November 19, 2017

कविताएँ

बहुत खुश है नदी
-गोवर्धन यादव

1
आकाश में-
उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देख
बहुत खुश है नदी, कि
उसकी बुढ़ाती देह
फ़िर जवान हो उठेगी.
चट्टानों के बीच गठरी सी सिमटी
फ़िर कल-कल के गीत गाती
पहले की तरह बह निकलेगी.
2
अकेली नहीं रहना चाहती नदी
खुश है वह यह सोचकर, कि
कजरी गाती युवतियाँ
सिर पर जवारों के डलिया लिये
उसके तट पर आएँगी
पूजा-अर्चना के साथ, वे
मंगलदीप बारेगीं
उतारेगीं आरती
मचेगी खूब भीड़-भाड़
यही तो वह चाहती भी थी.
3)
पुरुष धोता है अपनी मलिनता
स्त्रियाँ धोती है गंदी कथड़ियाँ
बच्चे उछल-कूद करते हैं -
छपाछप पानी उछालते
गंदा होती है उसकी निर्मल देह
फ़िर भी यह सोचकर
खुश हो लेती है नदी,कि
चाँद अपनी चाँदनी के साथ
नहाता है रात भर उसमें उतरकर
यही शीतलता पाकर
उसका कलेजा ठंडा हो जाता है.
4
नदिया जरा धीरे बहो
गीत गाता कवि-
उससे ठहरकर बहने को कहता है
नदी कल-कल कहते हुए
बढ़ जाती है आगे बिना रुके
देते हुए संदेश
बहते रहना ही जीवन है
और रुक जाना मौत.
इसलिए वह अविरल बहती रहती है.
5
पसंद नहीं है
नदी को बँधकर रहना
फिर भी -
बनाए जा रहे हैं बड़े-बड़े बांध
रास्ता रोकने में पारंगत आदमी
खुश हो लेता है अपनी ओछी मानसिकता पर
शायद नहीं जानता वह, नदी का क्रोध
पूरे वेग के साथ तोड़ती हुई अवरोध
बह निकलती है पूरी नदी.
(६)
जल है तो कल है,
जल है तो जीवन है
जल है तो अर्पण है
जल है तो तर्पण है
जल है तो समर्पण है
जल है तो आकर्षण है
जल है तो  मंगल है
जल है तो जंगल है
नहीं होगा जब जल
तो जल जाओगे तुम सब
कहती है नदी हमसे
समय है अभी भी
संभल सको तो सँभल जाओ.
(७)
जनम-जनम से नाता है
नदी और पेड़ का
सहोदर है दोनों
जब कटता है कोई पेड़
तो रोती है नदी चीख-चीखकर
कोई बहन भला
कटते हुए देख सकती है अपने भाई को
लेकिन मदांध आदमी
चलाता है कुल्हाड़ी निर्ममता से
जब पेड़ नहीं होंगे, तो
नदी भी नहीं होगी
जब नदी नहीं होगी
तो जीवन भी नहीं होगा. 
Email- goverdhanyadav44@gmail.com

2 Comments:

Devi Nangrani said...

Bahut sunder bhav Beene Abhivyakti hai
Ise Maine Sindhi mein bhi anuwaad kiya hai
Sadhuwaad

Unknown said...

Bahoot hi sunder feeling hai nanaji practical natural related.
Thanks for sharing

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