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Dec 3, 2025

आलेखः देश का आभूषण है संस्कृति

- शीला मिश्रा

    हम जिस देश में रहते हैं उसकी सबसे छोटी व सशक्त इकाई है परिवार। इस इकाई में रचे- बसे-पुष्पित-पल्लवित संस्कार ही समाज की संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और जिस देश का सामाजिक ढाँचा मजबूत होता है वह देश स्वयमेव मजबूत व सशक्त हो जाता है। मार्क ट्वेन ने कहा था कि "भारत केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं है ; अपितु यह वह देश है जहाँ सभ्यता व परंपरा सबसे पहले जन्मी और पनपीं । यही वह देश है जिसने पूरे विश्व को सभ्यता व संस्कृति का पाठ पढ़ाया।" यह कैसी विडंबना है कि पूरे विश्व को सभ्यता व संस्कृति की सीख देने वाले हम अपने देश में इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि हमारे बच्चे संस्कारविहीन क्यों होते जा रहे हैं?

   आज समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार में जिस तरह से नैतिक और सामाजिक मूल्यों का विघटन हो रहा है वह निश्चित ही चिंता का विषय है। चूँकि बच्चे की प्रथम शिक्षक माँ होती है तो यह उसका दायित्व है कि वह बच्चे को संस्कारित करें किंतु दुख इस बात का है कि बच्चा आया या नौकर के भरोसे पल रहा है और मोबाइल या टीवी में कार्टून देखते हुए भोजन ग्रहण कर रहा है। बचपन से ही बच्चे को माँ अपना समय नहीं दे पा रही है तो वह नैतिक और सामाजिक मूल्यों को किस प्रकार सीखेगा? यह नैतिक मूल्य कोई रटंत विद्या नहीं है यह मूल्य तो अपने व्यवहार के द्वारा बच्चों के मन में रोपित किए जाते हैं। जब बच्चा यह देखता है कि माँ सुबह उठकर अपने घर के बुजुर्गों के चरण स्पर्श करती है< फिर स्नान करके स्वच्छता से भोजन तैयार करती है, ईश्वर की आराधना करती है और बड़े-बुजुर्गों को आग्रहपूर्वक खाना खिलाती है तो उसके मन में बड़ों के प्रति सम्मान की भावना जागृत होती है और इस तरह के संस्कार उसके मस्तिष्क पर अंकित हो जाते हैं। जब कोई मेहमान घर पर आता है तो वह देखता है कि किस प्रकार से उनका अभिवादन किया जाता है, स्वागत सत्कार किया जाता है, सामर्थ्य के अनुसार जलपान कराया जाता है तो वह बड़ों का मान करना सीखता है, मिल - बाँटकर खाना सीखता है।

   जब त्योहार में बच्चा अपने दादा-दादी के घर जाता है तो वह देखता है कि कैसे पूरा परिवार एक साथ मिलकर त्योहार की तैयारी करते हैं, घर-द्वार सजाते हैं, ईश्वर की आराधना करते हैं, तरह-तरह के पकवान व मिष्ठान्न बनाते हैं और खिलाते हैं, निर्धनों को भोजन व वस्त्र देकर उनको भी खुश रखते हैं। इस प्रकार वह न केवल हमारी संस्कृति से परिचित होता है अपितु सामाजिक समरसता को सीखता है, समर्पण का महत्त्व समझता है, कला व संगीत को सीखता है, धर्म को जानता है और आपसी स्नेह, सहयोग व प्रेम की संवेदना से पूरित होता है।

   आँगन में माँ के साथ  बैठकर जब बच्चा कलरव कर रहे पक्षियों को देखता है, थोड़े से पानी में पक्षियों के एक समूह को मिलकर चोंच डुबोकर पानी पीते हुए देखता है, कबूतर को दाना चुगते और आकाश में उड़ते पक्षियों को देखता है, पेड़-पौधों को पानी देता है तब वह वास्तव में प्रकृति के नजदीक जाकर उसे देखता है, समझता है तथा उससे प्रेम करना सीखता है लेकिन यह तभी संभव है कि जब एक बालक के माता-पिता या घर के बुजुर्ग कुछ समय उसके साथ व्यतीत करें।

   वर्तमान समय में  बच्चा भौतिकतापूर्ण जीवन शैली के प्रति आकर्षित हो रहा है। इसके पीछे मूल कारण यही है कि अपनी भागम-  भाग वाली जीवन शैली में मगन माता -पिता उसे टी वी के समक्ष बिठाकर अपने कार्य में गुणवत्ता तो ले आते हैं; परन्तु वह अबोध बच्चा टी. वी. में दिखाए जा रहे जीवन को ही वास्तविक दुनिया मानकर उसके प्रति आकर्षित होने लगता है। वह टी वी के विज्ञापनों को देखकर महँगे सामानों की फरमाइश करता है, जिन्हें  पाकर अपने कमरे में कैद हो जाता है। छुट्टियों में दादा-दादी के घर जाने के बजाय मनोरंजनक टूर पर जाना पसंद करता है। इसीलिए अपने दादा-दादी, नाना नानी, चचेरे भाई बहनों व माता-पिता से उसकी संवादहीनता बढ़ती चली जाती है और रिश्तों में एक तरह की शुष्कता आती जा रही है। जहाँ पहले हमारे आपसी संबंधों में प्रेम व स्नेह का सोता कल-कल कर बहता रहता था, आज वह सोता सूखता जा रहा है, अध्यात्म का भाव लुप्त होता जा रहा है, बड़ों के प्रति सम्मान की भावना कम होती जा रही है और यह बातें इस बात की ओर संकेत करती हैं कि कैसे पश्चिमी सभ्यता हमारी नौनिहालों को अपनी तरफ आकर्षित कर रही है। समय से सचेत हो जाना ही इस समस्या का समाधान है। दंपति कितने ही व्यस्त क्यों न हों, माह में एक बार किसी नजदीकी गाँव में बच्चे के साथ जाकर उसे प्राकृतिक जीवन के बारे में बताएँ। प्रकृति का महत्त्व बतलाएँ। ग्रामीण जीवन में सहयोग व समर्पण की भावना ही उन्हें जोड़कर रखती है। यह छोटी -छोटी बातें बालमन को बड़ी सीख दे जाती हैं; इसलिए माता -पिता का दायित्व है कि वे आर्थिक संपन्नता की और आकर्षित न होकर बच्चों को नैतिक मूल्यों से संपन्न बनाएँ , तभी हम सांस्कृतिक मूल्यों से समृद्ध परिवार, समाज व राष्ट्र की स्थापना कर पाएँगें।

सम्पर्क: बी-4, सेक्टर -2, रॉयल रेसीडेंसी, शाहपुरा थाने के पास, बावड़ियाँ कलां, भोपाल- 462039, मो. 9977655565

8 comments:

  1. Anonymous26 December

    मनुष्य का अनमोल खजाना उसकी संस्कृति है...

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    1. Anonymous26 December

      बिल्कुल सही कहा आपने
      शीला मिश्रा

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  2. सोचनीय प्रश्न है। यह आलेख मजबूर करता है कि हमारा समाज आखिर जा कहाँ रहा है?

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    1. Anonymous26 December

      आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

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  3. Dr.Kanak Lata26 December

    परिवर्तन प्रकृति का नियम है और उस परिवर्तन के साथ ख़ुद को ढालना भी अत्यंत आवश्यक है परन्तु साथ ही इस बात का भी विशेष ध्यान रखना है कि परिवर्तन के सकारात्मक पक्ष को स्वीकार करते हुए उसके नकारात्मक पक्ष से हम स्वयं को तथा हमारे परिवार को बचा सकें। हमारी संस्कृति हमारी बहुमूल्य धरोहर है, ये हम स्वयं भी समझें और आने वाली पीढ़िlयों को भी इस धरोहर को सहेजने के लिए प्रेरित करें।

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  4. Anonymous28 December

    परिवार एक संस्था होती है जहाँ कुछ उसूल प्राथमिकता पाकर पनपते हैं
    संस्कृति को संयम के साथ जोड़कर बड़े छोटों के लिए उदाहरण बन सकते हैं
    और नियमित कुछ परम्परायें साथ प्रार्थना करने की
    वि भोजन एक साथ करने की परंपरा भी कारगर रहती है
    रिश्तों के बीच संवाद व सोच की लें देन ज़रूरी है

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  5. Anonymous28 December

    सच में ,आज धन की प्रधानता ने सामाजिकव मानवीय मूल्यों को ताक पर रख दिया है। इस कारण ही आज की पीढ़ी संस्कारों से विमुख होती जा रही है।
    शीला मिश्रा

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  6. विचारणीय आलेख।

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