August 12, 2016

सांडर्स हत्या कांड के एक सहयोगी

शहीद महावीर सिंह
- पवित्रा अग्रवाल
लगभग 99 वर्ष पहले की बात है भारत में अंग्रेजों का राज्य था। उन्हीं दिनों सरकारी अफसरों ने कासगंज (उ प्र) में एक शान्ति सभा का आयोजन किया जिलाधीशपुलिस कप्तानस्कूलों के इंसपेक्टर,बहुत से उच्चाधिकारी, सेठ, जमींदारशिक्षक आदि उसमें उपस्थित थे। सभी विद्यालयों के छात्रों को भी जबरन घेर घार कर लाया गया था। इस सभा का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की तारीफों कें पुल बाँधना व अंग्रेजों की नजर मेंबागी गाँधीजी को गालियाँ देना था। तभी सभा के सहमें सहमें शान्त वातावरण को चीरता एक बाल स्वर गूँजा ‘महात्मा गाँधी की जय'
      सब छात्रों ने एक स्वर में दोहराया -महात्मा गाँधी की जय', इसके बाद सभा में भगदड़ मच गई। अंग्रेज-भक्त उच्चाधिकारी घबड़ा गये।कुछ बेंत ले कर बच्चों पर टूट पड़े । अध्यापकों को आदेश दिया गया कि वे बच्चों के मुखिया का पता लगायें और एक तेरह वर्षीय बालक को विद्रोही नेता के रूप में सजा मिली।
   सजा को हँसकर झेल जाने वाला यह बालक था महावीर सिंह राठौर। इनका जन्म  16 सितम्बर 1904 को उत्तर प्रदेश में जिला एटा के शाहपुर टहला ग्राम में हुआ था । पिता का नाम कुँवर देवी सिंह राठौर व माता का नाम श्रीमती शारदा देवी था। महावीर सिंह जी ने आठवीं कक्षा तक  की  शिक्षा कासगंज में मेरे बाबा बाबू  हीरा लाल जी आर्य के घर में अपनी बुआ के साथ रह कर पूरी की थी (उस समय हमारे  पैतृक घर के एक भाग में प्राइमरी स्कूल था। उनकी बुआ उसमें प्रधान अध्यापिका थीं और उसी में रहती थीं) 1925 में एटा से  मैट्रिक पास करने के बाद वे डी.ए.वी. कालेज कानपुर में पढ़ने के लिए चले गए। उन दिनों यह कालेज क्रान्तिकारियों का केन्द्र बना हुआ था ।महावीर सिंह भी इन्ही के दल में शामिल हो गए।
 8-9 सितम्बर 1928 को इन लोगों ने दिल्ली में एक मीटिंग की  और एक केन्द्रीय दल बनाया।दल की कार्यकारिणी समिति में आठ सदस्य चुने गए। ये थे सुखदेव ,भगत सिंह,शिव वर्मा,महावीर सिंह,विजय कुमार सिन्हा,फणीद्रनाथ घोष,कुन्दन लाल और चन्द्रशेखर आजाद ।
 अक्टूबर 1928 के अंतिम सप्ताह में साइमन कमीशन लाहौर पहुँचा।वहाँ इसके विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस खड़ा था। पुलिस ने जुलूस पर लाठियाँ बरसाईं।लाला जी घायल हो गये और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई।
 लाला जी की मौत का बदला लेने के लिए एस.पी. मि.स्काट की हत्या की योजना बनी। मि.स्काट को पहचान कर उनकी तरफ इशारा करने का काम जय गोपाल को सौंपा गया था। 17 दिसम्बर 1928 को हत्या का दिन निश्चित हुआ। जय गोपाल ने मि.सांडर्स को स्काट समझते हुए उधर इशारा कर दिया।पहले राजगुरु ने गोली चलाई फिर भगत सिंह ओर राजगुरु दोनो ने मिलकर फायर किए और वहाँ से भाग निकले । ट्रैफिक इंस्पेक्टर फर्न व हैड कान्स्टेबिल चनन सिंह ने उनका पीछा किया। भगत सिंह के पुन:फायर करने पर फर्न तो पीछे लौट गया; किन्तु चनन सिंह पीछा करता रहा । उसी सड़क पर पहरा दे रहे महावीर सिंह ने चनन सिंह को गोली मार दी । काफी दिन तक पुलिस से छिपते-छिपाते हुये महावीर सिंह कासगंज आ गए और कुछ दिन वहाँ की नगर पालिका में क्लर्क पद पर काम भी किया । वे 19 जून 1929 को प्रात:7 बजे नहा धोकर संध्या कर रहे थे कि पुलिस ने चारों तरफ से मकान को घेर लिया । उनकी व मकान की तलाशी के बाद मुँह पर कपड़ा डाल कर उन्हें एटा होते हुए सीधे लाहौर ले जाया गया और सांडर्स हत्या कांड में सहयोग देने के लिए शिव वर्मा, डा.गया प्रसाद ,किशोरी लाल आदि के साथ उन्हें भी आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई।
 कुछ दिन वह लाहौर व पंजाब की मुल्तान जेल में रहे। फिर वहाँ से डा.गया प्रसाद व महावीर सिंह को मद्रास की बिलारी जेल भेज दिया गया । वहाँ का जेल सुपरिटेन्डेन्ट मुक्केबाज था।वह जब तब कैदियों पर मुक्केबाजी का अभ्यास करता था।उसके मुक्के की चोट से डा.गया प्रसाद 36 घंटे तक बेहोश रहे थे।  
 एक दिन वह मुक्केबाजी का अभ्यास महावीर सिंह पर करने लगा।उस समय महावीर सिंह के हाथ में हथकड़ी तो नहीं थी किन्तु चार वार्डरों ने मिल कर उनके दोनो हाथ पकड़ रखे थे ।झटके से अपना दाहिना हाथ छुड़ाकर उन्होंने एक जोरदार मुक्का सुपरिन्टेंडेंट के मुँह पर दे मारा। वह लड़खड़ाकर वहीं गिरकर बेहोश हो गया। उस दिन से उसने मुक्केबाजी तो छोड़ दी ; किन्तु मुक्के का बदला तीस बेतों की कठोरतम सजा सुना कर लिया।
 19 जनवरी 1933 को सरकार ने परेशान हो कर उन्हें अंडमान भेज दिया ।वहाँ के अत्याचारों से पीड़ित हो कर 12 मई 1933 को महावीर सिंह व अन्य 32 लोगों ने भूख हड़ताल कर दी । डॉक्टरों द्वारा जबरन भोजन दिये जाने के प्रयास में नाक के रास्ते पेट में उतारी जाने वाली रबड़ की नली उनके फेफड़ों में चली गई ।डाक्टरों ने नली में जो दूध डाला वह भी फेफड़ों में ही चला गया ।इस से वह बेहोश हो गए और उसी दिन 17 मई 1933 को उनका प्राणान्त हो गया ।
     उनके माता पिता को उनकी मृत्यु की सूचना तक नहीं दी गई और उसी रात उनका शव भारी पत्थर से बाँध कर समुद्र की अथाह जल राशि में फेंक दिया गया था।
    (महावीर सिंह से मिलने का अवसर तो मुझे नही मिला, क्योंकि उनकी गिरफ्तारी के समय मेरे स्वतंत्रता सेनानी  पिता मात्र नौ साल के थे । लगभग 40-42 वर्ष पूर्व महावीर सिंह के भाई ठा.बलवीर सिंह जी कासगंज में हमारे घर आए थे। तब मेरी शादी नहीं हुई थी और मैं कासगंज में ही रहती थी ।तब उनसे महावीर सिह पर मैंने विस्तार से बातचीत की थी। यह लेख उसी साक्षात्कार पर आधारित है)

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