September 27, 2012

जन्म शताब्दी वर्ष

मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ?

- सआदत हसन मंटो
मुझसे कहा गया है कि मैं यह बताऊँ कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ? यह 'क्यों कर' मेरी समझ में नहीं आया। 'क्यों कर' का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है- कैसे और किस तरह?
अब आपको क्या बताऊँ कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ। यह बड़ी उलझन की बात है। अगर में 'किस तरह' को पेशनजर रखूं तो यह जवाब दे सकता हूँ कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ। कागज-कलम पकड़ता हूँ और बिस्मिल्लाह करके अफसाना लिखना शुरू कर देता हूँ। मेरी तीन बच्चियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उनसे बातें भी करता हूँ। उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, अपने लिए 'सलाद' भी तैयार करता हूँ। अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर अफसाना लिखे जाता हूँ।
अब 'कैसे' सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं वैसे ही अफसाने लिखता हूँ जिस तरह खाना खाता हूँ, गुसल करता हूँ, सिगरेट पीता हूँ और झक मारता हूँ।
अगर यह पूछा जाए कि मैं अफसाना 'क्यों' लिखता हूँ तो इसका जवाब हाजिर है।
मैं अफसाना अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे अफसाना लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है। मैं अफसाना न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी।
मैं अफसाना नहीं लिखता, हकीकत यह है कि अफसाना मुझे लिखता है। मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ। यूँ तो मैंने 20 से ऊपर किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी-कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे अफसाने लिखे हैं, जिन पर आए दिन मुकद्दमे चलते रहते हैं।
जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता हूँ जिसे उर्दू आती है न फारसी, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी।
अफसाना मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई अफसाना निकल आए। कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूंकता रहता हूँ मगर अफसाना दिमाग से बाहर नहीं निकलता है। आखरी थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ।
अनलिखे अफसाने के दाम पेशगी वसूल कर चुका हूँ। इसलिए बड़ी कोफ्त होती है। करवटें बदलता हूँ। उठकर अपनी चिडिय़ों को दाने डालता हूँ। बच्चों को झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ। जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-तहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ। मगर कम्बखत अफसाना जो मेरी जेब में पड़ा होता है मेरे जहन में नहीं उतरता और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।
जब बहुत ज़्यादा कोफ्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता।
सुना हुआ है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता। लेकिन हैरत है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ।
मैं यही कह सकता हूँ कि या तो यह मेरे आलोचकों की खुशफहमी है या मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ। उन पर कोई जादू कर रहा हूँ।
माफ कीजिएगा, मैं गुसलखाने में चला गया। किस्सा यह है कि मैं खुदा को हाजिर-नाजिर रखकर कहता हूँ कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ और कैसे लिखता हूँ। अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी बीवी, जो संभव है यहाँ मौजूद है, आई उसने मुझसे यह कहा है, 'आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए।'
मैं इसके कहने पर कलम या पैंसिल उठाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल खाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई अफसाना उछलकर बाहर आ जाता है।
मैं खुद को इस दृष्टि से कहानीकार, नहीं, जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ- मुझ जैसा भी बेवकूफ दुनिया में कोई और होगा?

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