February 19, 2017

अभिजात की बू

अभिजात की बू
- मीना गुप्ता
 अवकाश पर जब भी घर जाती हूँ। तो छत पर खड़े होकर सुबह दस बजे की गाड़ी से आयी सब्जीवालियों को देखना दिनचर्या में शामिल हो जाता है। उनकी संघर्षपूर्ण दिनचर्या मुझे प्रेरित करती है। सुबह होते ही घर से निकलती हैं तो दस बजे यहाँ पहुँचती है और शाम छह बजे यहाँ से निकली तो रात दस बजे घर...
बस इतनी ही दिनचर्या और इतनी ही जिन्दगी। तरस आता है इन पर।
एक दिन सुबह-सुबह एक सब्जी वाली ने दरवाजे पर दस्तक दी। माँ ने दरवाजा खोला।
आते ही बोली 'अम्मा लाव चाय पियाव... आज मैं चाय नहीं पिए हौं
माँ ने उसे चाय पिलाई... चाय के प्रति उसकी तन्मयता देख मैं ताज्जुब में थी, अत: मैंने उसे नजरअंदाज किया कहीं वह संकुचित न हो जाए मगर कप रखते हुए बोली-दीदी कबे आये रहौ... मैंने उस अपरिचिता के मुख से अपने लिए दीदी सम्बोधन सुन समझ न पाई क्या कहूँ ?
कल ही तो। बोली तुम हमें नहीं जनतियु मैं तुम पंचन को जानथों।
अच्छा ..!
मेरे अच्छा बस सुनकर जब वह चली गई।
माँ से पूछा 'वह मुझे कैसे जानती है। मैं तो उसे नहीं जानती
सब्जी वाली थी पहले हरपालपुर से आती थी अब यहीं रहती है। तुमने पहचाना नहीं ?
नहीं माँ।
बहुत पुरानी सब्जी वाली है ...जब तुम लोग बहुत छोटे थे तबसे ठाकुर जी की दुकान के सामने सब्जी लगाती थी।
माँ ने मेरी याद को खंगालना शुरू किया... तुम लोग जब ठाकुर जी के यहाँ खेलने जाती थी, तो परेशान होकर चिल्लाती थी कि मेरी सब्जियों की टोकरी में छिपकर ये लोग सारी सब्जियाँ बर्बाद कर देती हैं।
माँ की बातों ने मेरी स्मृति में कौंध डाल दी... मुझे बचपन की वह रामप्यारी याद आ गई...कसे बदन पर कसा फुल बाहों का ब्लाउज... लम्बे काले घने बालों का कसा हुआ जूड़ा ... रंगबिरंगी बाँह -भरी चूडिय़ाँ और उज्ज्वल पैरों में एड़ी भर आलता... जिसे देख लगता कि वह अभी कल ही ब्याह कर आई है और जालिम पति ने काम पर भेज दिया है। थी तो वह अहीरिन... मगर लगती किसी ठकुराइन से कम नहीं... मेरी याद का वह हिस्सा मेरे और माँ के बीच दो घंटे तक चर्चा का विषय बना रहा।
माँ बोली 'अरे ठाकुर जी की हवेली के सामने बैठती थी और उन्हीं का घर बर्बाद कर गई
कैसे ?
उनके बेटे को बर्बाद कर गई।
माँ साफ़ बताओ क्या हुआ ?
ठाकुरजी के बेटे जगत सिंह की पत्नी का निधन हो गया ..भरी जवानी में वह अकेला हो गया... यह दूकान के सामने बैठती थी। थी तो सुन्दर फिर क्या... ठाकुर जी ने एक दिन दोनों को एक साथ देख लिया और जगत सिंह को कुछ पैसा देकर बेदखल कर दिया। घर से बाहर कर दिया।
फिर क्या हुआ?
जगत ने इसके नाम घर खरीद लिया और यह हरपालपुर छोड़ इसी के साथ रहने लगी।
मगर अब... अब जगत सिंह को छोड़ दिया है वह बेचारा मारा- मारा घूमता है। कहीं भी सो जाता हैं कहीं भी खा लेता है।
क्यों ?
 पता नहीं... कहकर माँ चुप हो गई।
मगर मेरी उत्सुकता ने मुझे बेचैन कर दिया...दूसरे दिन वह पालक  साग लेकर आ गई... लो अम्मा ताजी है। कहकर डलिया में डाल जाने लगी...
जगत चाचा की बेकद्री की कहानी रात में माँ से सुनी तो आँसू आ गए थे...मेरी उत्सुकता जो रात भर सो न सकी थी ने  उसे रोका और पूछा चाची एक बात पूछूँ।
हाँ पूछो दीदी...
तुमने जगत चाचा को क्यों छोड़ा...जबकि उसने अपना घर छोडक़र तुम्हे अपनाया था ?
उसने इधर-उधर देखा और बोली  वैसे दीदी तुम हमरे बच्चा जैसे हो, लेकिन अब बड़े हो गए हो तो सुनो -
 दीदी वा रहे ठाकुर और मैं अहीरिन ..जबे नहीं तबे मोही धमकावत रहे और कहे देखा अहीरिन जैसे रहे... मोर आदमी कबहूँ मोहि अहीरिन नहीं कहे रहिस दीदी... मगर वा बात-बात माँ अहीरिन कही के गरिआवत रहे... ठाकुर रहे दीदी... ठकुरन की बात औरे होत है... और
और क्या? धीरे धीरे मोही वही के पास से बदबू आवें लाग.
कैसी  बदबू ? '’
ठकुरैसी की बदबू ..इतना कहकर वह चली गई।
मैं अवाक् थी... एक अहीरिन को अभिजात की बू !
चेतना ने जोर पकड़ा एक अहीरिन ने अभिजात को पटक दिया।
 सम्पर्क: केन्द्रीय विद्यालय डोंगरगढ़ ,जिला- राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) -491445
मोबाइल नंबर -9407944778
E- mail-  mgpt1997@rediffmail.com

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष