November 24, 2012

छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक



छत्तीसगढ़ की साहित्यिक
यात्रा का सफल रेखांकन
'छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक' प्रो. अश्विनी केशरवानी की नवीनतम कृति है। इस पुस्तक में उन्होंने 31 साहित्य साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपनी लेखनी चलायी है। पुस्तक में संगृहीत साहित्यकार आज हमारे बीच नहीं हैं। कुछ चर्चित थे और अधिकतर को बहुत कम लोग जानते थे। इस पुस्तक के प्रकाशन से निश्चित रूप से उन्हें पढ़ा जाएगा। कदाचित् इसीलिए डॉ. बाबूलाल शुक्ल ने भूले बिसरे साहित्यकारों को याद करना अपनी परंपरा की पहचान के साथ ऋण शोध भी माना है। उनका यह भी मानना उचित है कि वर्तमान की सही पहचान के लिए अतीत की साझेदारी आवश्यक है।
भारतेन्दुकाल में काशी एक साहित्यिक केंद्र था और उसका नाभिकेंद्र भारतेन्दु हरिश्चंद्र थे। उन्होंने तब यहाँ  'भारतेन्दु मंडल'  एक साहित्यिक संस्था बनायी थी। ठीक इसी प्रकार दूसरा साहित्यिक केंद्र छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण में था जिसका नाभिकेंद्र ठाकुर जगमोहन सिंह थे। वे न केवल भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी और मित्र थे बल्कि एक उच्च कोटि के कवि, आलोचक और साहित्यकार थे। उन्होंने शिवरीनारायण में 'भारतेन्दु मंडल ' की तर्ज में 'जगन्मोहन मंडल'  बनाकर यहाँ के बिखरे साहित्यकारों को न केवल एकत्रित किया बल्कि उन्हें लेखन की दिशा भी दी। इसके पहले यहाँ साहित्यिक प्रतिभाएँ राज्याश्रय में थी। पं. माखन मिश्र, बाबू रेवाराम, पं. प्रहलाद दुबे, पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय ऐसे कवि थे इसलिए उनकी रचनाओं में उन राज्यों की झलक दिखाई देती है। अनेक साहित्यकारों ने स्वतंत्र लेखन किया है। इसलिए उनकी रचनाओं में भक्ति रस, वीर रस के साथ सौंदर्य रस का पान किया जा सकता है। कुछ साहित्यकारों ने लोक साहित्य और वाचिक परंपरा को लिपिबद्ध किया है तो कुछ ने साहित्य, इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में भी लेखन किया है।
पुस्तक में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों की हिन्दी साहित्य में उपेक्षा की चर्चा की गयी है। वाकई हिन्दी साहित्य के इतिहास में यहाँ के कवियों का नामोल्लेख न होना दुखद तो है ही मगर इसके लिए उनकी रचनाओं का हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों को उपलब्ध न होना प्रमुख कारण माना जा सकता है। यह भी हो सकता है कि उन्हें छत्तीसगढ़ जैसे वनांचल और सर्वाधिक पिछड़े प्रांत में ऐसे लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों के होने की सूचना नहीं रही होगी और उन्होंने उनकी बिना खोज खबर किये हिन्दी साहित्य का इतिहास लिख डाला हो? लेकिन पंडित लोचन प्रसाद पांडेय के प्रयास से अन्यान्य साहित्यकारों की रचना प्रकाशित हो सकी थी। उन्होंने इतिहास, पुरातत्व और साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया है। लेकिन उनका जीवन परिचय लिखने का सत्कार्य श्री प्यारेलाल गुप्त ने किया है। पं. अमृतलाल दुबे ने वाचिक परंपरा के गीतों को सस्वर लेखबद्ध करने का स्तुत्य कार्य किया है।
इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ के रीतिकालीन कवि पं. गोपाल मिश्र, बाबू रेवाराम और पंडित प्रहलाद दुबे, भारतेन्दु कालीन रचनाकारों में ठाकुर जगमोहन सिंह, पं. अनंतराम पांडेय, पं. मेदिनी प्रसाद पांडेय, पं. हीराराम त्रिपाठी, पं. मालिकराम भोगहा, पं. पुरुषोत्तम प्रसाद पांडेय, जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'  गोविंद साव और महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के अन्यान्य उच्च कोटि के साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतिव को रेखांकित किया है। प्यारेलाल गुप्त, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र, राजा चक्रधर सिंह चर्चित व्यक्तित्व थे लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित कवियों में भवानी शंकर षडंगी, डॉ. लोचनप्रसाद शुक्ल, चिरंजीव दास, कपिलनाथ कश्यप, पं. किशोरीमोहन त्रिपाठी पर भी कलम चलायी गयी है। कुछ अन्यान्य साहित्यकारों को सम्मिलित किया जाना उचित होता मगर लेखक के इस विचार से सहमत हुआ जा सकता कि पुस्तक की सीमा को ध्यान में रखा गया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस पुस्तक के लेखक प्रो. अश्विनी केशरवानी महाविद्यालय में विज्ञान के प्राध्यापक हैं लेकिन उनकी इतिहास, साहित्य और छत्तीसगढ़ की परंपराओं में गहरी अभिरुचि के कारण अभी तक विभिन्न विधाओं में उनकी छ: पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। इस पुस्तक के प्रकाशन में संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन का सहयोग मिलना सुखद है। कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है।
                                                - समीक्षक: प्रांजल कुमार
   वेन, न्यू जर्सी यू. एस. ए. Email i.d. - pranjal.k@tcs.com  

पुस्तक- छत्तीसगढ़ के साहित्य साधक
लेखक- प्रो. अश्विनी केशरवानी
प्रकाशक- श्री प्रकाशन, आदर्श नगर दुर्ग
मूल्य  - तीन सौ रुपये मात्र

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष