा सुअर के बच्चे आराम से रहना नहीं सीख सकता।बस इतना कहना था कि उनके ज्ञान-चक्षु खुल गए। सुअर का बच्चा अर्थात् सुअर माने पिग तथा बच्चा अर्थात् बेटा माने सन। पिगसन हिंग्लिश स्कूलडंडीमार उछल पड़े। एकदम बेजोड़ नाम। अब आएगा मज़ा। बड़े लोगों के बच्चे आएँगे एडमिशन लेने। मोटी फ़ीस दुही जा सकती है। साल भर में पैसा उलीचने के बहुत सारे अवसर हैं। कभी पिकनिक के नाम परकभी एग्जामिनेशन के नाम परकभी प्रदर्शनी के नाम परकभी बर्थ डे के नाम परकभी डोनेशन के नाम पर।
डंडीमार ने पहला काम कियाअपनी मैट्रिक फेल की मार्कशीट फाड़कर पूरी तरह उसकी भूसी छुड़ा दी। पम्फलेट बँटने लगे-
बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनाना हो तो पिगसन हिंग्लिश स्कूलमें प्रवेश दिलवाइए। जो इंग्लिश जानता हैवही उच्चवर्ग में आ सकता है। निम्न वर्ग का कोई वर्ग नहीं होताक्योंकि नीचे सिर्फ जमीन होती है। वर्ग से ही स्वर्ग बनता है,जिसे स्वर्ग में जाना होउसे हिंग्लिश स्कूल में पढ़ना चाहिए। चुने हुए अध्यापकों की देखरेख में चूना लगवाइए और अपने बच्चों के भविष्य की दीवार को चूने से पुतवाइए। इसी चमक के भरोसे के साथ-डंडीमार एम-ए-एम-फिल-बिल-बिल-, खिल-खिल.... पिगसन हिंग्लिश स्कूल
पम्फलेट बँटने का असर हुआ। बच्चों के आने से पहले टीचर्स बनने के इच्छुक लोग जमा हुए। जो हज़ार रुपये माहवार में काम करने को तैयार थेउन्हें टीचर बना दिया गया। और कुछ हो या न होटीचर का टीचरने का खर्च तो निकल ही जाएगा। कुछ दिनों के बाद गार्जियन भिनभिनाने लगे। डंडीमार गुर्राने लगे। सिफारिशें गिजबिजाने लगीं। दोहन-कार्य शुरू हो गया। जो हिन्दी पढ़ते हैंवे गरीब या गँवार होते हैं। या यों कहिए कि जो देसी भाषा पढ़ते हैंवे स्वर्गवासी नहीं बन सकते। उनके लिए यहाँ और वहाँ नरक बने हुए हैं।
यूनिफार्म पहनकर उनींदे बच्चे स्कूल आने लगे। माता-पिता उनको छोड़कर जाते और छुट्टी के वक्त लेने के लिए आते। इनके साथ कभी-कभी उनके पालतू कुत्ते भी आते। क्यों न आते! कुलीन कुत्तों का जीवन गली के कुत्तों से अलग-थलग होता है।
अब डंडीमार के छुहारे जैसे गालों की सारी सलवटें दूर हो गईं। टीचर फॉर एप्पल पढ़ाने लगे। ह्ज़ार रुपये मिलते थे। अतः धनराशि की मर्यादा का ध्यान रखते हुए - जॉन डज नॉट रीडिंगआई एम गो जैसी व्याकरण सम्मत इंग्लिश पढ़ाये जाने लगी। घर में बच्चों की मम्मी लोग बड़े  प्रेम से हाथ वाश करोनोज पोंछ लोहोमवर्क फिनिश करो जैसी इंग्लिश बोलने में पारंगत हो गइंर्। स्कूल में कॉपियाँ एवं किताबें परिवर्तित एवं संशोधित मूल्यों पर मिलने लगीं। पापा-मम्मी खुश हो गए। पिगसन हिंग्लिश स्कूलमें पढ़ने के कारण उनके बच्चे डर्टीबच्चों से दूर रहने लगे। वे कल्चर सीखने लगे और कल्चर को एग्रीकल्चर की तरह ही बोने और काटने लगे।

3 Comments:

शिवजी श्रीवास्तव said...

"भूषा बेचने से स्कूल चलाना ज्यादा आसान है"--कुकुरमुत्तों की तरह जगह जगह दिखने वाले अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों पर कटाक्ष करता सशक्त व्यंग्य।आदरणीय काम्बोज जी की इस शैली से अब तक अपरिचित था।बहुत बहुत बधाई

bhawna said...

सटीक सशक्त व्यंग्य।

नारायण सिंह निर्दोष said...

सटीक व समसामयिक व्यंग्य। बधाई।

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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