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Jun 11, 2013

...तो प्रकृति चिट्ठी भेजना बंद कर देगी

...तो प्रकृति चिट्ठी भेजना बंद कर देगी
- अनुपम मिश्र
आज हर बात की तरह पानी का राजनीति भी चल निकली है। पानी तरल है, इसलिए उसकी राजनीति भी जरूरत से ज्यादा बहने लगी है। देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसे प्रकृति उसके लायक पानी न देती हो, लेकिन आज दो घरों, दो गाँवों, दो शहरों, दो राज्यों और दो देशों के बीच भी पानी को लेकर एक न एक लड़ाई हर जगह मिलेगी।
मौसम-विशेषज्ञ बताते हैं कि देश को हर साल मानसून का पानी निश्चित मात्रा में नहीं मिलता, उसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि प्रकृति 'आईएसआई मार्का तराजू लेकर पानी बाँटने निकलने वाली पनिहारिन नहीं है। तीसरी-चौथी कक्षा से हम सब जलचक्र पढ़ते हैं। अरब सागर से कैसे भाप बनती है, कितनी बड़ी मात्रा में वह 'नौतपा के दिनों में कैसे आती है, कैसे मानसून की हवाएँ बादलों को पश्चिम से, पूरब से उठाकर हिमालय तक ला जगह-जगह पानी गिराती हैं, हमारा साधारण किसान भी जानता है।  ऐसी बड़ी, दिव्य व्यवस्था में प्रकृति को मानक ढंग से पानी गिराने की परवाह नहीं रहती। फिर भी आप पाएँगे कि एकरूपता बनी रहती है।
पानी की राजनीति ने प्रकृति के इस स्वभाव को भूलने की अक्षम्य गलती की है। इसलिए हम प्रकृति से क्षमा नहीं पा सके हैं। हमने विकास की दौड़ में सब जगह एक सी आदतों का संसार रच दिया है, पानी की एक जैसी खर्चीली माँग करने वाली जीवन-शैली को आदर्श मान लिया है। अब सबको एक जैसी मात्रा में पानी चाहिए और जब नहीं मिल पाता तो हम सारा दोष प्रकृति पर, नदियों पर थोप देते हैं। अब हमारे सामने नदियों को जोडऩे की योजना भी रखी गई है। देश के जिस भूगोल ने लाखों साल की मेहनत से इस कोने से उस कोने तक तरह-तरह से छोटी-बड़ी नदियाँ निकाली, अब हम उसे दोष दे रहे हैं और चाहते हैं कि एक नदी कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्यों नहीं बही? अभी भी करने लायक छोटे-छोटे कामों के बदले अरबों रुपए की योजनाओं पर बात हो रही है। इस गोद में कुछ ही पहले तक हजारों नदियाँ खेलती थीं, उन सबको सुखाकर अब हम चार-पाँच नदियों को जोड़कर उनका पानी यहाँ-वहाँ ले जाना चाहते हैं।
जल संकट प्राय: गर्मियों के दिनों में आता था, अब वर्ष भर बना रहता है। ठंड के दिनों में भी शहरों में लोग नल निचोड़ते मिल जाएँगे। राजनीतिक रूप से जो शहर थोड़े संपन्न और जागरूक हैं, उनकी जरूरत पूरी करने के लिए पानी पड़ोस से उधार भी लिया जाता है और कहीं-कहीं तो चोरी से खींच लिया जाता है लेकिन बाकी पूरा देश जलसंकट से उबर नहीं पाता। इस बीच कुछ हज़ार करोड़ रुपए खर्च करके जलसंग्रह, पानी-रोको, जैसी कई योजनाएँ सामने आई हैं। वाटरशेड डेवलपमेंट अनेक सरकारों और सामाजिक संगठनों ने अपनाकर देखा है, लेकिन इसके खास परिणाम नहीं मिल पाए। शायद एक बड़ी गलती हमसे यह हो रही है कि हमने पानी रोकने के समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध तरीकों को पुराना या पंरपरागत करार देकर छोड़ दिया है। यदि कुछ लाख साल से प्रकृति ने पानी गिराने का तरीका नहीं बदला है , तो हम भी उसके सेवन के तरीके नहीं बदल सकते। 'आग लगने पर कुआँ खोदना पुरानी कहावत है। यही हम करते आ रहे हैं। प्यास लगती है, अकाल की आग लगती है, तो सरकार और समाज कुआँ खोदना शुरू कर देते हैं। कहावत में तो कुआँ खोदने पर शायद पानी निकलता भी है पर सरकारी आयोजनों और योजनाओं में इस पानी का रंग कुछ और ही दिखता है।
सागर और बूँद-
तालाब, बावड़ी जैसे पुराने तरीकों की विकास की नई योजनाओं में बहुत उपेक्षा हुई है। न सिर्फ शहरों में, बल्कि गाँवों में भी तालाबों को समतल कर मकान, दुकान, मैदान, बस स्टैंड बना लिये गए हैं। जो पानी यहाँ रुककर साल भर ठहरता था, उस इलाके के भूजल को ऊपर उठाता था, उसे हमने नष्ट कर दिया है। उसके बदले हमने आधुनिक ट्यूबवेल, नलकूप, हैंडपंप लगाकर पानी निकाला है। डालना बंद किया और निकालने की गति राक्षसी कर दी और मानते रहे कि सब कुछ हमारे अनुकूल चलेगा, लेकिन अब प्रकृति हमें हर साल चिट्ठी भेजकर याद दिला रही है कि हम गलती कर रहे है। इसकी सजा भुगतनी होगी। कभी पानी का प्रबंध और उसकी चिंता हमारे समाज के कर्तव्य-बोध के विशाल सागर की एक बूँद थी। सागर और बूँद एक दूसरे से जुड़े थे। बूँद अलग हो जाए तो न सागर रहे, न बूँद बचे। सात समुंदर पार से आए अंग्रेजों को न तो समाज के कर्तव्य-बोध का विशाल सागर दिख पाया, न उसकी बूँदें। उन्होंने अपने यहाँ के अनुभव और प्रशिक्षण के आधार पर यहाँ के राज में दस्तावेज जरूर खोजने की कोशिश की, लेकिन वैसे रिकार्ड राज में रखे नहीं जाते थे। इसलिए उन्होंने मान लिया कि यहाँ सारी व्यवस्था उन्हीं को करना है, यहाँ तो कुछ है ही नहीं। पिछले दौर के अभ्यस्त हाथ अकुशल कारीगरों में बदल दिए गए। ऐसे बहुत से लोग, जो गुनीजनखाना यानी गुणी माने गए जनों की सूची में थे, अनपढ़, असभ्य, अप्रशिक्षित माने जाने लगे।
न भूलें-
हमें भूलना नहीं चाहिए कि अकाल, सूखा, पानी की किल्लत, ये सब कभी अकेले नहीं आते। अच्छे विचारों और अच्छे कामों का अभाव पहले आ जाता है। हमारी धरती सचमुच मिट्टी की एक बड़ी गुल्लक है। इसमें 100 पैसा डालेंगे तो 100 पैसा निकाल सकेंगे। लेकिन डालना बंद कर देंगे और केवल निकालते रहेंगे तो प्रकृति चिट्ठी भेजना भी बंद करेगी और सीधे-सीधे सज़ा देगी। आज यह सज़ा सब जगह कम या ज्यादा मात्रा में मिलने लगी है। पंजाब और हरियाणा सूखे राज्य नहीं माने जाते, लेकिन आज इनमें भी पानी के बँटवारे को लेकर राजनीतिक कड़वाहट दिख रही है। इसी तरह दक्षिण में कर्नाटक और तमिलनाडु में कोई कम पानी नहीं गिरता, लेकिन इन सभी जगहों पर किसानों ने पानी की अधिक माँग करने वाली फसलें बोई हैं और अब उनके हिस्से का पानी उनकी प्यास नहीं बुझा पा रहा। ऐसे विवादों का जब राजनीतिक हल नहीं निकल पाएगा तो हमें ऊँची अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा। अदालत भी इसमें किसी एक के पक्ष में फैसला देगी तो दूसरे पक्ष में फैसला देगी तो दूसरे पक्ष को संतोष नहीं होगा। इसमें मुख्य समस्या प्यास की जरूरत की नहीं बची है और बनावटी प्यास और बनावटी जरूरत लंबे समय तक पूरी नहीं की जा सकेगी। कई बार जब अव्यवस्था बढ़ती जाती है, जन-नेतृत्व और सरकारी विभागों का निकम्मापन बढऩे लगा है तो दुर्भाग्य से एक ही हल दिखता है: राष्ट्रीयकरण के बदले निजीकरण कर दो। यही हल अब पानी के मामले में भी आगे रखा जाने लगा है। पहले हमारा समाज न राष्ट्रीयकरण जानता था और न निजीकरण। वह पानी का 'अपनाकरण करता था। अपनत्व की भावना से उसका उपयोग करता था। जहाँ जितना उपलब्ध था, उतना खर्च करता था, इसलिए कम से कम पानी के मामले में, जब तक बहुत सोची-समझी योजनाएँ फिर से सामने नहीं आएँगी, हम सब चुल्लू भर पानी में डूबते रहेंगे, लेकिन हमें शर्म नहीं आएगी। (इंडिया वाटर पोर्टल से)

बिना बिजली हरे-भरे एअरकंडीशनर्स



बिना बिजली हरे-भरे एअरकंडीशनर्स
- डॉ. किशोर पँवार
 पेड़-पौधे पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। इनसे हमारा नाता बहुत पुराना है। उनके फल खाए, फूलों से अपना शृंगार किया, लकड़ी से मकान बनाया, चूल्हा जलाया। और तो और, पेड़ तले तपस्या की, बुद्ध हुए।  पेड़ तरह-तरह के जीव जन्तुओं का बसेरा हैं। पेड़ एक बड़ा परिवार है जिसके सदस्य कई प्रजातियों के होते हैं, फिर भी रहते साथ-साथ हैं।

वृक्ष हमें खेती करने के औज़ार भी देते हैं और ऑक्सीजन भी। पेड़ों के इन्हीं सब उपकारों के चलते कल्पवृक्ष की कल्पना की गई होगी। इन्हीं के चलते पेड़ों को पूजा जाता है। भारतीय संस्कृति में पेड़ों में देवताओं का वास माना गया है। पर आज उनका बचना मुश्किल हो गया है।
पेड़ हमें ठंडी छाया भी देते हैं। नीम, पीपल, गूलर, गुलमोहर, शिरीष आदि की घनी छाया के क्या कहने। मई-जून के महीनों में डामर या सीमेंट की सड़कों के किनारे तपती दोपहर में मनुष्य तो मनुष्य, पशु भी छाया ढूँढ़ते नज़र आते हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर लम्बी-लम्बी सड़कों के किनारे-किनारे मीलों तक घने छायादार पेड़ लगवाए जाते हैं। याद कीजिए शेरशाह सूरी द्वारा बनवाई गई 2500 मील लंबी ग्रांट ट्रंक रोड। इसके दोनों किनारों पर उन्होंने छायादार वृक्ष लगवाए थे। कहते हैं सम्राट अशोक ने भी अपने शासन काल में आम, इमली, पीपल जैसे छायादार वृक्ष लगवाए थे।
पेड़ हमें केवल अपनी छाया ही नहीं देते बल्कि अपने आस-पास का पर्यावरण भी सुधारते हैं। वे अपने चारों ओर की हवा को ठंडा रखते हैं। साथ ही ज़हरीली गैसों के प्रदूषण का पान करके वायुमंडल को लगातार साफ करते रहते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड तो उनके भोजन का हिस्सा है ही। इसके अतिरिक्त वे हवा में उपस्थित नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड, क्लोरीन व अमोनिया को भी अपने शरीर में जमा करते रहते हैं।
दुनिया भर में पेड़ों की इस महत्त्वपूर्ण भूमिका अर्थात् स्थानीय स्तर पर वातावरण परिवर्तन को लेकर बहुत काम हुआ है। स्थानीय स्तर पर होने वाले ये परिवर्तन सूक्ष्म जलवायु चुनौतियाँ कहलाते हैं। किसी बाग-बगीचे, शहर या गाँव की जलवायु को वहाँ की सूक्ष्म जलवायु कहते हैं। एक पेड़ के नीचे और उसके आस-पास की जलवायु को पेड़ की सूक्ष्म जलवायु  कहा जाता है। वहाँ का ताप, नमी, प्रकाश की मात्रा एवं हवा के बहने की दर पेड़ से बहुत दूर वाले स्थान से अलग होती है। पेड़ का उसके आस-पास पडऩे वाला यह असर ही उसकी सूक्ष्म जलवायु तय करता है।
अध्ययनों से पता चलता है कि पेड़ों के आस-पास की हवा का तापमान गर्मियों में खुले स्थानों की अपेक्षा 2 डिग्री सेल्सियस कम होता है। सेंटामोरिस द्वारा 2001 में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि एक पेड़ पाँच एअरकंडीशनर के बराबर हवा ठंडी कर इतनी ही ऊर्जा बचाता है। दरअसल पेड़ सूर्य की ऊर्जा से चलने वाले एअरकंडीशनर हैं। ये कृत्रिम मशीन की तरह अंदर की हवा को ठंडी कर बाहर गर्म हवा नहीं फेंकते। इस दिशा में अध्ययनरत वैज्ञानिक अकबरी का कहना है कि पेड़ों के द्वारा की गई एअरकंडीशनिंग से धुंध-धुआँ प्रदूषण भी कम होता है। एक पेड़ द्वारा किए जाने वाले इस कार्य की कीमत 200 डॉलर आँकी गई है।
खुले में बने घर की तुलना में पेड़ों की छाया तले बना घर प्राकृतिक वातानुकूलन कर प्रति वर्ष लगभग 25 प्रतिशत ऊर्जा की बचत करता है। ब्राउन और कोजेल के अनुसार पेड़ों का यह गुण उनके आकार, ऊँचाई, पत्तियों के घनत्व, शाखाओं की संख्या और पत्तियों के विभिन्न गुणों पर निर्भर होता है। स्थान विशेष की सूक्ष्म जलवायु के नियंत्रण के लिहाज़ से पतझड़ी वृक्षों की तुलना में सदाबहार वृक्ष ज़्यादा उपयोगी पाए गए हैं। साल भर उन पर लगी पत्तियों से विकिरण ऊर्जा का नियंत्रण और धूप की गर्मी का घटना साल भर चलता रहता है जबकि पतझड़ी वृक्ष पतझड़ के बाद ऐसा नहीं कर पाते। इस तरह समान आकार के नीम और पीपल की तुलना में बरगद, गूलर और मौलश्री के पेड़ ज़्यादा उपयोगी हैं।
पेड़ों की छाया सिर्फ अपने आस-पास की हवा को ही ठंडा नहीं रखती। इस छाया के चलते धूप की चमक और गर्मी धरातल पर नहीं पहुँचती। इस तरह वृक्षों के कारण आस-पास के भवन व सड़क आदि भी खुले स्थानों वाले घरों की तुलना में अपेक्षाकृत कम गर्म होते है। 1988 में अर्धशहरी क्षेत्र में किया गया एक अध्ययन बताता है कि जहाँ वृक्ष ज़्यादा होते हैं वहाँ दिन का तापमान वृक्षविहीन स्थानों की अपेक्षा 1.7 से 3.3 डिग्री सेल्सियस तक कम होता है। फ्लोरिडा में बड़े पेड़ों के कारण तापमान 3.6 डिग्री सेल्सियस तक कम पाया गया।
अकबरी का मानना है कि वृक्षों का आच्छादन 25 प्रतिशत बढ़ा देने से आस-पास का तापमान 3.3 से 5.6 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है। पेड़ दो तरीकों से हमें तेज़ गर्मी से राहत पहुँचाते हैं। एक तो सीधे अपनी पत्तियों से सौर विकिरण को रोककर हमें छाया देते हैं। कुछ प्रकाश को पत्तियाँ परावर्तित भी कर देती हैं। दूसरा तरीका है वाष्पीकरण। पत्तियों के ऊपर और नीचे स्थित लाखों वायु छिद्रों (स्टोमेटा) द्वारा पत्तियों पर गिरने वाली धूप की गर्मी से पत्तियों के अन्दर का पानी वाष्प के रूप में उड़ता रहता है। यह क्रिया वाष्पोत्सर्जन कहलाती है। इस क्रिया के कारण पत्तियाँ हवा की तुलना में ठंडी बनी रहती हैं। इन पत्तियों से टकराकर आने वाली हवा भी ठंडी हो जाती है।
स्थानीय जलवायु में पेड़ों की इस भूमिका को लेकर देश में अध्ययन कम ही हुए हैं। इंदौर के होल्कर कॉलेज के परिसर में लगे विभिन्न प्रजातियों के पेड़ों की हवा को ठंडी करने की क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन शुरू किया गया है। शुरुआती नतीजे उत्साहवर्धक हैं। नीम और यूकेलिप्टस की तुलना में बरगद ज़्यादा प्रभावी पाया गया है। एक पेड़ अपने आस-पास कितनी दूरी तक हवा को ठंडी कर पाता है ऐसा अध्ययन जारी है। एक बात तो तय है -पेड़ लगाना बिना ऊर्जा खर्च किए ठंडी हवा पाने का एक बढिय़ा तरीका है। अत: प्राकृतिक एअरकंडीशनिंग के लिए ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाएँ। इससे पक्षियों को बसेरा एवं खाने को फल मिलेंगे और हमें स्वच्छ ठंडी हवा। (स्रोत फीचर्स)

चिंतन

छत्तीसगढ़ बनाम आंध्र प्रदेश का मसला?
- विनोद साव
बस्तर में नक्सलवाद के नाम से आरंभ हुए आंदोलन को कई दशक बीत चुके हैं और पिछले दो दशक के भीतर इस आंदोलन की आक्रामकता ने किसी साम्प्रादायिक दंगे -सा रूप धर लिया है जो और भी आगे चलकर एक दीर्घकालीन आतंकवादी हमले में तब्दील हो गई है। एक निश्चिंत विचारधारा को लेकर शुरू हुई इस लड़ाई ने जघन्य हिंसा और मारकाट का ऐसा भयावह चित्र प्रस्तुत किया है कि अब यह विचार-शून्यता- जनित लड़ाई लग रही है। जनता के लिए हक और आवाज का हल्ला बोल करने वाले लोगों की हिंसा और संवेदनहीनता को देखकर अब जनता खुद हतप्रभ हो रही है। स्पष्ट दिख रहा है कि अब यह जन-आंदोलन नहीं बल्कि अपना आधिपात्य जमाने और एक वर्ग-विशेष के लिए माल हड़पने या दूसरों के माल पर कब्जा जमाने के लिए किए जाने वाले हमले हैं। यह सीधे-सीधे भूमि अतिक्रमण करने और नैसर्गिक  स्रोतों पर नाजायज कब्जा जमाने के पैंतरे और रणनीतियाँ हैं।  बस्तर का यह नक्सलवादी आंदोलन कहीं छत्तीसगढ़ बनाम आंध्रप्रदेश का मसला तो नहीं है? इस नक्सलवादी आंदोलन पर यह विचार किया जा सकता है कि यह एक वर्ग-विशेष के मुनाफे के लिए वर्चस्व स्थापना की लड़ाई तो नहीं है?
छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की गिरफ्त में है और इस मुहिम से अपने पड़ोसी राज्यों से घिरा हुआ है।  बिहार (झारखंड), उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र उसके ये चार पड़ोसी राज्य ऐसे हैं, जो लम्बे समय से नक्सल समस्या से ग्रस्त रहे हैं। यह नक्सलबाड़ी आंदोलन के नाम से बंगाल से आरंभ हुआ था, फिर बिहार इसके प्रभाव में आया और उसी मार्ग पर चलते हुए इसने उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में अपना कब्जा जमाया। आश्चर्यजनक है कि बंगाल में जिस  घुर दक्षिणपंथ (आर.एस.एस.) और धुर वामपंथ (नक्सलवाद) की स्थापना हुई थी इन दोनों अतिवादी विचारधाराओं से बंगाल ने ही सबसे पहले अपना पल्ला झाड़ लिया। इस कदर पल्ला झाड़ा कि नक्सलवाद तो दूर बल्कि कट्टर कम्युनिस्टों की सत्ता को भी वहाँ से उखाड़ फेंका। अब तो बिहार, उड़ीसा और महाराष्ट्र में कुछ जागरण आया है और नक्सलवाद का प्रभाव कम हुआ है।
बिहार के तेजस्वी बिहारियों के तेवर और तासीर कुछ इस तरह से रहे हैं कि वहाँ उनसे अधिक उर्जावान् कोई दूसरा आंदोलनकर्मी नहीं हो सकता। बिहार के पड़ोसी राज्यों में पनपने वाले नक्सलवादियों के बंगाल कैडर या उड़ीसा या आंध्रा कैडर बिहार पर कहर नहीं ढा सकते। बिहारियों के साहस और बल प्रयोग के सामने विध्वंसकारी संगठन कमजोर पड़ जाते हैं। इस मायने में बिहार की आत्म-निर्भरता ने उसे नक्सलवाद के तांडव से छुटकारा दिला दिया है और अब वह पहले की तुलना में अधिक विकास के रास्ते पर अग्रसर है।
अब रह गए हैं उड़ीसा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़। ये तीनों राज्य बिल्कुल सटे हुए राज्य हैं और इनके पड़ोसी क्षेत्र के रहवासी सामाजिक आर्थिक दृष्टि से लगभग समान रहे हैं। इन राज्यों के लोगों की कदकाठी एक समान है। इनमें हीनता, दीनता और नम्रता भी एक जैसी रही है। ये तीनों राज्य आंध्र प्रदेश के पड़ोसी राज्य हैं और इन सबके मुकाबले में आंध्र प्रदेश आबादी और क्षेत्रफल की दृष्टि से एक बड़ा राज्य रहा है। आंध्र प्रदेश दक्षिण के सभी राज्यों का सिरमौर रहा है। यहाँ के जनमानस तुलनात्मक रुप से आकर्षक कद-काठी के रहे हैं। इनके रूप रंग में साँवला-सलोनापन रहा है। ये भागने, दौडऩे और छलांग लगाने वाले एथलेटिक खेलों में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं। जिस तरह बंगाल का सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल रहा है उस तरह आंध्र में सबसे लोकप्रिय खेल व्हालीबाल रहा है। व्हालीबाल के खिलाडिय़ों के लिए जो छरहरापन और ऊँचा कद चाहिए वह आंध्र प्रदेश के तेलगु जनमानस में कहीं भी दिख जाता है। ये मीना बाजार, सरकस और सिनेमा के स्टंट सीन में भी माहिर हैं। ये कुशल नर्तक होते हैं। इन्होंने तेलगु फिल्मों को ऊँचाइयाँ दी हैं। एक तरफ इन्होंने पौराणिकता से भरी फिल्में बनाईं हैं तो दूसरी ओर जापानी फिल्मों की तरह जूड़ो कराते से भरी मारधाड़ फिल्में आज यहाँ सबसे ज्यादा बन रही हैं। इनकी चुस्ती-फुरती देखते बनती है। उनकी यह निपुणता उस समय कहर ढाती है जब ये रचनात्मक कार्यों से दिशाहीन होकर अपराध या किसी विध्वंसकारी संगठन की ओर चल पड़ते हैं, तब गुणों की यही खान अवगुणों की भयंकर खाई में बदल जाती है। संभवत: यही दिशाहीनता नक्सलवाद के आंध्रा कैडर में भरपूर रूप से देखी जा सकती है।
बस्तर के नक्सलवाद में सबसे बड़ा, सबसे सक्रिय, कट्टर, लड़ाकू और प्रभुतावादी संगठन यही आंध्रा कैडर है। इसी कैडर ने पिछले दिनों बस्तर में कांग्रेस के योग्य राजनेताओं पर कहर ढाया और उन्हें नृशंस हत्या के हवाले किया है। बस्तर के नक्सवादी संगठनों को 'दलम और 'संघम जैसे नामों से पुकारा जाता है। जाहिर है ये शब्द तेलुगु भाषा के शब्द हैं। यहाँ मारे और पकड़े जाने वाले नक्सलियों की सूची पर गौर किया जाए तो इनमें सबसे बड़ा प्रतिशत तेलुगु नक्सलियों का है जहाँ पापाराव, राजाराव, रेड्डी, सीम्हाचलम जैसे नामों की भरमार मिलेगी। इनके दबाव और प्रभाव में आकर छत्तीसगढ़ में भी कुछ नक्सली बने तो हैं पर इनकी संख्या नगण्य है। एक बार भिलाई के एक पुलिस महानिरीक्षक का बयान आया था कि भिलाई के आसपास सबसे ज्यादा अपराधी आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और बिहार से आए लोगों का है और इन्हें इनके स्थानीय रिश्तेदार संरक्षण देते हैं और इसलिए इनका पकड़ में आना मुश्किल होता है।
जिन छत्तीसगढिय़ा नक्सलियों ने आत्म-समर्पण किया है, उसमें ये बातें भी सामने आई हैं कि नक्सलवाद में भी क्षेत्रीयता की भावना जोरों पर है। दमन और अत्याचार के समय यह भी देखा जाता है कि प्रताडऩा की सजा पा रहा नक्सली छत्तीसगढिय़ा है या तेलुगु। पिछले हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल इसलिए भी बच गए ; क्योंकि उनका ड्राइवर तेलुगु में बोल रहा था और चिल्लाकर नक्सलियों से कह रहा था कि वह आंध्रा से आया है और उसकी कार में कोई नेता नहीं आंध्रा का एक व्यापारी बैठा हुआ है।
बस्तर के जंगलों में आंध्रा कैडर का वर्चस्व रहा तो सरगुजा के वनांचल में बिहार और उड़ीसा के नक्सलवादी संगठनों का हाथ रहा है। दरअसल, छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य रहा है ,जहाँ की लगभग आधी आबादी दूसरे प्रदेशों से आए लोगों की है... और इस बाहरी आबादी का आधे से अधिक प्रतिशत उनके इन्हीं पड़ोसी राज्यों से आए हुए लोगों का है। अपनी आबादी के इसी अनुपात के कारण भी छत्तीसगढ़ के राजनीतिक समीकरण में संतुलन का अभाव दिखता है और यह राज्य इस प्रदेश की प्रकृति व भावना के अनुरुप नहीं बन पा रहा है।
नक्सलवाद का पूरे छत्तीसगढ़ में जम जाने के सबसे बड़े दो कारण हैं- एक यह कि यहाँ के जनमानस में विरोध करने की प्रकृति और लड़ाकूपन नहीं है। ये सामान्य कद काठी के लोग हैं जो नुकसान उठाकर भी चुपचाप सहन करने की क्षमता के साथ सीधा-सादा जीवन व्यापन करते हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस के सिपाहियों में भी यह नम्र व अहिंसक प्रकृति देखी जा सकती है और इस प्रकृति के कारण भी छत्तीसगढ़ पुलिस आंध्रा कैडर के नक्सलियों के सामने कमजोर बैठती है। दूसरा बड़ा कारण है यहाँ वनांचलों में प्राप्त अकूत नैसर्गिक स्रोत। नक्सलवादी संगठन जो एक समय में वंचित, पीडि़त और दलित जनता के संरक्षण के अभियान तले छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों में आए होंगे, तब एक तरफ  उन्हें इन पहाड़ी युक्त घने जंगलों और बीहड़ों में अपने अभियान को गति देने के लिए उपयुक्त ठौर दिखा होगा वहीं बाद में इनके नैसर्गिक स्रोतों, इमारती लकडिय़ों, फूलों-फलों, अन्य वनोपजों, स्वच्छ नदियों, झरनों, भोले भाले आदिवासियों और उनकी सुगठित देहयष्टि वाली स्त्रियों को देखकर कालांतर में उनकी मंशा और नीयत में बदलाव आया होगा और वे इस सुन्दर व भरे पूरे वन परिक्षेत्र में बस जाने और यहॉ राज करने की लालसा उनकी बढ़ी होगी। 
अब के नक्सलवाद में राज करने की यही चेष्टा स्पष्ट देखी जा सकती है। अपने लम्बे इतिहास और दीर्घकालीन अनुभव से उन्होंने राज्य की सत्ता के समानांतर अपना भरापूरा संगठन खड़ा कर लिया है। इनके पास लाखों लोग हैं, करोड़ों का धन है, आधुनिक उपकरणों से युक्त कमांडो व सैन्य शक्ति है। इतना कि ये समानांतर सरकार चलाने का दावा और फरमान जारी करते हैं। हर राज्य की सरकारों से ये उम्मीद करते हैं कि राज्य के मैदानी क्षेत्र को तुम देखो और जंगल हमारे लिए छोड़ दो। इसके लिए ये सरकार से टकराव लेते रहते हैं और अपना शक्ति व शौर्य प्रदर्शन करते रहते हैं। अपने हमलों से ये साबित करते हैं अब यहाँ केवल जंगल राज है।
कभी छत्तीसगढ़ के एक पृथक्तावादी कवि ने गीत गुँजाया था कि 'हर जवान जब हो जायेगा दीवाना- तब छत्तीसगढ़ कहलाएगा तेलंगाना।’  उनके गीत का यह उल्टा असर छत्तीसगढ़ में देखा जा सकता है कि अब छत्तीसगढ़ किस तरह से तेलंगाना हो गया है।

एलिवेशनल म्यूरल


लोक को कला से जोड़ता माध्यम
 - संदीप राशिनकर

  अभिव्यक्ति के परिचित एवं प्रचलित माध्यम भाषा, बोलियों और लिपियों के इस दौर में यह जानना कम रोचक नहीं होगा कि मानव की विकास यात्रा में भाषा-लिपियों का आविष्कार मानव उत्पत्ति के लंबे समय बाद हुआ। पारस्परिक अभिव्यक्ति का पुरातन माध्यम निश्चित ही चित्र रहा है। जिसके प्रमाण हमें विश्वभर में फैले शैलाश्रयों/गुफाओं में शैलचित्रों के रूप में मिलते है।
भित्तिचित्र कहलाने वाली विद्या म्यूरल की परंपरा का विकास भले ही मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभिक काल में शैलचित्रों के रूप में हुआ हो किंतु इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि अभियक्ति की यह पुरातन व प्रभावी शैली सभ्यता की विकास यात्रा में कही पीछे छूटकर गुम हो गयी।
कला और आम मानस के बीच बढ़ती हुई खाइयों के रस दौर में आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया है। कि आम मानस में कला बोध  जाग्रत हो संवर्धित हो। जनमानस और समाज में कला बोध जागृत करने का जरिया कभी भी कला विथिकाएँ या आर्ट गैलेरी नहीं हो सकता। हमें लोगों को हाँककर कला वीथिकाओं तक ले जाने  के बनिस्बत कला को लोगों के बीच ले जाने का जतन करना होगा।
सार्वजनिक स्थलों में ठेठ लोगों के बीच कला की स्थायी और प्रभावी उपस्थिति के लिए भवनों के आमुखों से उपयुक्त और क्या कैनवास हो सकता है? इसी सोच का रचनात्मक परिणाम है, भवनों के आमुखों पर सृजित भित्तिचित्र, और यही है एलिवेशनल म्यूरल।
 दो दिशाओं में विस्तारित होते भित्तिचित्र भवनों के आमुखों पर आते-आते अभिव्यक्ति में तीसरी दिशा प्रोजेक्शन्स / रिसेशन को समाहित कर रिलीफ में तब्दील हो गए। भित्तिचित्रों से भित्तिशिल्पों में रूपांतरित होते ये एलिवेशनल म्यूरल दर्शकों को चित्रों के साथ-साथ शिल्पों की अनुभूति से सराबोर करते है। भवनों की आयु तक उसका अभिन्न हिस्सा बनी रहने वाली यह अद्भुत कलाभिव्यक्ति न सिर्फ एक शाश्वत कला प्रदर्शन है वरन् लोगों के बीच होने से परोक्ष या अपरोक्ष  रूप से  जनमानस की कला दृष्टि / कला अभिरुचि को विकसित करने में सफल सिद्ध होती है।
 एलिवेशनल म्यूरल भवन का एक स्थायी भाग होने से इसकी संरचना, माध्यम और सृजन प्रक्रिया में तकनीकी जानकारी, सोच व प्रक्रिया की अहम भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
आपकी यह कलाकृति कोई सुरक्षित या वातानुकूलित परिसर में सुशोभित नहीं होने जा रही है, उसे तो खुले में सारी ऋतुओं, आपदाओं, विपदाओं से बाबस्ता होना है।  जरूरी  है कि उसका सृजन, उसका माध्यम व उसकी संरचना ऐसी दृढ़ता सहेजे हो जो न सिर्फ वातावरण के विभन्न प्रभावों से सुरक्षित रहे वरन् रख रखाव के स्तर पर भी अपेक्षाओं से रहित हो।
    समाज में कला -संवर्धन की दृष्टि के साथ ही एलिवेशनल म्यूरल किसी भी वस्तु में समाहित वह तत्व है जो मात्र स्वयं के बूते पूरी वास्तु को विशिष्टता प्रदान करने का माद्दा रखता है। आदिकाल से आज तक मानव के मन में विशिष्टता के प्रति एक गहरा रुझान रहा है। कपड़े हो, रहन-सहन हो या भवन हो हर पक्ष हर स्तर पर मनुष्य नवीनता चाहता है। विशिष्टता चाहता है। भवन के क्षेत्र में विशिष्टता की चाहत का समाधान है। एलिवेशनल म्यूरल।
    मेरी मान्यता है कि लेटेस्ट आर्किटेक्चर और कास्टलिएस्ट फिनिश भवनों को वह सार्वकालिक विशिष्टता नहीं दे सकते , जो एक एलिवेशनल म्यूरल दे सकता है। आर्किटक्चर जहाँ एक ट्रेंड है वहीं फिनिशेस मार्केट आइटम है जिसकी पुनरावृत्ति संभव ही नहीं अवश्यंभावी है। कला व तकनीक के सुनियोजित एवं रचनात्मक संयोजन से एलिवेशनल म्यूरल्स में फाम्र्स मटेरियल माध्यम और संरचना के स्तर पर निश्चित ही संभावनाओं का एक भरा पूरा वितान है।
    जहाँ तक इसमें निहित व्यय का प्रश्न है जो जनमानस में कला की कीमतों और कला के बाजारीकरण के चलते यह भ्रम मन में बैठ चुका है कि कला या म्यूरल्स आम की नहीं खास की जागीर है। कलाकारों को चाहिए कि कला की आम मानस में पैठ के लिए ऐसे प्रामाणिक प्रयास करें कि कला जन-जन की हमराह बन सके।
एलिवेशनल म्यूरल के क्षेत्र में लेखक के द्वारा किए गए समर्पित और प्रमाणिक प्रयासों के चलते अल्प परिचित यह विद्या अमीरों के ही नहीं सामान्यजन के भवनों को भी अपनी कला सुरभि से सुरभित कर रही है। संरचना माध्यम की लंबी शृंखला में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम हर आर्थिक स्तर के लिए म्यूरल्स का सृजन कर सकें।
    निरंतरता से न सिर्फ सृजन के स्तर पर वरन् तकनीक के स्तर पर भी इस विद्या के वैशिष्ट्य को संवर्धित किए जाने की महती आवश्यकता है। यह कलाभिव्यक्ति का वह आयाम है जो निश्चित ही विध्वंस के इस दौर में जनमानस में सृजन व कला के प्रति आसक्ति का अंकुरण कर परिवेश को कलात्मक व रचनात्मक बनाने का मुद्दा रखता है।  
      
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लंबा जीवन चाहिए तो भलाई कीजि



लंबा जीवन चाहिए तो भलाई कीजिए
अगर आपको लंबा जीवन चाहिए तो दूसरों की भलाई कीजिए। यह बात हम नहीं बल्कि एक अध्ययन में कही गई है। एक अमेरिकी अध्ययन में यह बात सामने आई है। इस अध्ययन में 10,317 कॉलेज छात्रों को शामिल किया गया था। इन छात्रों के 1957 में स्नातक करने के बाद से ही उन पर अध्ययन किया जा रहा था। समाचार पत्र 'डेली एक्सप्रेस के मुताबिक इन छात्रों से साल 2004 में कहा गया कि वे बीते 10 सालों में नियमित रूप से उनके द्वारा किए गए स्वैच्छिक कार्यों के संबंध में बताए। चार साल बाद ऐसे 4.3 प्रतिशत लोगों की मौत हो गई जिन्होंने स्वैच्छिक कार्य नहीं किए थे ;जबकि स्वैच्छिक कार्य करने वाले चार प्रतिशत लोगों की ही मौत हुई । जिन लोगों के कार्य दूसरों की खुशी को ध्यान में रखकर किए गए थे उनमें से केवल 1.6 प्रतिशत लोगों की मौत हुई। अध्ययनकर्ता आंद्रेई फुरल फोर्बिस के मुताबिक यह कहना उचित है कि इससे लोगों का फायदा होता है इसलिए उन्हें दूसरों के लिए स्वैच्छिक रूप से काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैसे शोध में देखा गया है कि जो लोग खुद के फायदे के लिए स्वैच्छिक कार्य करते हैं उन्हें इससे ज्यादा लाभ नहीं होता है ।