August 12, 2016

कविता

क्या हम सचमुच आज़ाद हैं?
- सुनीता पाहूजा

कुछ ज़ंज़ीरें हैं....
कुछ ज़ंज़ीरें हैं
... जो दिखाई नहीं देतीं ज़ंज़ीरों सी
पर रोकती हैं..

ये रोकती हैं -
कदमों को बढ़ने से,
हाथों को लिखने से,

ये रोकती हैं
निगाहों को उठने से,
ज़ुबाँ को बोलने से,
 ज़िंदगी को जीने नहीं देतीं ...
 कुछ ज़ंज़ीरें।

ये बाँधतीं हैं - साँसों को
दबाती हैं - हँसी को
ज़िंदगी को खिलखिलाने नहीं देतीं।

कुछ ज़ंज़ीरें
खनकती हैं....
पाजेब के घुँघरुओं सी
चूड़ियों की खन-खन सी
बजती हैं,
खटकती हैं,
अटकती हैं
पर....दिखाई नहीं देतीं।

ये ज़ंज़ीरें सोचने पर मजबूर करती हैं
कि क्या हम सचमुच आज़ाद हैं ?
मानो न मानो ! ....कुछ ज़ंज़ीरें अब भी हैं।

सहायक निदेशक
केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो
Assistant Director CTB, MHA

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