September 15, 2017

पर्यावरण

       गुम हो गई काँव-काँव की आवाज़ 
 उदंती के इस अंक के आवरण पृष्ठ पर प्रकाशित कौए का चित्र और इस पृष्ठ पर प्रकाशित कौओँ के झुंड के ये अलग-अलग चित्र आपको ज़रूर आश्चर्य से भर देंगे, कि इतने सारे कौए कहाँ नकार आ गए... क्योंकि खबरें तो यही बता रही हैं कि कौओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। यही नहीं पितृपक्ष में श्राद्ध के बाद खाना खिलाने के लिए कौए नहीं मिल रहे हैं। चित्र में नज़र आ रहे कौओं का यह झुंड पलारी गाँव में हमारे पैतृक घर के आँगन में लगे रामफल में दिखाई दिया है।
इस पेड़ पर कौओं का यह झुंड अक्सर आता है और काँव- काँव करके सबको अपनी उपस्थिति का अहसास कराकर उड़ जाता है। माने कह रहा हो हमें लुप्त होने से बचा लो... बलौदाबाजार मार्ग पर स्थित यह वही पलारी गाँव है, जहाँ ऐतिहासिक सिद्धेश्वर मंदिर और खूबसूरत बालसमुंद है। कौओं के इस झुंड को अपने कैमरे में कैद किया है छोटे भाई राजेश वर्मा ने। राजेश को फोटोग्राफी का शौक बचपन से रहा है। इन दिनों वे पक्षियों चित्र खींचने में रुचि ले रहे हैं। उनका कहना है कि अपने आस-पास अधिक से अधिक पेड़ लगाइए ,फिर देखिए तरह- तरह के पक्षियों का कलरव आपको सुबह शाम सुनाई देने लगेगा। और तो और जब पितृपक्ष के अंतिम दिन पितरों के विदा के लिए परिवार की बड़ी बहू रश्मि ने पकवान बनाया और कौओं को खिलाने के लिए भोजन अलग कर जैसे ही परछी बरामदे में रखा, पेड़ पर बैठा कौआ मानो इंतजार ही कर रहा था, तुरंत ही आया और पुड़ी लेकर फुर्रर्र....  – रत्ना वर्मा

प्यासे कौए की कहानी आप सबने बचपन में सुनी होगी और आज भी शायद अपने बच्चों को सुनाते होंगे कि किस तरह एक प्यासे कौए ने अपनी सूझ- बूझ और सहनशीलता से घड़े में कम पानी होने के बाद भी कंकड़ पत्थर के सहारे घड़े का पानी ऊपर तक लाकर अपनी प्यास बुझाई।
आप सोच रहे होंगे आज यह कौए की कहानी क्यों? पहले हमारे आस- पास गौरैया, कौआ, तोता, मैना, कबूतर आदि विभिन्न प्रजाति के पक्षी दिखाई देते थे। जिनको देख- देखकर ढेरों प्रेरणा दायक कहानियाँ बन जाया करती थी। बच्चे उन्हें प्रत्यक्ष अपने सामने देखकर कहानी का आशय भी बहुत जल्दी समझ जाया करते थे। पर आज तो परिस्थिति बदल गई है। हमने अपनी थोड़ी सी खुशी के लिए अपने आस- पास के पेड़, जंगल काट दिए है। जब पेड़ ही नहीं हैं तो भला हमारे जन- जीवन में घुले- मिले ये पंछी भी कैसे नकार आएँगे? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को पुस्तकों में चित्र दिखाकर यह बताएँगे कि देखो यह कौआ है... यह प्रजाति अब विलुप्त हो गई है।
इस समय कौओं की बात इसलिए कि-  पितृपक्ष चल रहा है और समाचार पत्रों में खबरे प्रकाशित हो रही हैं कि भोजन खिलाने के लिए कौए नहीं मिल रहे है। जैसी कि मान्यता है  कि जब कोई तर्पण या श्राद्ध करता है तो वह सबसे पहले कौए को खाना खिलाता है। आज तर्पण और श्राद्ध करने वालों की भीड़ तो बढ़ रही है लेकिन कौओं की संख्या कम होती जा रही है।
बताया जा रहा है कि अब तर्पण और श्राद्ध जैसे धार्मिक कर्मकांड करवाने वाले पंडित भी इससे परेशान हैं। उन्हें अब अपने यजमानों के लिए आटे का कौआ बनाना पड़ रहा है। एक परेशान पंडित के अनुसार पहले तर्पण और श्राद्ध के बाद कौओं के झुंड के झुंड दिखाई देते थेलेकिन पिछले तीन-चार वर्षो से इनकी संख्या लगातार कम होती दिखाई दे रही है। जाहिर है यह चिंता का विषय है।
पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाने वाले कौओं पर मंडरा रहे इस संकट के बारे में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के प्रोफ़ेसर डा.बी.डी. त्रिपाठी कहते हैं, - ऐसा दो कारणों से हो रहा है पहला तो यह कि जीवित प्राणियों की एक 'फूड चेनहोती है जो आजकल अव्यवस्थित हो गई है, आदमी के खान-पान के तरीकों में भी काफी बदलाव आ गया है। इसकी वजह से कौओं की प्रजनन क्षमता कम होती जा रही है। दूसरी बात यह कि जंगलों की धड़ल्ले से हो रही कटाई से भी उनके लिए आवास की समस्या भी उत्पन्न हो गई है, क्योंकि कौए अपना घोसला एकांत में बनाते हैं जो आजकल उन्हें कम ही मिल पा रहा है।
पिछले कुछ वर्षो से गौरैया के लुप्त होते जाने से चिंतित होकर गौरैया बचाओ अभियान बहुत जोर-शोर से चला। घर- घर इस पंछी को बचाने के लिए प्रयास किए जाने लगे और यह आज भी जारी है। आह जबकि यह पता चल गया है कि कौए भी कम होते जा रहे है, तो कागा बचाओ अभियान की भी जरूरत महसूस हो रही है। तो क्यों न कौओं पर अध्ययन करके उसे भी बचाने की दिशा में प्रयास आरंभ कर दिए जाएँ।
गौरैया के लिए घोंसला और दाना- पानी देकर उन्हें बचाया जा रहा है, पर कौओं को कैसे बचाया जाएगा यह पर्यावरणविद् ही बता पाएँगे, बड़े पेड़ तो इनके आवास स्थल हैं ही पर इसके साथ ओर क्या प्रयास करने होंगे यह शोधकर्ता ही बता सकते हैं, ताकि उन्हें भी बचाने की दिशा में उचित कदम उठाया जा सके। 

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष