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Feb 1, 2021

नवगीतः दिल्ली के उन राजपथों से


 -शिवानन्द सिंह सहयोगी’, मेरठ

शहरों में हैं,

पर शहरों की चकाचौंध से,

अभी अछूते हैं |

 

जिसका है घरबार न उसका

आसमान घर है,

मौसम की इस शीत लहर का

असमंजस, डर है,

मजदूरी के,

कई अभावों की छानी के

दर्द अकूते हैं |

 

दिल्ली के उन राजपथों से

मिलती पगडण्डी,

खपरैलों से छाई छत की

फटेहाल बंडी,

देखा भी है,

कई प्रेमचंदों के पग में,

फटहे जूते हैं |

 

गरमाहट के लिए न आते

किरणों के हीटर,

बिन बिजली उपभोग दौड़ते,

बिजली के मीटर,

घासफूस की,

झोंपड़ियों के छेद बूँद का

आँचल छूते हैं |

 

धुँधलेपन की इस बस्ती की

देह पियासी है.

रामराज्य के व्याकरणों की 

भूख उदासी है,

नई नीतियाँ

सब विकास की, कहाँ रुकी हैं?

किसके बूते हैं?

1 comment:

Awadhesh Kumar said...

सत्य को उकेरती मार्मिक नवगीत, बधाई शुभकामनाएं।