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Jul 1, 2023

लेखकों की अजब गज़ब दुनियाःनियम बनाकर चलने वाले लेखक

 - सूरज प्रकाश

• ई बी व्‍हाइट अपने लेखन के बारे में लिखते हैं कि मैं काम करते समय संगीत नहीं सुनता। मुझमें ध्‍यान देने का इतना माद्दा नहीं है। हाँ, छोटे मोटे व्‍यवधानों के बीच मैं काम कर लेता हूँ। मेरे घर में जो बैठक का कमरा है, घर भर की सारी गतिविधियाँ वहीं से होती हैं। वहीं से तहखाने में जाने का रास्‍ता है। रसोई में जाना हो, तो वहीं से गुजर कर जाना होगा।  फोन भी एकदम पास ही रखा होता है। यानी हर समय वहाँ चहल पहल रहती है; लेकिन ये कमरा उजास लिये हुए है। आसपास बेशक मेला चल रहा हो, मैं यहीं बैठ कर लिख लेता हूँ। नतीजा ये होता है कि मेरे घर के लोग इस बात की जरा- सी भी परवाह नहीं करते कि ये बंदा लेखक है। वे शोर गुल करते रहते हैं। अगर मैं इनसे ज्‍यादा ही परेशान हो जाऊँ, तो वहाँ से दूर जाने के लिए मेरे पास जगहें हैं। अगर लेखक इस बात का इंतज़ार करता रहे कि उसे लिखने के लिए आदर्श स्‍थितियाँ चाहिए, तो माफ करना, वह एक भी शब्‍द लिखे बिना मर जाएगा।

ओरहान पामुक
• ओरहान पामुक अभी भी पेन से लाइनों वाले काग़ज़ पर लिखते हैं। तय करके लिखते हैं और समय बरबाद नहीं करते। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्‍हें घर पर लिखना अजीब लगता है। उन्हें हमेशा एक दफ़्तर चाहिए, जो घर से अलग हो, जहाँ वे सिर्फ़ लिख सकें। वे घर में लिखने की मजबूरी से अलग ही ढंग से निपटते हैं। वे सुबह उठते हैं, नहाते-धोते हैं, नाश्ता करते हैं, बाक़ायदा फॉर्मल सूट पहनते हैं और पत्‍नी से यह कहकर घर से निकल पड़ते हैं कि मैं ऑफिस जा रहा हूँ। पंद्रह-बीस मिनट सड़क पर टहलने के बाद वे घर लौट आते हैं, अपने कमरे में घुसते हैं और उसे अपना ऑफिस मान लिखने लग जाते हैं।
• जेम्‍स जॉयस सफेद कोट पहनकर पेट के बल बिस्‍तर पर लेट जाते। हाथ में लंबी नीली पैंसिल होती। वे कार्ड बोर्ड पर क्रेयान से लिखते। इस तरह की हरकत के पीछे कोई सनक या वहम की बात नहीं थी। दरअसल उन्‍हें ठीक से दिखना बंद हो गया था। बचपन में आँख में हुई तकलीफ बीस बरस की उम्र आते आते परेशान करने लगी थी और कोढ़ में खाज ये हुआ कि जब वे पच्‍चीस बरस के थे तो बुखार से ये हालत हो गयी कि उन्‍हें 25 बार आँखों के ऑपरेशन कराने पड़े; लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब यही तरीका बचता था कि बड़े से क्रेयान से जो लिख पाते, वही देख पाते थे। सफेद कोट से कागज पर रात के वक्‍त ज्‍यादा रौशनी पड़ती। इसके बावजूद उन्‍हें अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। वे मानकर चलते थे कि अगर पूरे दिन में ढंग के दो पूरे वाक्‍य भी लिख लिये तो दिहाड़ी पक्‍की समझो।

• विक्‍टर ह्यूगो जब द हंचबैक ऑफ नोत्रेदम लिखने बैठे, तो अपने लिए बेहद मुश्‍किल से लगने वाली समय सीमा तय कर ली। वे स्‍याही की एक पूरी बोतल खरीद लाए और एक तरह से अपने आपको घर में कैद कर लिया। वे घर से बाहर ही न निकलें इसके लिए उन्‍होंने एक नायाब तरीका अपनाया। अपने कपड़े उन्‍होंने ताले में बंद करके रख दिए; ताकि बाहर जाने का लालच ही न रहे। बस, एक भूरी- सी शॉल ओढ़कर बैठे रहते। उन्‍होंने मौके -बे मौके के लिए पंजों तक आने वाला बुना हुआ एक लबादा- सा खरीद लिया था, जो कई महीने तक उनकी पोशाक बना रहा। किताब तय समय सीमा से पहले ही पूरी हो गयी थी। अलबत्‍ता, स्‍याही की पूरी बोतल खाली हो चुकी थी। वे तो इस किताब का नाम ही ये रखना चाहते थे – स्‍याही की बोतल से क्या हासिल हुआ, लेकिन बाद में ये नाम रहने दिया।

• विलियम फॅाकनर जब लिखते थे, तो खूब व्हिस्की पीते थे। जितनी शराब अंदर, उतना लेखन बाहर। मजे की बात वे खुद दारू बनाने वाली कंपनी में काम करते थे।

• अमरीकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजेन एक लंबे राइटर्स ब्लॉक के दौरान जब कुछ नहीं लिख पा रहे थे, तो उन्होंने तंबाकू खाना शुरू कर दिया। यह आदत उनके लेखक मित्र डेविड फ़ॉस्टर वैलेस में थी। वैलेस की आत्महत्या के बाद वह आदत उनमें आ गई। जब वे लिखते हैं, तो अपने पुराने डेल के लैपटॉप के
आगे ज़ोर-ज़ोर से अपने डायलॉग्स बोलते हैं। छह घंटे के लेखन-सेशन के बाद उनका गला बैठ जाता है और यह लगभग रोज़ की बात है।

सलमान रश्दी
• सलमान रश्दी सुबह उठने के बाद पहला काम जो करते हैं, वह है लिखना। बैठते ही पढ़ेंगे कि कल क्या- क्या कितना लिखा था। फिर आगे लिखने का काम शुरू होगा। तीन घंटे लिखने के बाद पहला ब्रेक। फिर दुनियादारी। शाम को पेज तीन वाली जि़ंदगी में घुसने से पहले एक बार फिर पढ़ेंगे कि सुबह क्या क्या- लिखा था। फिर अगली सुबह छुएँगे। कोई करेक्शन हुआ, तो वह भी अगली सुबह। मिडनाइट्स चिल्ड्रेन लिखते समय वे नौकरी कर रहे थे। पाँच दिन नौकरी बजाते थे, पाँचवीं शाम घर पहुँच घंटा-डेढ़ घंटा गरम पानी में नहाते, फिर लिखने बैठ जाते। सोमवार की सुबह तक सोते-जागते लिखते, फिर अपने काम पर चले जाते, पाँच दिन के लिए।

• द काइट रनर के प्रसिद्ध लेखक खालिद हुसैनी लिखते हैं कि मैं ऐसे कई लोगों से मिलता हूँ जो बताते हैं कि उनके दिमाग में एक किताब बस तैयार है; लेकिन वे एक शब्‍द भी नहीं लिखते। लेखक होने के लिए आपको सचमुच लिखना पड़ता है। आपको हर दिन लिखना होता है। और आपको अच्‍छा लगे या बुरा लगे, लिखना होता है। शायद सबसे जरूरी बात ये होती है कि आपको श्रोता के लिए लिखना होता है। ये श्रोता आप खुद होते हैं। वह कहानी लिखो, जो आप सुनाने की ज़रूरत महसूस करते हैं और जो कहानी आप पढ़ना चाहते हैं। ये पता करना बहुत ही मुश्किल होता है कि दूसरे क्‍या चाहते हैं, इसलिए ये सब जानने में समय बरबाद न करें। जो कुछ भी आपकी आँखों के सामने है उसे लिखें और वह सब लिखें जो आपकी रातों की नींद खराब करती हैं।

• अंग्रेजी के लेखक नाथन इंगलैंडर लिखते हैं कि लिखते समय अपना मोबाइल बंद कर दें। सच तो ये है कि अगर आप काम करना चाहते हैं तो आपको अलग रहने की कला आनी  चाहिए। कोई एसएमएस नहीं, ईमेल नहीं, फेसबुक नहीं, कुछ भी नहीं। आप जो कुछ भी कर रहे  हों लिखते समय सब बंद कर देना चाहिए। आपको जान कर हैरानी होगी कि जब मैं लिखता हूँ, आसपास भले ही सन्‍नाटा हो, मैं कानों में ईयर प्‍लग घुसेड़े रहता हूँ।

• जापानी लेखक हारुकी मुराकामी बताते हैं कि जब मैं उपन्‍यास लिखने के मूड में होता हूँ, तो सुबह चार बजे जग जाता हूँ और पाँच से छह घंटे काम करता हूँ। दोपहर के वक्‍त मैं दस किलोमीटर की दौड़ लगाता हूँ या डेढ़ किलोमीटर की तैराकी करता हूँ या दोनों ही करता हूँ। तब कुछ देर पढ़ता हूँ और कुछ संगीत सुनता हूँ। रात नौ बजे मेरा सोने का समय होता है। मेरे इस रूटीन में कोई बदलाव नहीं आता। दोहराव ही सबसे अहम हो जाता है। ये एक तरह से मन को वश में करने की तरह की बात है। मैं अपने दिमाग की गहराई तक पहुँचने के लिए अपने आपको सम्‍मोहित करता हूँ;  लेकिन इस दोहराव को लंबे समय तक, छह महीने से एक बरस तक चलाना बहुत अधिक मानसिक और शारीरिक मेहनत की माँग करता है। एक तरह से कहें तो लंबा उपन्‍यास लिखना जीवित रहने के प्रशिक्षण की तरह  है। शारीरिक श्रम भी कलात्‍मक संवेदना की तरह जरूरी होता है।

• हेनरी मिलर ने अपने लेखन के लिए जो रूटीन बनाया था, वह बेहद रोचक है: एक वक्‍त में एक ही काम और उसके खत्‍म हो जाने तक उसी पर डटे रहो। अधूरे कामों की सूची बढ़ाने की जरूरत नहीं। कोई नई किताब या नया काम हाथ में मत लो। तनाव में आने की जरूरत नहीं। धीरज से काम करो, काम में खुशी तलाशो, जो भी काम हाथ में हो, पूरी शिद्दत से करो। तय कार्यक्रम के हिसाब से काम करो न कि मूड के हिसाब से। ठीक वक्‍त पर काम बंद। जब आप रच नहीं सकते, तब काम कर सकते हैं। जमीन धीरे धीरे पुख्‍ता करें। रोजाना नई खाद डालने से कुछ नहीं होने वाला। संबंध बनाए रखें, लोगों से मिलें जुलें, घूमें, मन करे तो शराब की चुस्‍की लें। गधे की तरह काम न करें। खुशी-खुशी काम करें। मन न करे तो तयशुदा कार्यक्रम छोड़ दें; लेकिन अगले दिन उसी पर लौट आएँ। ध्‍यान लगाएँ। लक्ष्‍य पर ध्‍यान दें। उन किताबों को भूल जाएँ जो आप लिखना चाहते हैं। सिर्फ उसी के बारे में सोचें, जिस पर काम कर रहे हैं। लेखन पहले और लेखन हमेशा। पेंटिंग, संगीत, दोस्‍त, सिनेमा, सब चीजें बाद में आती हैं। (क्रमशः)  ■■

जीवन दर्शनः कर्म करें केवल हरिदास

  - विजय जोशी 

पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

कर्म की महत्ता पर अनेकों दृष्टांत व उदाहरण प्राप्त हैं। आये दिन इसकी नई व्याख्या उपलब्ध है। पर सही मायने में कर्म वही है जो कृष्ण ने गीता में कहा है - हे अर्जुन ! तेरा अधिकार मात्र कर्म पर है, फल पर नहीं। इसलिये इस समय तू केवल कर्म कर। कर्म की मूल भावना की गहराई में जाए बगैर हम जो कर रहे हैं उसे कर्म कहने लग जाते हैं और वह तो शुरू बाद में होता है पर उसके नफे, नुकसान का तौल मोल हम पहले ही करने लग जाते हैं। खुलकर या थोड़े स्पष्ट शब्दों में कहें तो यह कुली मनोवृत्ति कहलाती है। जिसमें आदमी कार्य आरंभ करने से पहले मोल भाव करता है। उसकी अपेक्षा कार्य के अनुपात में कई गुना अधिक होती है तथा कार्य की समाप्ति होने के पूर्व ही हाथ फैल जाते हैं। यह कर्म के साथ वांछित नहीं है। फल प्राप्त हो यह अच्छी बात है पर केवल फल को नज़र में रखकर कार्य हो यह अवांछित है।
कर्म मूलत: दो किस्म के होते हैं सकाम तथा निष्काम। पहले में फल की प्राप्ति सशर्त है, जबकि दूसरे में कोई शर्त नहीं। फल दोनों में ही प्राप्त होता है पर एक में जहाँ स्वार्थ सिद्धि की लालसा है वहीं दूसरे में एक उदार व उदात्त भावना रहती है। हर सांसारिक या सामाजिक प्राणी के जीवन यापन या महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए फल अभीष्ट है; पर कर्म के फल की मानसिकता के साथ कार्य को अंजाम देना कदापि उचित नहीं है। किसी भौतिक उद्देश्य के साथ कार्य में वह आनंद नहीं जो निर्मल मन से किए काम में है।
एक बार तानसेन से महात्मा हरिदास के गायन की प्रशंसा सुनकर बादशाह अकबर ने उनका गायन सुनने का निश्चय किया। हरिदास, त्यागी संत थे, सो दिल्ली दरबार में आकर उनके द्वारा गाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। यह भी मुश्किल ही था कि वे बादशाह के सामने गाएँगे, इसलिए अकबर और तानसेन ने वृंदावन जाकर संगीताचार्य हरिदास के गायन को सुनने की सोची।
जब वृंदावन पहुँचे, तो अकबर को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि हरिदास एक छोटी- सी कुटिया में रहते हैं। अकबर कुटिया के बाहर छुप गए और तानसेन ने कुटिया में प्रवेश किया। हरिदास जी तानसेन के गुरु थे। तानसेन ने वहाँ गायन आरंभ किया और वे गायन में जानबूझकर गलतियाँ करने लगे। शिष्य की भूल सुधारने के लिए हरिदास कई ढंग से गाकर सुनाने लगे। बादशाह की इच्छा पूर्ण हुई।
दिल्ली पहुँचने पर बादशाह अकबर ने तानसेन से वैसा ही गायन सुनाने का अनुरोध किया।
तानसेन ने कहा - गुरु जी के स्वर में जो सौंदर्य था, उसे मैं प्रकट नहीं कर सकता।
तानसेन खुद श्रेष्ठ गायक थे, उनके मुँह से यह सुनकर अकबर को आश्चर्य हुआ। अकबर ने कारण पूछा।
तानसेन ने कहा - मैं गुरुदेव की तरह इसलिए नहीं गा सकता; क्योंकि मैं दिल्ली के बादशाह के लिए स्वार्थवश गाता हूँ और मेरे गुरु इस जग के मालिक के लिए।
काम में श्रेष्ठ ऊँचाई प्राप्त करने के लिये जरूरी है कि उसका अनुपालन किसी भी लक्ष्य विशेष के लिए न होकर एक वचनबद्धता (Commitment) के लिए हो। इसका कारण यह है कि हमारा उद्देश्य ही कर्म क्षेत्र में हमारी उपलब्धि की सीमा तय करता है। यदि हम धन दौलत, और यश को लक्ष्य बनाकर काम करते हैं, तब हम सृजन की सर्वोच्च संभावना को पाने की जगह उससे मिलने वाली अन्य वस्तुओं में ही भटक जाते हैं। कर्म को धर्म मानकर किया कर्म ही अपनी पूर्णता को संतोष के साथ प्राप्त करता।  ■■
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023,
 मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

Jun 1, 2023

उदंती.com, जून 2023

वर्ष - 15, अंक - 10

जिनको  इस पृथ्वी से प्यार है, जो इसे सुनना चाहते हैं 

उनके लिए धरती के पास अपरम्पार मधुर संगीत है । 

                                      – सिडनी शेल्डन

अनकहीः समाधान हमारे पास ही है... - डॉ.  रत्ना वर्मा

जल संकटः सूख रही हैं भारत की नदियाँ - प्रमोद भार्गव

 कविताः जब नदी भूली रास्ता - हरभगवान चावला

 प्रेरकः बंजर जमीन को उसने जंगल में बदल दिया

 प्रकृतिः पतझड़ के बाद पेड़ों को पानी कैसे मिलता है? - डॉ. किशोर पँवार

पर्यावरणः पत्ता पत्ता सूख चुका था पेड़ बिचारा करता क्या? - अंजू खरबंदा

 कविताः  1. गाँव चाहता है , 2. एक पिता - राजेश पाठक

जल संरक्षणः रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून - अपर्णा विश्वनाथ

 वर्षा जलः बूँद- बूँद अनमोल - दीपाली ठाकुर

जीवन दर्शनः समाज सुधार का सूत्र - विजय जोशी

 पर्यावरणः ...बहुमंजिली इमारतों का जंगल  - रेखा श्रीवास्तव

 व्यंग्यः कमाल का आदमी… - गिरीश पंकज

 कहानीः जियो और जीने दो - श्यामल बिहारी महतो

 कविताः पिताजी चले गए - प्रियदर्शी खैरा

 कविताः पिता नहीं उफ़ करता है - पीयूष श्रीवास्तव

 कविताः सपने में आते हैं पिता - सांत्वना श्रीकान्त

 लघुकथाः गुलाब के लिए - कस्तूरीलाल तागरा

 लघुकथाः सीख - अंजलि गुप्ता ‘सिफ़र’

 लेखकों की अजब गज़ब दुनियाः गिन कर शब्‍द लिखने वाले लेखक - सूरज प्रकाश

 किताबेंः समय के चाक पर : संवेदनशीलता का सफ़रनामा - विजय जोशी

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रचनाकारों से .... 

उदंती.com एक सामाजिक सांस्कृतिक, साहित्यिक मासिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक ज्वलंत विषयों के साथ समाज, शिक्षा, पर्यावरण, पर्यटन, लोक जीवन, पर्व- त्योहार जैसे विभिन्न विषयों के प्रकाशन के साथ संस्मरण, डायरी, यात्रा वृतांत, रेखाचित्र, कहानी, कविता, व्यंग्य, बोधकथा, लोक कथा तथा प्रेरक आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।

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अनकहीः समाधान हमारे पास ही है...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

आपमें से कितने लोग हैं, जो गर्मियों की रात में अपने घर के आँगन या छत पर खुले आसमान तले खाट डालकर चाँद और तारे देखते हुए सोए हैं? मेरी पीढ़ी के बहुत लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने ऐसे पलों जिया होगा। हम गर्मियों की छुट्टियों में, जो तब दो माह की हुआ करती थी, अपने गाँव में बिताते थे। खपरैलवाला दो मंजिला घर, मिट्टी से छबाई की हुई मोटी- मोटी दीवारें और गाय के गोबर से लीपे हुए आँगन, बरामदा और फिर कमरे। कितनी भी तेज गर्मी हो, मिट्टी की मोटी दीवारों को भेद कर सूरज की गर्मी कमरों में घुस ही नहीं पाती थी। 
 रात के भोजन के बाद आँगन में कुएँ से पानी लाकर छींटा मारा जाता था, ताकि धरती की गर्मी थोड़ी कम हो जाए, फिर परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए खाट बिछाकर बिस्तर लगा दिया जाता और हम सब बच्चे किस्से- कहानियाँ सुनते, चाँद के छोटे- बड़े होते आकार के बारे में बातें करते और तारों की गितनी करते, सप्तऋषियों को ढूँढते हुए सपनों की दुनिया में सैर करते हुए चैन की नींद सो जाया करते थे। यह उस ज़माने की बात है, जब गाँव में बिजली भी नहीं पहुँची थी। तब पंखे की जरूरत भी महसूस नहीं होती थी। आप कल्पना ही कर सकते हैं कि तब का वातावरण कितना निर्मल और शुद्ध हुआ करता था। जाहिर है, हरियाली इतनी थी कि दिन की गर्मी की तपन शाम होते ही कम होने लगती थी और रात होते ही हवा ठंडी हो जाया करती थी। पीपल, बड़, आम, इमली और नीम के विशालकाय वृक्षों से घिरे गाँव में तालाब और पोखर इतने अधिक होते थे कि धरती का तापमान संतुलित रहता था। 
पर यह सुख बहुत सालों तक नहीं रहा। धीरे- धीरे खपरैल के घर सिमेंट की पक्की छत में बदलते चले गए। मिट्टी के आँगन जो गोबर से लिपे- पुते कीटाणुरहित और स्वच्छ होते थे, फर्श में तब्दील होने लगे। गाँव के आस- पास के जंगल कटने लगे और धरती बंजर होने लगी। तालाब और पोखर भी सिमटते चले गए। लघु उद्योग- धंधों और कृषि पर निर्भर गाँव की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। कुल मिलाकर गांधी जी ने ग्राम स्वराज्य का जो सपना देखा था, वह सब  एक- एक करके ऊँची- ऊँची गगनचुम्बी इमारतों, धुँआ उगलते कल- कारखानों और सरपट दौड़ती मोटर- गाड़ियों के शोर तले कहीं दबती चला गया। ऐसे माहौल में ताजी और ठंडी हवा का झोंका आए भी तो कहाँ से आए। तभी तो अब हमारी पीढ़ी के लोग छत और आँगन में खाट डालकर सोने की बात किस्से कहानियों की तरह वर्तमान पीढ़ी को सुनाते हैं, और वे आश्चर्य के साथ कहते हैं कि मच्छरों की इस भनभनाहट में दो पल भी छत पर खड़े नहीं हो सकते, रात भर सोना तो दूर की बात है। 
पर ऐसे किस्से- कहानियों को सुनाते हुए हमें यह भी याद रखना चाहिए कि साथ- साथ बच्चों को यह भी बताते चलें कि आखिर हम क्यों अब खुले आसमान तले सो नहीं सकते, क्यों बिना एयर कंडीशनर और पंखों के बिना जीवन गुजारना दूभर हो गया है ? विकास की इस  अंधी दौ़ड़ में शुद्ध हवा, शुद्ध पानी और शुद्ध भोजन की कमी क्यों होते जा रही है? जब तक हम उन्हें इनके पीछे का सच सब नहीं बताएँगे, वे पुरानी गलतियों से सबक नहीं लेंगे। 
 यह तो सर्वविदित है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण मनुष्य दिन-प्रतिदिन जंगल को काटते हुए जमीन पर कब्जा करते चले जा रहा है। खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे हमारी उपजाऊ जमीन तो प्रदूषित हो ही गई है, इन रासायनिक कीटाणुओं ने धरती के जल भी प्रदूषित कर दिया है। जनसंख्या बढ़ी, तो यातायात के नए नए साधन भी बढ़े, जिसके कारण ध्वनि एवं वायु प्रदूषित इतना बढ़ा कि सुनने और साँस लेने में तकलीफ होने लगी। इन सबके चलते नई- नई बीमारियों ने मनुष्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इन सबका जिम्मेदार कोई दूसरा नहीं, हम स्वयं है, हमारी बदलती जीवनशैली है, हमारा बदलता खान- पान है। 
सभ्यता के विकास के साथ- साथ मनुष्य ने कई नए आविष्कार तो कर लिये और उन्नति के अनेक सोपान भी पार कर लिये;  परंतु औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की बढ़ती इस प्रवृत्ति से धरती की आबो-हवा इतनी प्रदूषित होती चली गई कि हमने अपना जीवन ही असुरक्षित कर लिया। और अब इस समस्या से पूरा विश्व इस चिंता में है कि इसका निराकरण कैसे किया जाए? क्योंकि कहीं बहुत ज्यादा गर्मी है, तो कहीं बहुत ज्यादा ठंड। गौर किया जाए, तो प्रदूषण वृद्धि का एक बड़ा कारण मानव की वे अवांछित गतिविधियाँ हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करते हुए इस पृथ्वी को कूड़े-कचरे का ढेर बना रही है। कूड़े-कचरे के बढ़ते इस जंगल के कारण जल, वायु और भूमि जिस तेजी से प्रदूषित हो रही है, वह सम्पूर्ण जगत् के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। 
अब प्रश्न यही है कि ऐसा क्या करें कि इस वैश्विक समस्या का समाधान मिले? दरअसल इसके जवाब में सवाल ही ज्यादा उठ रहे है कि क्या हम फिर से गोबर से लिपे छप्पर वाले घर में रह सकते हैं? या आज बन रही इमारतों को इतना हवादार बना सकते हैं कि कमरों में एसी की जरूरत न हो! क्या हम अपनी उपजाऊ भूमि को रासायनिक दवाओं से मुक्त कर सकते हैं? क्या हम अपने रहने वाले स्थान को कूड़े- कचरे से मुक्त साफ- सुथरा बना कर रख सकते हैं, क्या हममें से प्रत्येक इंसान प्लास्टिक का उपयोग न करने का संकल्प ले सकता है? इस तरह के ढेरों सवाल हैं, जिनके जवाब हम सबके पास ही हैं । तो जाहिर है इन सबका हल भी हमारे पास ही है, जरूरत उस पर अमल करने की है।

जल संकटः सूख रही हैं भारत की नदियाँ

 - प्रमोद भार्गव

अमेरिका के न्यूयॉर्क में पाँच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन संपन्न हुआ है। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई है। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। 

हिमनद पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है। गुतारेस ने यह वक्तव्य इंटरनेशनल ईयर ऑफ ग्लेशियर प्रिज़र्वेशन विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दिया। इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा।    

गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियाँ झेलम, चिनाव, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियाँ सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। 

पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। यह समस्या भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में सबसे ज़्यादा है। सीएसई की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहाँ पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार 2017 में पानी की ज़रूरत जहाँ 1100 अरब घन मीटर थी, वह बढ़कर 2050 में 1447 घन मीटर हो जाएगी। खेती के लिए 200 घन मीटर अतिरिक्त पानी की ज़रूरत होगी। सीएसई रिपोर्ट के मुताबिक गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदी प्रणाली का जलग्रहण क्षेत्र कुल नदी जलग्रहण क्षेत्र का 43 प्रतिशत है। इनमें पानी का कम होना देश में बड़ा जल संकट पैदा कर सकता है। भारत में दुनिया की 17.74 प्रतिशत आबादी है, जबकि उसके पास मीठे पानी के स्रोत केवल 4.5 प्रतिशत ही हैं। तो, नदियाँ सूखने के संकेत चिंताजनक हैं।  

हिमालयी नदियों के सूखने की चेतावनी इसलिए सच लगती है, क्योंकि कनाडा की स्लिम्स नदी के सूखने का घटनाक्रम एवं नाटकीय बदलाव एक ठोस सच्चाई के रूप में छह साल पहले सामने आ चुका है। इस घटना को भू-विज्ञानियों ने ‘नदी के चोरी हो जाने’ की उपमा दी थी। ऐसा इसलिए कहा गया, क्योंकि नदियों के सूखने अथवा मार्ग बदलने में हज़ारों साल लगते हैं, जबकि यह नदी चार दिन के भीतर ही सूख गई थी। नदी के विलुप्त हो जाने का कारण जलवायु परिवर्तन माना गया था। तापमान बढ़ा और कास्कावुल्श नामक हिमनद जो इस नदी का उद्गम स्रोत है, वह तेज़ी से पिघलने लगा। नतीजतन सदियों पुरानी स्लिम्स नदी 26 से 29 मई 2016 के बीच सूख गई। जबकि इस नदी का जलभराव क्षेत्र 150 मीटर चौड़ा था। 

आधुनिक इतिहास में इस तरह से नदी का सूखना विश्व में पहला मामला था। प्राकृतिक संपदा के दोहन के बूते औद्योगिक विकास में लगे मनुष्य को यह चेतावनी भी है कि यदि विकास का स्वरूप नहीं बदला गया, तो मनुष्य समेत संपूर्ण जीव जगत का संकट में आना तय है। 

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के भू-गर्भशास्त्री डेनियल शुगर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं का एक दल स्लिम्स नदी की पड़ताल करने मौके पर पहुँचा था। लेकिन उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अब वहाँ कोई नदी रह ही नहीं गई थी। न केवल नदी का पानी गायब हुआ था, बल्कि भौगोलिक परिस्थिति भी पूरी तरह बदल गई थी। इन विशेषज्ञों ने नदी के विलुप्त होने की यह रिपोर्ट ‘रिवर पायरेसी’ शीर्षक से नेचर में प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक ज़्यादा गर्मी की वजह से कास्कावुल्श हिमनद की बर्फ तेज़ी से पिघलने लगी और इस कारण पानी का बहाव काफी तेज़ हो गया। जल के इस तेज़ प्रवाह ने हज़ारों साल से बह रही स्लिम्स नदी के पारंपरिक रास्तों से दूर अपना अलग रास्ता बना लिया। अब नई स्लिम्स नदी विपरीत दिशा में अलास्का की खाड़ी की ओर बह रही है, जबकि पहले यह नदी प्रशांत महासागर में जाकर गिरती थी।

जिस तरह से स्लिम्स नदी सूखी है, उसी तरह से हमारे यहाँ सरस्वती नदी के विलुप्त होने की कहानी संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में दर्ज है। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के द्वार खुलने के बाद जो ताज़ा रिपोर्ट सामने आई है, उससे पता चला है कि गंगोत्री का जिस हिमखंड से उद्गम स्रोत है, उसका आगे का 50 मीटर व्यास का हिस्सा भागीरथी के मुहाने पर गिरा हुआ है। हालांकि गोमुख पर तापमान कम होने के कारण यह हिमखंड अभी पिघलना शुरू नहीं हुआ है। यही वह गंगोत्री का गोमुख है, जहाँ से गंगा निकलती है। 2526 कि.मी. लंबी गंगा नदी देश की सबसे प्रमुख नदियों में से एक है। अनेक राज्यों के करीब 40 करोड़ लोग इस पर निर्भर हैं। इसे गंगोत्री हिमनद से पानी मिलता है; परंतु 87 साल से 30 कि.मी. लंबे हिमखंड से पौने दो कि.मी. हिस्सा पिघल चुका है। 

भारतीय हिमालय क्षेत्र में 9575 हिमनद हैं। इनमें से 968 हिमनद सिर्फ उत्तराखंड में हैं। यदि ये हिमनद तेज़ी से पिघलते हैं, तो भारत, पाकिस्तान और चीन में भयावह बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। 

इसी तरह अंटार्कटिका में हर साल औसतन 150 अरब टन बर्फ पिघल रही है, जबकि ग्रीनलैंड की बर्फ और भी तेज़ी से पिघल रही है। वहाँ हर साल 270 अरब टन बर्फ पिघलने के आँकड़े दर्ज किए गए हैं। यदि यही हालात बने रहे, तो समुद्र में बढ़ता जलस्तर और खारे पानी का नदियों के जलभराव क्षेत्र में प्रवेश इन विशाल डेल्टाओं के बड़े हिस्से को नष्ट कर देगा।                                          

अल्मोड़ा स्थित पंडित गोविंद वल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमखंड का जो अगला हिस्सा टूटकर गिरा है, उसमें 2014 से बदलाव नज़र आ रहे थे। वैज्ञानिक इसका मुख्य कारण चतुरंगी और रक्तवर्ण हिमखंड का गोमुख हिमखंड पर बढ़ता दबाव मान रहे हैं। यह संस्था वर्ष 2000 से गोमुख हिमखंड का अध्ययन कर रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार 28 कि.मी. लंबा और 2 से 4 कि.मी. चौड़ा गोमुख हिमखंड 3 अन्य हिमखंडों से घिरा है। इसके दाईं ओर कीर्ति तथा बाईं ओर चतुरंगी व रक्तवर्णी हिमखंड हैं। इस संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कीर्ति कुमार ने बताया है कि हिमखंड की जो ताज़ा तस्वीरें और वीडियो देखने में आए हैं, उनसे पता चलता है कि गोमुख हिमखंड के दाईं ओर का हिस्सा आगे से टूटकर गिर पड़ा है। इसके कारण गोमुख की आकृति वाला हिस्सा दब गया है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तन के कारण भी हो सकता है, लेकिन सामान्य तौर से भी हिमखंड टूटकर गिरते रहते हैं। 

साफ है, इस तरह से यदि गंगा के उद्गम स्रोतों के हिमखंडों के टूटने का सिलसिला बना रहता है, तो कालांतर में गंगा की अविरलता तो प्रभावित होगी ही, गंगा की विलुप्ति का खतरा भी बढ़ता चला जाएगा। 

गंगा का संकट टूटते हिमखंड का ही नहीं हैं, बल्कि औद्योगिक विकास का भी है। कुछ समय पूर्व अखिल भारतीय किसान मज़दूर संगठन की तरफ से बुलाई गई जल संसद में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए जलस्रोतों के दुरुपयोग और इसकी छूट दिए जाने का भी विरोध किया था। कानपुर में गंगा के लिए चमड़ा, जूट और निजी बॉटलिंग प्लांट संकट बने हुए हैं। टिहरी बाँध बना तो सिंचाई के लिए था, लेकिन इसका पानी दिल्ली जैसे महानगरों में पेयजल आपूर्ति के लिए कंपनियों को दिया जा रहा है। गंगा के जलभराव क्षेत्र में खेतों के बीचों-बीच पेप्सी व कोक जैसी निजी कंपनियाँ बोतलबंद पानी के लिए बड़े-बड़े नलकूपों से पानी खींचकर एक ओर तो मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं खेतों में खड़ी फसल सुखाने का काम कर रही हैं। यमुना नदी से जेपी समूह के दो ताप बिजली घर प्रति घंटा 97 लाख लीटर पानी खींच रहे है। इससे जहाँ दिल्ली में जमुना पार इलाके के 10 लाख लोगों का जीवन प्रभावित होने का अंदेशा है, वहीं यमुना का जलभराव क्षेत्र तेज़ी से छीज रहा है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुमाकर की किताब स्मॉल इज़ ब्यूटीफुल 1973 में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने बड़े उद्योगों की बजाय छोटे उद्योग लगाने की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा था। उनका सुझाव था कि प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम उपयोग और ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन होना चाहिए। शुमाकर का मानना था कि प्रदूषण को झेलने की प्रकृति की भी एक सीमा होती है। सत्तर के दशक में उनकी इस चेतावनी का मज़ाक उड़ाया गया था; लेकिन अब जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले सरकारी और गैर-सरकारी संगठन शुमाकर की चेतावनी को स्वीकार रहे हैं। वैश्विक मौसम जिस तरह से करवट ले रहा है, उसका असर अब पूरी दुनिया पर दिखाई देने लगा है। भविष्य में इसका सबसे ज़्यादा खतरा एशियाई देशों पर पड़ेगा। एशिया में गरम दिन बढ़ सकते हैं या फिर सर्दी के दिनों की संख्या बढ़ सकती है। एकाएक भारी बारिश की घटनाएँ हो सकती हैं या फिर अचानक बादल फटने की घटनाएँ घट सकती हैं। न्यूनतम और अधिकतम दोनों तरह के तापमान में खासा परिवर्तन देखने में आ सकता है। इसका असर पारिस्थितिक तंत्र पर तो पड़ेगा ही, मानव समेत तमाम जंतुओं और पेड़-पौधों की ज़िंदगी पर भी पड़ेगा। लिहाज़ा, समय रहते चेतने की ज़रूरत है। स्लिम्स नदी का लुप्त होना और 10 हिमालयी नदियों के सूखने की चेतावनी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है।