मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Mar 21, 2011

लघुकथाएँ

1. समझदारी
- जमील रिज़वी
आदरणीय बाबूजी,
चरण स्पर्श,
आपका पत्र मिला। ईश्वर की कृपा से हम सब यहां सकुशल हैं। आशा है, आप, अम्मा और उमा भी अच्छे होंगे। आपने उमा के विवाह के सिलसिले में लिखा है। यह जानकर मैं और आपकी बहू अलका बहुत प्रसन्न हुए। आजकल अच्छे लड़के जल्दी मिलते कहां हैं ? परन्तु हमारी बहन उमा बहुत भाग्यशाली है जो उसे इतना अच्छा पति मिल रहा है। आप और अम्मा विवाह की तैयारियों में व्यस्त होंगे। मैं और अलका सोच रहे थे कि हम भी समय पर गांव पहुंच जाएं। परन्तु बाबूजी, आपसे तो कुछ भी छिपा नहीं है। यहां शहर की भागम- भाग की जिन्दगी में हर इन्सान वैसे ही परेशान है और फिर इस कमरतोड़ मंहगाई ने सारा जीवन अस्त- व्यस्त कर दिया है। बच्चे बड़े होते जा रहे हैं, उनका खर्च सम्हाल पाना अभी से मुश्किल हो रहा है। मेरी और अलका की तनख्वाह भी अब कम पडऩे लगी है। आगे क्या होगा ? कैसे होगा ? यह सोच सोच कर मैं परेशान हो जाता हूं। बाबूजी, आपने मेरे लिए क्या कुछ नहीं किया। अपना पेट काट- काट कर मुझे पढ़ाया- लिखाया, मेरा विवाह करवाया। मेरा रोम- रोम आपका कर्जदार है। मैं इस बात को भी अच्छी तरह समझता हूं कि उमा के विवाह की सारी जिम्मेदारी मुझे ही उठानी चाहिए लेकिन मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं। मैंने सरकारी लोन लेकर यहां अपना मकान बनवाया है, आधी तनख्वाह तो उसकी किश्त चुकाने में चली जाती है। भविष्य निधि से पैसे निकलवाने की बात सोचना भी अनुचित है क्योंकि यही मेरे बुढ़ापे की धरोहर है।
बाबूजी, आप सब मेरी मजबूरी अच्छी तरह समझते होंगे। उमा के विवाह के लिए हमारे आने- जाने में दो हजार रुपए खर्च होंगे। इसलिए उचित यह होगा कि इन रुपयों में तीन हजार रूपये और मिलाकर मैं आपको भेज दूं। आप इन पांच हजार रुपयों से उमा के लिए कोई अच्छा सा सामान खरीद लीजिएगा। बाबूजी, मैं जानता हूं कि मेरे न आने पर समाज के लोग अवश्य उंगली उठाएंगे और आप लोगों को भी तकलीफ पहुंचेगी। लेकिन बाबूजी, परिस्थितियों के अनुकूल कार्य करने में ही समझदारी है। आशा है, आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे। अम्मा को प्रणाम और उमा को हमारा आशीष कहिए। विवाह के सम्बन्ध में सम्पूर्ण विवरण से अवगत करवाइएगा।
- आपका बेटा
2 . अन्तरद्वंद
चार बरस के बाद आज अल्पना से अचानक मुलाकात हो गई, इन वर्षों में उसमें जमीन - आसमान का फर्क आ गया था। हम दोनों सहपाठी थे, पर वह उम्र में मुझसे कुछ बड़ी थी। 'पहचाना मुझे?' उसने मुझसे पूछा। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट अवश्य थी परन्तु उसके पीछे जितना दर्द छिपा था, वह भी साफ नजर आ रहा था। बातों का सिलसिला चल पड़ा- 'आजकल एक स्कूल में टीचर हूं। बड़ी परेशान हूं। चाहती हूं कि इसी शहर में मेरा ट्रांंसफर हो जाता तो अपने माता- पिता के साथ रह पाती'। मुझे पता था कि उसकी शादी दो साल पहले हुई थी। उसकी बातें सुनकर मुझे अचरज हुआ मैंने कारण जानना चाहा कि वह अपने माता- पिता के पास आकर क्यों रहना चाहती है।
'उसने तो शादी के चौथे माह बाद ही आत्महत्या कर ली थी'- कहकर अल्पना के सब्र का बांध टूट गया, अनवरत आंसू बहने लगे। और वह बताने लगी कि किस तरह शादी के बाद अचानक उसे वैधव्य का सामना करना पड़ा। उसके पुराने सहपाठी और मित्र अब कितने सतही तौर पर मिलते हैं और कुछ तो अंजानों की तरह कतरा कर निकल जाते हैं। ...अब हर आदमी सहानुभूति की आड़ में कुछ मांगता है, चाहता है। बचपन में साथ पले- बढ़े दोस्त भी छींटाकशी करने से बाज नहीं आते। 'उसने आत्महत्या की तो इसमें मेरा क्या दोष है ?'
वह कहती जा रही थी और रोती जा रही थी। यह देखकर मेरा मन पिघल गया। उसके आंसू पोंछने की इच्छा थी, पर मेरे हाथ आगे नहीं बढ़ पाए कि कहीं मैं भी सहानुभूति की आड़ में उसका शोषक न बन जाऊं।

एक दुर्लभ व्यक्तित्व पर शोधपरक ग्रंथ

 समीक्षक- डॉ. परदेशीराम वर्मा

पुस्तक- लोहित के मानसपुत्र: शंकरदेव
रचनाकार- सांवरमल सांगनेरिया
प्रकाशक- हैरीटेज फाउण्डेशन, के.वी.रोड, पलटन बाजार,
गुवाहाटी, मूल्य - 250/-

भारत के महान संतों और महापुरुषों में से कुछ क्रांतिवेता विलक्षण व्यक्तित्वों का अवतरण 1376 से 1623 के बीच हुआ। संत रैदास, कबीर, गुरु नानकदेव, नरसी मेहता, महाप्रभु वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, संत तुलसीदास, भक्त सूरदास, मीराबाई, इसी कालवधि में जन्में। यह भक्ति आंदोलन का अपूर्व युग था। इस दौर में कृष्णभक्ति, रामभक्ति शाखा के महाकवि तथा रैदास और कबीर जैसे समय की धारा और जड़ परंपरा के विरुद्ध चलने और प्रहार करने वाले क्रांतिकारी संतों का जन्म हुआ। छत्तीसगढ़ के चम्पारण्य में 1478 में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी जन्में।

इसी दौर में असम में बहुआयामी संत और कवि शंकर देवजी का जन्म हुआ। उनका काल 1449 से 1568 माना जाता है। गुरु नानकदेव जी 1469 में जन्में। उनका अवसान 1539 में हुआ। लगभग यही समय था जब असम के भुंयां जमींदार के घर 1449 में शंकर देव जी जन्म हुआ। शंकर देव नृत्य, संगीत, काव्य रचना में प्रवीण एक सर्वगुण सम्पन्न संत थे। उन्हीं संत पर सांवरमल सांगानेरिया ने एक ग्रंथ का लेखन किया है। वे असम की समृद्ध संस्कृति के गहन जानकार हैं। असम की विशेषताओं से देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों को जोडऩे के लिए संकलित श्री सांगानेरिया ने एक दायित्व बोध के तहत इस ग्रंथ की रचना की है। ग्रंथ में प्रख्यात लेखिका इंदिरा गोस्वामी ने अपना महत्वपूर्ण अभिमत दिया है।
लोहित के मानसपुत्र शंकरदेव इस ग्रंथ में तत्कालीन सामाजिक स्थिति और राजनीतिक व्यवस्था का चित्रण है। असम में प्रचलित शाक्त परंपरा और उससे जुड़ी हुई तमाम आराधना पद्धतियों का विषय वर्णन ग्रंथ है। असम, उड़ीसा, बंगाल और छत्तीसगढ़ एक दूसरे से जुड़े हैं। छत्तीसगढ़ में भी शाक्त परंपरा का प्रभाव रहा है। इसीलिए बलि प्रथा यहां भी रही। नरबलि प्रथा का विरोध गुरु बाबा घासीदास ने डटकर किया। उन्होंने ही हिंसा के खिलाफ आंदोलन चलाया।
शंकर देव ने असम में हिंसा, पाखंड और बलिप्रथा का विरोध किया। पांच प्रकार की महत्ता को रेखांकित करने वाले रतिखोवा संप्रदाय के खिलाफ उन्होंने आंदोलन चलाया। जिसमें स्त्री पुरुष निर्वस्त्र होकर अंधकार की ओट में सारी मर्यादा भूलकर रतिखोवा परंपरा को सम्पन्न करते थे। रतिखोवा संप्रदाय से शंकरदेव ने लोहा लिया। उन्होंने मंदिरों में प्रचलित दासी प्रथा का विरोध भी किया।
उन्होंने पत्नी- प्रसाद और कालि- दमन नाटकों का लेखन किया। इन नाटकों का संपन्न मंचन भी हुआ। भक्ति रत्नाकर उनका प्रमुख ग्रंथ है। इसमें 38 अध्याय हैं। उन्होंने रामकथा पर आधारित उत्तरकांड की रचना भी की। अनादि पातम उनका एक और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। भागवत के दशम स्कंद का असमी में लेखन किया। वे कई भाषाओं के जानकार थे। संस्कृत के तो वे विद्वान थे ही लेकिन भारत की कई लोक भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। वे संगीत के भी गहरे जानकार थे। वे नृत्य प्रवीण भी थे। चैतन्य महाप्रभु की परंपरा के वे गाते- नाचते हुए विलक्षण संत थे। उन्होंने भी जगन्नाथ जी की यात्रा की। ठीक चैतन्य महाप्रभु की तरह वे काफी दिनों तक जगन्नाथ जी के दरबार में रहे।
उन्होंने असम छोड़कर पूरे देश का भ्रमण किया। विन्ध्यवासिनी, अयोध्या, नंदीग्राम, गोमती के किनारे, नैमिषारण्य, कन्नौज बाराह क्षेत्र की यात्रा मथुरा, गोकुल, वृंदावन के साथ ही संगम से नर्मदा की यात्रा तथा प्रयाग, उदयगिरी, चित्रकूट, अमरकंटक, विदिशा तक वे गए। दक्षिण के सभी तीर्थों में वे गए। उन्होंने हरिनाम की महत्ता पर जोर दिया। नामधर्म नामक एक नए धर्म की अवधारणा उन्होंने दी। यह हिंसा, पाखंड, मिथ्याचार, वामाचार से मुक्ति का सरल रास्ता था। उन्होंने मंत्र दिया...
भाई राम कह, राम कह, राम मंत्र सार,
तप जप यज्ञ योगे, सिद्धि नाही आर।

उनका लेखन संसार विस्तृत है। कुल मिलाकर 53 ग्रंथों की रचना उन्होंने की। 1568 में उनका देहावसान हुआ। 119 वर्ष का लम्बा जीवन उन्होंने प्राप्त किया।
श्री सांवरमल डांगरिया ने इस ग्रंथ को लिखकर एक बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह किया है। अपने प्रदेश असम में जन्मे विलक्षण संत के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय उन्होंने देशवासियों को दिया है। संभवत: शंकरदेव जैसे महापुरुष पर यह हिन्दी में लिखित पहला प्रामाणिक ग्रंथ है।

सम्पर्कः एलआईजी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाईनगर 490009, मो. 9827993494

वाह भई वाह

लॉटरी
एक बार टूटू की 20 लाख की लाटरी निकली।
टूटू लाटरी वाले के पास गया।
नंबर मिलाने के बाद लाटरी वाले ने कहा, 'ठीक है सर, हम आपको अभी एक लाख रूपए देंगे और बाकी के 19 लाख आप अगले 19 हफ्तों तक ले सकते हैं।
टूटू: नहीं, मुझे तो पूरे पैसे अभी चाहिए नहीं तो आप मेरे पांच रूपए वापस कर दीजिए।
भोजन
टूटू: क्या तुम बिना भोजन खाए जीवित
रह सकते हो?
मुटू: नहीं।
टूटू: लेकिन मैं रह सकता हूं।
मुटू: कमाल है यार, मगर कैसे?
टूटू: नाश्ता करके और कैसे!

शरीर को जरूरी ईंधन देता है पालक

पालक में पाए जाने वाले नाइट्रेट आपको बढ़ाते और मजबूत बनाते हैं। आम धारणा यह है कि लौह तत्व के कारण पालक लाभकारी होता है लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इसमें पाए जाने वाले नाइट्रेट इससे भी ज्यादा लाभकारी हैं।
पत्तेदार सब्जियों में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले नाइट्रेट जीवकोषों को मजबूत बनाते हैं। इन्हीं से हमें ऊर्जा प्राप्त होती है। पालक हमारे शरीर को उन जरूरी तत्वों से संचित करता है, जिनके माध्यम से हमारे शरीर का विकास होता है। यह हमारे शरीर की कोशिकाओं को जरूरी ईंधन देता है।
'मेटाबॉलिज्म' नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी कुछ समय पहले तक यह समझा जाता था कि नाइट्रेट में शरीर को फायदा पहुंचाने सम्बंधी कोई गुण नहीं होता है। जबकि स्वीडन के वैज्ञानिकों का मत है कि अकार्बनिक नाइट्रेट का तीन दिनों तक थोड़ी मात्रा में भी सेवन करना बेहद फायदेमंद रहता है।
पथ्य नाइट्रेट शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड की मात्रा बढ़ाता है। इसका काम रक्त नलिकाओं को खोलना और रक्तचाप की संभावना को कम करना है। इससे हमारे शरीर में रक्तसंचार बेहतर होता है।
पालक खाएं याददाश्त बढ़ाएं
हर शख्स चाहता है कि उसका दिमाग आखिरी वक्त तक चुस्त- दुरुस्त और युवा बना रहे। याददाश्त हमेशा उम्दा रहे, पर हकीकत में सबके साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि उम्र बढऩे के साथ- साथ कोशिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया क्रमश: क्षीण होने लगती हैं।
साऊथ फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में एक शोध हुआ। इससे पता चला है कि हरी पत्तेदार सब्जियाँ- खासकर मेथी, पालक, सरसों, चौलाई व शलजम को आहार में खास स्थान देने से व्यक्ति का दिमाग वृद्धावस्था में भी चुस्त- दुरुस्त व युवाओं की तरह सक्रिय बना रह सकता है।
शोधकर्ताओं की राय में हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन (खासकर विटामिन सी व ई) और खनिज लवण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। साथ ही इनमें कई 'एंटीऑक्सीडेंट' भी उपलब्ध रहते हैं, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षीण होने की प्रक्रिया को कम करते हैं। नतीजतन उम्र ढलने के बाद भी आपकी दिमागी सक्रियता व याददाश्त उम्दा बनी रहती है।

आपके पत्र

दिल का दिल से लेन-देन
उदंती का मैं नियमित पाठक हूँ। प्रारंभ से ही उदंती का हर अंक अपने कलात्मक संपादन से जगमगाता रहता है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें। फरवरी अंक में राधाकांत चतुर्वेदी जैसे रसिया कद्रदान ने उनकी अदा पर जो कसीदे काढ़े हैं उस पर चिरनिद्रा से भी जागकर गुलाबजान ने ठुमका लगाकर उन्हें शुक्रिया अदा किया होगा।
इसी अंक में अपर्णा त्रिपाठी ने 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' से एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की दर्द भरी चर्चा की है। वास्तव में तो संगीत के क्षेत्र में जो महत्व और अनिवार्यता रियाज की होती है वही साहित्य के क्षेत्र में पत्र लेखन की होती है। साहित्यकारों के पत्र हीरे- जवाहरातों की तरह संजोए, संकलित और प्रकाशित किए जाते हैं और उत्कृष्ट साहित्य के रुप में सम्मानित होते हैं। नैपोलियन द्वारा जोसेफाइन को लिखे प्रेम पत्र विश्व के उच्चतम साहित्य की श्रेणी में आते हैं। इसी प्रकार हमारे यहां $गालिब, टैगोर और प्रेमचंद के पत्र साहित्य की अनमोल निधि हैं। दुख की बात ये है कि व्याकरण की भ्रूण हत्या करने वाली मोबाइल की एसएमएस भाषा और इंटरनेट ने पत्र लेखन को दकियानूसी प्रथा मानकर त्याग दिया है। इतना ही नहीं सबसे शर्मनाक बात तो ये है कि सरकार ने भी पत्रों के संचार में अपने उत्तरदायित्व को भुला दिया है। 2जी- 3जी घोटालों से होने वाली रिश्वत की आमदनी के नशे में डाक- तार विभाग ने डाक और तार से ही पल्ला छुड़ा लिया है। यही कारण है कि आज स्थानीय पत्र भी डाक विभाग यदि दो या तीन हफ्ते में पंहुचा दे तो इसे साधारण बात माना जाता है। वास्तव में हाथ से लिखे पत्रों से दिल का दिल से लेन- देन होता है।
- प्रताप सिंह राठौर, अहमदाबाद
सैंया भये कोतवाल...
आज की राजनीति पर जितना कम कहा जाए उतना अच्छा। आपके सम्पादकीय में उत्तर प्रदेश के हालात का जायजा लिया गया है। जहां भ्रष्टाचार, बलात्कार आदि पर चिंता व्यक्त की गई है। यह स्थिति लगभग सारे देश में व्याप्त है क्योंकि नेता खुद इन मामलों में गिरफ्तार भी किए गए हैं। जब बाहुबली और गुंडे नेता बन गए हों तो कानून का डर किसे हो। यह तो वही कहावत हो गई- सैंया भये कोतवाल तो अब डर किस का ...
-चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, हैदराबाद
cmpershad@gmail.com
गरिमापूर्ण अंक
गरिमा पूर्ण है फरवरी अंक। बहुआयामी रचनाओं ने जहाँ सार्थक साहित्य को विस्तार दिया है वहीं सजगता पूर्ण और निष्पक्ष चयन ने इसे महत्वपूर्ण बनाया है। उदंती परिवार तथा रचनाकारों को बधाई। 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' अपर्णा जी ने चिट्ठियों में सहज रूप से छुपे दर्द को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है। रिश्तों की संवेदना पत्रों में गहराई से समाई थी इसीलिए हमारे मन में उनका स्थान था और रहेगा। एसएमएस तो तकनीकी व्यवस्था मात्र है। कृष्ण कुमार ने हवाई मेल की अद्भुत जानकारी दी है।
अनकही के अंतर्गत महिलाओं की सुरक्षा का ज्वलंत प्रश्न उठाया गया है। यह गंभीर समस्या है और इसकी जड़ें सामजिक, आर्थिक एवं राजनितिक व्यवस्था में निहित हैं। उत्तर प्रदेश की स्थिति बहुत खराब है जहाँ महिलाएं देश में सर्वाधिक और शर्मनाक स्थिति तक बलात्कार की शिकार होती हैं... क्या आपने कभी सोचा है कि लड़कियों का सबसे अधिक सम्मान इसी उत्तर प्रदेश में होता है, लड़की से बड़ी उम्र के भाई, चाचा, ताऊ और पिता भी छोटी- छोटी लड़कियों के पैर बड़े आदर से साक्षात देवी मानते हुए छूते हैं। इसके विपरीत जिन प्रदेशों में लड़कियां अपने से बड़ों के पैर छूती हैं, वहां उत्तर प्रदेश के मुकाबले बलात्कार की कम शिकार होती हैं। इससे ऐसा लगता है उत्तर प्रदेश में बेटियों का बनावटी सम्मान किया जाता है! मेरा मानना है कि आर्थिक, सामजिक बराबरी पर खड़ी होकर महिलाएं इसी शासन व्यवस्था के भीतर अपनी रक्षा और अपना सम्मान प्राप्त कर सकेंगी। आपके इस सार्थक प्रश्न की गहन चिंता के लिए हार्दिक बधाई।
-सुरेश यादव,नई दिल्ली
sureshyadav55@gmail.com

चिट्ठियों में छुपा दर्द
'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' अपर्णा जी ने चिट्ठियों में सहज रूप से छुपे दर्द को बहुत ही खूबसूरती से पाठकों के सामने लाया है। सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।
- आशीष, कानपुर
समाज की दुखती रग
उदंती नियमित पढ़ता रहता हूँ। इस बार राजनीति के संदर्भ में जार्ज आरवेल के विचार अच्छे लगे। आपकी अनकही ने भी समाज की दुखती रग पर हाथ रखा है। इसके लिये आपको साधुवाद।
- दीपक शर्मा, कुवैत
deepakrajim@gmail.com
सुंदर एवं मनमोहक पत्रिका
'उदंती' का जनवरी अंक प्राप्त हुआ। सामग्री संग्रहणीय व प्रेरणास्पद है। बधाई। बिली अर्जन सिंह के बारे में कई नई जानकारी मिली। बेबी दिव्या जैन का प्रयास सराहणीय व अनुकरणीय है। सुंदरवन की समस्या तथा सूचना माध्यमों के दुष्प्रभावों से बच्चों को बचाने की चुनौतियां हमारा तुरंत ध्यान चाहती हैं। कहानी, कविता, लघुकथा तथा अन्य स्तंभ रोचक एवं ज्ञानवर्धक हंै। 'हाय मेरी प्याज' एक सामाजिक समस्या पर रोचक व्यंग्य है। पत्रिका की साज- सज्जा एवं चिंत्राकन बहुत सुंदर व मनमोहक है।
- द्वारिका प्रसाद शुक्ल, अलीगंज, लखनऊ