October 29, 2011

रंग- बिरंगी दुनिया

मिले जुड़वा भाई डेढ़ दशक बाद
आपने जुड़वा भाईयों की फिल्में तो बहुत देखी होगी जिसमें दो भाई बचपन में बिछड़ या अलग हो जाते हैं, अगर हकीकत में ऐसा हो तो कैसे रहेगा। जी हां कश्मीर में दो बिछड़े जुड़वां भाई डेढ़ दशक बाद मिले। मात्र 10,000 रुपए में अस्पताल की एक नर्स ने जुड़वा बच्चों में से एक सरमद को नि:संतान दंपति को बेच दिया था।
सरमद का 17 वर्षो का यह दुखदायी सफर दिल को छू लेने वाला है। सरमद 2 अगस्त, 1994 को अपने माता- पिता से अलग हुआ था। इस वर्ष कक्षा 10 की परीक्षा में शामिल होने जा रहे सरमद को खरीदने वाले माता पिता के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और उसे खरीदने वाली महिला अपने पति का घर छोड़कर अपने माता- पिता के घर चली गई। सरमद ने बताया कि जब तक मुझे खरीदने वाली महिला के पिता जीवित रहे दिन अच्छे गुजरे। वर्ष 2004 में वह चल बसे तो उक्त महिला को वापस अपने पति के पास लौटना पड़ा। लेकिन उसका पति मुझे स्वीकार करने को तैयार था। 'मुझे खरीदने वाले शख्स ने मुझसे कहा, जाओ और अपने असली माता- पिता को खोजो। उनके ऐसा कहने से मुझे जोर का झटका लगा।' इसके बाद मैंने लगभग तीन दिन बिना कुछ खाए- पीए एक मस्जिद में गुजारे। एक रिश्तेदार ने मुझे मेरे असली माता- पिता का नाम बताया और यह भी बताया कि वे कहां रहते हैं।
'मैं वहां गया और मेरी असली मां ने मुझे एक सेकेंड में ही पहचान लिया।' इसके बाद मैं अपने जुड़वां भाई से मिला। वह बिल्कुल मेरे जैसा ही दिखता था। उसके अलावा मेरे दो और भाई भी थे। सरमद की 42 वर्षीय मां अमीना को इस बात का भरोसा नहीं था कि उनका खोया हुआ बेटा उन्हें वापस मिलेगा। सरमद के पिता लतीफ मोहम्मद कहते हैं, 'मैं नहीं चाहता कि सरमद को भविष्य में और किसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़े। वह पहले ही काफी कुछ सह चुका है।'

और उसने अपने गार्डन को बना डाला जंगल
ट्रॉपिकल रेनफॉरेस्ट की तरह नजर रहा यह जंगल हकीकत में एक घर का गार्डन है। ब्रिटेन के एंड्रू ब्रोगन 2004 में सफ्फॉक के हैंस्टीड गांव में रहने आए थे। फिर उन्होंने अपने बगीचे में कुछ अलग तरह के पेड़ लगाने शुरू किए। इसके बाद पेड़ लगाना उसका शौक बन गया और उन्होंने बगीचे को घने जंगल का रूप दे दिया। अपने इस शौक के चलते उन्होंने पेड़ों के बारे में जानकारी लेना और नई रिसर्च करना शुरू कर दिया। धीरे- धीरे वे आसपास की जमीनें भी खरीदते गए और फिर उनका यह अनोखा गार्डन बढ़ता चला गया। आज उनका यह गार्डन बनाम जंगल पर्यटकों के लिए आकर्षण का क्रेंद्र बन गया है। दूर- दूर से लोग उनके इस जंगल रूपी बगीचे को देखने आते हैं। इस बगीचे को पहाड़ी रूप देने का काम भी उन्होंने अकेले ही किया है।
50 वर्षीय एंड्रू पहले लंदन में रहकर फुल टाइम इंश्योरेंस टेक्निशियन का काम करते थे। उनके इस नए शौक से परिवार वाले और दोस्त भी हैरान थे। यहां उन्होंने बड़ी पत्तियों वाले एरो बैंबू के पेड़ लगाए हैं, जो- 23 डिग्री तक और यूरोपियन फैन पाम जो- 10 डिग्री तक तापमान झेल सकते हैं। वे कहते हैं कि अब यहां चिडिय़ों की चहचहाहट और मक्खियों की भिनभिनाहट के बीच बैठकर चाय पीना मुझे बहुत अच्छा लगता है।

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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