April 21, 2012

एक पातीः 'कहि देबे संदेश' विशेषांक पर

एक अतीत कथा 

का पुनर्जीवन

- विनोद साव
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से निकलने वाली मासिक पत्रिका 'उदंती' को अगर प्रोडक्शन के हिसाब से हम देखें तो लगता है कि यह देश की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका है जिसके हर अंक का कलेवर, चित्रांकन, मुद्रण और संपादन इतना मनोहारी बन पड़ता है कि अपनी पहली झलक में यह पत्रिका एक खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड होने का भान कराती है। ऐसा लगता है कि उदंती हर बार अपने पाठकों के पास अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ पहुंच रही है। छत्तीसगढ़ की अस्मिता के लिए रोज- रोज हल्ला करने वाले बुद्धिजीवी इस बात की ओर भी ध्यान दें कि उनके इस नये राज्य में साहित्य और विचार की पत्रिका का कितना अभाव है... और इन स्थितियों में उदंती जैसी कोई एक पत्रिका अपने नितांत निजी संघर्षों के बल पर इस तरह छटा बिखेर रही है तो यह उसके संपादक का कितना उत्तर-दायित्वपूर्ण उपक्रम है। इसे तो छत्तीसगढ़ के लेखकों-पाठकों और सरकार का पुरजोर समर्थन मिलना चाहिए।
बहरहाल, हम इस बात की चर्चा करें कि अपनी कई कोशिशों के बीच विगत फरवरी माह के अंक में उंदती ने इस बात की कोशिश की है कि छत्तीसगढी़ की पहली फिल्म 'कहि देबे सन्देस' की व्यथा कथा को प्रस्तुत किया जाए। यह संग्रहणीय अंक है जिसने एक अतीत बन चुकी कथा को पुनर्जीवित किया है। इसमें संपादक डॉ. रत्ना वर्मा के साथ मोहम्मद जाकिर हुसैन  ने छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म के निर्माण, इतिहास और उसकी जद्दोजहद को आलेखबद्ध किया है। इसमें फिल्म निर्माता मनु नायक, गीतकार डॉ. हनुमंत नायडू, संगीतकार मलय चक्रवर्ती, गायक मोहम्मद रफी, महेन्द्र कपूर, मन्नाडे, सुमन कल्याणपुर आदि पर अलग- अलग आलेखों में अनेक ज्ञानवद्र्धक सामग्रियां दी गई हंै। उस समय निर्देशक मनु नायक को फिल्म की शूटिंग के दौरान होने वाली दुविधाओं से उबारकर किस तरह तत्कालीन सांसद बृजलाल वर्मा ने अपने गांव पलारी में उन्हें सुविधाएं मुहैया करवाई इन सबकी जानकारी दी गई है। बृजलाल वर्मा, खूबचंद बघेल, रामचंद्र देशमुख, मंदराजी साव अपने समय के न केवल समृद्ध मालगुजार थे बल्कि ये बड़े कलाप्रेमी और विचारवान लोग थे जिन्होंने अपने समय की कला का कई तरह से उन्नयन किया, अनेक कलाकारों को परखा समझा और उन्हें मंच दिया।
उदंती के इस अंक ने मुझे भी अतीत के उस दौर में पहुंचा दिया जब इस फिल्म का 1964 में पहला प्रदर्शन हुआ था। तब हर नयेपन के प्रति सचेत रहने वाली अपनी अम्मां उर्मिला साव और शिक्षाविद् बाबूजी अर्जुनसिंह साव के साथ इस फिल्म को दुर्ग में देखा था। तब मैं प्रायमरी स्कूल का छात्र था पर इस फिल्म के 'पोएटिक पिक्चराइजेशन' ने मेरे बाल मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी थी। बड़े होने के बाद जब साहित्य जगत में थोड़ी पहचान बनी तब मनु नायक से रामचंद्र देशमुख के घर बघेरा में भेंट हुई थी। दूसरी बार वे प्रेम साइमन के साथ मिले थे। इस फिल्म के गीतकार डॉ. हनुमन्त नायडू बाबूजी के मित्र थे। वे दुर्ग निवासी थे पर उनसे नागपुर में पहली भेंट उनके घर में हुई थी जब वे वहां प्राध्यापक थे। मैंने उनका साक्षात्कार लिया था जिसे प्रसिद्ध पत्रकार राजनारायण मिश्र ने छापा था।
यह फिल्म निदेशक मनु नायक की पहली प्रस्तुति थी जो एक समाजोत्तेजक फिल्म बन गई थी। इसने समाज की संकीर्ण जातीयता को अपनी कथा के केंद्र में रखा था। अपनी सीमित सुविधाओं, आरंभिक प्रयासों और कुछ अनावश्यक दबावों के कारण फिल्म में कई खामियां उभरकर आई थीं लेकिन मलय चक्रवर्ती के मनमोहक संगीत और मोहम्मद रफी जैसे सुरीले गायकों के कारण यह फिल्म हिट हो गई थी और लम्बे समय तक सिनेमा हालों में बार- बार प्रदर्शित होती रही थीं। मध्य प्रदेश शासन के पंचायत एवं समाजसेवा विभाग द्वारा भी इस फिल्म का प्रदर्शन गांव- गांव में किया जाता था। बरसों पहले दिल्ली दूरदर्शन ने इसे रविवार की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल कर इसे दिखाया था।
इस फिल्म के लोकेशन्स और उनका फिल्मांकन भी इसके सशक्त पक्ष रहे हैं। बलौदाबाजार से पन्द्रह किलोमीटर पहले पडऩे वाले गांव पलारी में इसकी शूटिंग की गईं। पलारी गांव का बालसमुंद तालाब फिल्मांकन के केंद्र में है। यह समुद्र की तरह दिखने वाला संभवत: छत्तीसगढ़ का सबसे विराट तालाब है। फिल्म में तालाब के हर हिस्से को बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। तब तालाब के घाट पर एक विशाल तुलसी चौरा हुआ करता था जिस पर 'बिहनिया के उगत सुरुज देवता' जैसे मधुर गीत को फिल्माया गया था, जिसे सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया था। यह अपने मधुर गीतों और बालसमुन्द तालाब तट के मोहक दृश्यों के कारण एक दर्शनीय फिल्म बन गई थी।
छत्तीसगढ़ शासन को चाहिए कि वह फिल्म डिवीजन या एसोसिएशन जैसे किसी संगठन के माध्यम से इस पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म का रि-प्रिन्ट बनवा का उसे सुरक्षित रखे। साथ ही पलारी के उस विराट तालाब 'बालसमुन्द' और उसके किनारे स्थित 9 वीं सदी के पुरातन सिद्धेश्वर मंदिर की भव्यता को रख उसमें पर्यटन की संभावनाओं को तलाशे।
संपर्क-  मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो. 09407984014
       vinod.sao1955@gmail.com

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ब्लॉग बुलेटिन का स्वागत

उदंती के फरवरी अंक से आरंभ ब्लॉग बुलेटिन  स्तंभ स्वागतेय है। 'लहरें... एक नशा है अहसासों काÓ निसंदेह पूजा जी बेहतरीन लिखती हैं। मैंने हाल ही में उनको पढऩा शुरू किया है। उनके शब्द बातें करते जान पड़ते हैं। ब्लॉग बुलेटिन स्तंभ की शुरुआत पूजा जी के ब्लॉग से हुई है यह बड़े संयोग की बात है। एक शानदार पत्रिका (उदंती) के नए कॉलम में उन्हें जगह मिली इसके लिए पूजा जी को बधाई।
- लोकेन्द्र सिंह राजपूत, ग्वालियर (मप्र)
lokendra777@gmail.com

दिल को छुने वाली ग़ज़लें

प्राण जी की ग़ज़लें, जिंदगी की सच्ची दास्तावेज होती हैं.. उनकी गज़लों में कल, आज और कल का मिश्रण होता है, जो की भावपूर्ण शब्दों के द्वारा दिल में उतर जाता है। 
- विजय कुमार, vksappatti@gmail.com
प्राण जी अपने आस- पास की बातों को सादे लहजे गज़ल में उतारना उन्हीं के बस की बात है...
- समीर लाल, sameer.lal@gmail.com

मर्मस्पर्शी लेख

आपाधापी एवं स्वार्थ- पीडि़त समाज में ऐसे लेखों की बहुत बड़ी भूमिका है, तपते मरुस्थल में शीतल जल की तरह। पूरा लेख मर्मस्पर्शी और प्रवाह पूर्ण है । इस तरह के लेखन को बनाए रखिए। (फरवरी अंक में रफी साहब की दरियादिली देख...  शीर्षक से प्रकाशित लेख के बारे में।)
- रामेश्वर काम्बोज, rdkamboj@gmail.com

संग्रहणीय अंक

कहि देबे संदेस फिल्म का नाम बचपन से सुनता रहा हूं, हालांकि देखने का मौका अब तक नहीं मिला है। इसमें अहम किरदार निभाने वाले स्व. रमाकांत बख्शी का पैतृक निवास खैरागढ़ के हमारे मोहल्ले में ही है, इसलिए इस फिल्म से बिना देखे ही एक अलग तरह का लगाव महसूस होता है। गाने जरूर सुने हैं और उनकी मिठास का कायल भी हूं। विशेषांक के माध्यम से फिल्म की पूरी जानकारी मिली। यह एक बढिय़ा अंक था और संग्रहणीय भी।
- विवेक गुप्ता, vivekbalkrishna@gmail.com
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2 Comments:

चारीचुगली said...

बढिय़ा और संग्रहनीय अंक, उदंती.कॉम
[charichugli.bligspot.com]

चारीचुगली said...

बढिय़ा और संग्रहनीय अंक, उदंती.कॉम
[charichugli.bligspot.com]

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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