May 30, 2012

प्रेस स्वतंत्रता दिवसः क्यों जन-विरोधी है हमारा मीडिया?

-जस्टिस मार्कंडेय काटजू

सभी देशप्रेमियों का, मीडिया सहित, यह फर्ज है कि वे इस संक्रमण से कम से कम पीड़ा और तत्काल उबारने में हमारे समाज की मदद करें। इस संक्रमण काल में मीडिया को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होती है क्योंकि इसका ताल्लुक विचारों से होता है, सिर्फ वस्तुओं से नहीं। अत: अपने मूल स्वभाव में मीडिया किसी अन्य साधारण व्यवसाय की तरह नहीं हो सकता।
भारत में मीडिया जो भूमिकाएँ निभा रहा है, उसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ऐतिहासिक संदर्भों को समझना होगा। वर्तमान भारत अपने इतिहास में एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है-  एक सामंती खेतिहर समाज से आधुनिक औद्योगिक समाज की ओर का संक्रमण।
यह एक बहुत पीड़ादायक और व्यथित कर देने वाला दौर है। पुराने सामंती समाज की चूलें हिल रही हैं और कुछ तब्दीलियां हो रही हैं, लेकिन नया, आधुनिक, औद्योगिक समाज अभी तक संपूर्ण ढंग से स्थापित नहीं हुआ है। पुराने मूल्य की किरचें बिखर रही हैं, सारी चीजें उबाल पर हैं। शेक्सपियर के मैकबेथ को याद करें, 'रौशन चीजें धूल धूसरित है और धूल धूसरित रौशन है'। जिन्हें पहले अच्छा माना जाता था, मिसाल के लिए जाति व्यवस्था, वह आज बुरी है (कम से कम समाज के जागरूक तबके में) और जिन्हें पहले बुरा माना जाता था, जैसे प्रेम के जरिए/ लिए शादी, वे आज स्वीकार्य हैं (कम से कम आधुनिक मानस में)।
सभी देशप्रेमियों का, मीडिया सहित, यह फर्ज है कि वे इस संक्रमण से कम से कम पीड़ा और तत्काल उबारने में हमारे समाज की मदद करें। इस संक्रमण काल में मीडिया को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होती है क्योंकि इसका ताल्लुक विचारों से होता है, सिर्फ वस्तुओं से नहीं। अत: अपने मूल स्वभाव में मीडिया किसी अन्य साधारण व्यवसाय की तरह नहीं हो सकता।
ऐतिहासिक तौर पर, प्रिंट मीडिया का उद्भव यूरोप में सामंती शोषण के खिलाफ जनता के एक सक्रिय हस्तक्षेप के बतौर हुआ। उस वक्त सत्ता के सभी स्थापित उपकरण दमनकारी सामंती अधिकारियों के हाथों में थे। अत: लोगों को एक नए माध्यम की जरूरत थी, जो उनका प्रतिनिधित्व कर सके। इसीलिए प्रिंट मीडिया को 'चौथे स्तंभ' की तरह जाना जाने लगा। यूरोप और अमरीका में यह भविष्य की आवाज का प्रतिनिधित्व करता था, जो स्थापित सामंती अंगों- अवशेषों, जो कि यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे, के विपरीत था।  इसीलिए मीडिया ने सामंती यूरोप को, आधुनिक यूरोप में परिवर्तित करने में एक अहम भूमिका अदा की है।
मेरे ख्याल से भारत की मीडिया को एक वैसी ही प्रगतिशील भूमिका का निर्वहन करना चाहिए, जैसी कि यूरोप की मीडिया ने उसके संक्रमण काल में निभाया था। ऐसा वह पुरातन, सामंती विचारों और व्यवहारों- जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंध- मान्यताओं पर आक्रमण करते हुए और आधुनिक वैज्ञानिक और तार्किक विचारों को प्रोत्साहित करते हुए कर सकता है। लेकिन क्या हमारा मीडिया ऐसा कर रहा है?
मेरी राय में, भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनता के हितों को पूरा नहीं करता। वास्तव में इनमें से कुछ यकीनन सकारात्मक तौर पर जन विरोधी हैं। भारतीय मीडिया में तीन प्रमुख दोष हैं, जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूँ-
पहला, मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से  अवास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है।
वास्तविक मुद्दे भारत में सामाजिक- आर्थिक हैं, भयंकरतम गरीबी जिसमें हमारे 80 फीसदी लोग जीते हैं, कठोरतम महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा जरूरतों की कमी और पुरातन- पंथी सामाजिक प्रथाएँ जैसे 'ऑनर किलिंग', जातीय उत्पीडऩ, धार्मिक कट्टरताएँ आदि। अपने कवरेज का अधिकांश हिस्सा इन मुद्दों को देने के बजाय, मीडिया अवास्तविक मुद्दों को केंद्रित करता है- जैसे फिल्मी हस्तियाँ और उनकी जीवनशैली, फैशन परेड, पॉप संगीत, डिस्को डांस, ग्रह-  नक्षत्र शास्त्र, क्रिकेट, रियलिटी शो और अन्य कई मुद्दे।
इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि मीडिया लोगों को मनोरंजन मुहैया कराता है, लेकिन इसे अतिरेक में नहीं परोसा जाना चाहिए। इसके 90 फीसदी कवरेज अगर मनोरंजन से संबंधित हैं और महज 10 फीसदी ही ऊपर उल्लेखित वास्तविक मुद्दों के हैं तब तो कुछ ऐसा है, जो गंभीर रूप से गड़बड़ है। इसके अनुपात की समझदारी उन्मादी हो चली है। स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, कृषि और पर्यावरण सबको मिलाकर मनोरंजन को नौ गुना ज्यादा कवरेज मिलता है।  क्या एक भूखे या बेरोजगार व्यक्ति को मनोरंजन चाहिए या भोजन और रोजगार?
उदाहरण के लिए, हाल ही में मैंने टेलीविजन शुरू किया, और मैंने क्या देखा? कि मैडम गागा भारत आई हैं, करीना कपूर मदाम तुसॉद्स में अपनी मोम की मूर्ति के पास खड़ी हैं, एक व्यापारिक घराने को एक पर्यटक सम्मान दिया जा रहा है, फॉर्मूला वन रेसिंग आदि इत्यादि। इन सारी बातों का जनता की समस्याओं से क्या लेना देना है?
कई चैनल दिन भर और दिन के बाद भी क्रिकेट दिखाते रहते हैं। रोमन शासक कहा करते थे- 'अगर आप लोगों को रोटियाँ नहीं दे सकते तो उन्हें सर्कस दिखाइए।' लगभग यही नजरिया भारतीय सत्ता- स्थापनाओं का भी है, जिसे दोहरे तौर पर हमारा मीडिया भी सहयोग देता है। लोगों को क्रिकेट में व्यस्त रखो, ताकि वे अपनी सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा को भूल जाएँ। गरीबी और बेरोजगारी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो महत्वपूर्ण है वह ये कि भारत ने न्यूजीलैंड को हराया या पाकिस्तान हो तो और भी बेहतर, या तेंदुलकर या युवराज ने शतक मारा।
हाल ही में, द हिंदू ने प्रकाशित किया कि पिछले 15 सालों में ढ़ाई लाख किसानों ने आत्महत्या की है। लक्मे फैशन सप्ताह 512 मान्यता प्राप्त पत्रकारों द्वारा कवर किया गया। उस फैशन सप्ताह में, महिलाएँ सूती कपड़ों का प्रदर्शन कर रही थीं, जबकि कपास उगाने वाले पुरुष और महिलाएँ नागपुर तक की एक घंटे की हवाई दूरी पर आत्महत्या कर रहे थे। एक या दो स्थानीय पत्रकारों को छोड़, किसी ने इस कहानी को नहीं बताया।
यूरोप में, विस्थापित किसानों को औद्योगिक क्रांति द्वारा स्थापित कारखानों में रोजगार मिल गए थे। दूसरी ओर भारत में औद्योगिक रोजगार अब मुश्किल से मिलते हैं। कई कारखाने बंद हो गये हैं और अब 'रियल स्टेट' में तब्दील हो गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र में पिछले पंद्रह सालों में रोजगार में तीव्र गिरावट देखी गई है। मिसाल के लिए, टिस्को ने 1991 में 85,000 श्रमिक नियुक्त किए थे, जो तब 10 लाख टन स्टील का उत्पादन करते थे। 2005 में, इसने 50 लाख (5 मिलियन) टन स्टील का उत्पादन किया लेकिन यह सिर्फ 44,000 श्रमिकों के द्वारा किया गया। 90 के दशक के मध्य में बजाज 10 लाख दो पहिया वाहनों का उत्पादन करता था, जिसमें 24,000 श्रमिक कार्यरत थे। 2004 तक यह 10,500 श्रमिकों के साथ 24 लाख (2.4 मिलियन) वाहनों का उत्पादन कर रहा था।
तब ये लाखों विस्थापित किसान कहाँ गए? वे शहर जाते हैं, जहाँ वे घरेलू नौकर, सड़कों के किनारे ठेले- खोमचे वाले या यहाँ तक कि अपराधी भी बन जाते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि झारखंड की एक से दो लाख कम उम्र की लड़कियाँ दिल्ली में घरेलू नौकरानी का काम कर रही हैं। क्रूरतम गरीबी के चलते सभी शहरों में शारीरिक धंधे भयानक हैं।
ये सभी चीजे हमारे मीडिया द्वारा नजरअंदाज की जाती हैं, जो हमारे अस्सी फीसदी लोगों की कठोर आर्थिक वास्तविकताओं के प्रति नेल्सन की आँख जैसे नजर फेरे हुए है, और बदले में कुछ चमकते दमकते पोतेमकिन गाँवों की ओर सारा ध्यान गड़ाए हुए है।
दूसरा, मीडिया अक्सर ही लोगों को विभाजित करता है। जब कभी भारत में कहीं भी कोई बम विस्फोट होता है, कुछेक घंटों के भीतर ही टीवी चैनल कहना शुरू कर देते हैं कि इंडियन मुजाहिदीन या जैश-ए-मोहम्मद या हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लाम ने जिम्मेदारी कबूल करते हुए उन्हें एक ई-मेल या एसएमएस मिला है। यह नाम हमेशा ही एक मुस्लिम नाम होता है। अब ये ई-मेल या एसएमएस कोई भी ऐसे बुरे इरादों वाला आदमी भेज सकता है, जिसका मकसद सांप्रदायिक नफरत फैलाना हो। उन्हें टीवी स्क्रीन पर और अगले ही दिन प्रिंट मीडिया में क्यों दिखाया जाना चाहिए? इसके दिखाने का सीधा संदेश यह देना होता है कि सभी मुसलमान आतंकी हैं या बम- बाज हैं।
आज भारत में रहने वाले तकरीबन 92 से 93 फीसदी लोग विभिन्न तरह के विस्थापित जड़ों से ताल्लुक रखते हैं। अत: भारत में एक जबर्दस्त विविधता है- कई धर्म, जातियाँ, भाषाएँ, नृजातीय समूह। यह बेहद जरूरी है कि अगर हम लोगों को एकजुट और समृद्ध रखना चाहते हैं तो सारे समुदायों के प्रति सहिष्णुता और समानता हो। जो भी हमारे लोगों के बीच विभाजन के बीज बोता है, चाहे यह धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीयता किसी के भी आधार पर हो, वह वास्तव में हमारी जनता का दुश्मन है।
अत: ऐसे ई- मेल या एसएमएस को भेजने वाले भारत के दुश्मन हैं, जो हमारे बीच में धार्मिक आधार पर तनाव के जहरीले बीज बोना चाहते हैं। तो फिर मीडिया, चाहे या अनचाहे तरीके से, इस राष्ट्रीय अपराध का सहभागी क्यों बन जाता है?
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि इस संक्रमण काल में हमारी जनता को आधुनिक, वैज्ञानिक युग की ओर अग्रसर करने में मीडिया को सहायक की भूमिका अदा करनी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए मीडिया को तार्किकऔर वैज्ञानिक विचारों का प्रचार- प्रसार करना चाहिए, लेकिन ऐसा करने के बजाय हमारी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न तरह के अंध- विश्वासों को परोसता रहता है।
यह सच्चाई है कि बहुतायत भारतीयों का बौद्धिक स्तर बहुत कम है- वे जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंध- विश्वासों में जकड़े हुए हैं। हालांकि सवाल यह है- तार्किक और वैज्ञानिक विचारों के प्रचार- प्रसार के जरिए मीडिया को हमारे लोगों के बौद्धिक स्तर को उन्नत करना चाहिए, या इसे कमजर्फ स्तरों पर लुढ़कते हुए इसे कायम रखना चाहिए?
यूरोप में, पुनर्जागरण के युग में, मीडिया, जो कि उस वक्त सिर्फ प्रिंट मीडिया ही था, ने लोगों के मानसिक स्तरों में इजाफा किया, उसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तथा तार्किक चिंतन का प्रचार प्रसार करते हुए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाए। वॉल्तेयर ने अंधविश्वास पर आक्रमण किए और डिकेंस ने जेल, स्कूलों, अनाथालयों, अदालतों आदि की भयानक दशाओं की आलोचनाएं की। हमारी मीडिया को भी क्या यही सब नहीं करना चाहिए?
एक समय में राजा राम मोहन रॉय जैसे साहसी लोगों ने अपने अखबारों मिरातुल अखबार और संबाद कौमुदी में सतीप्रथा, बालविवाह और पर्दाप्रथा के खिलाफ आलेख लिखे। निखिल चक्रवर्ती ने 1943 के बंगाल अकाल की भयावहता के बारे में लिखा। प्रेमचंद और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने सामंती रिवाजों और महिलाओं के उत्पीडऩ के बारे में लिखा। सआदत हसन मंटों ने विभाजन के खौफ के बारे में लिखा। लेकिन आज की मीडिया में हमें क्या दिखता है?
कई चैनल नक्षत्र- शास्त्र पर आधारित कार्यक्रम दिखाते हैं। नक्षत्र- शास्त्र को खगोल- विज्ञान से गड्डमगड्ड नहीं किया जाना चाहिए। खगोल-  विज्ञान एक विज्ञान है, जबकि नक्षत्र-  शास्त्र पूरी तरह अंधविश्वास और गोरखधंधा है। यहाँ तक कि एक सामान्य विवेक भी हमें यह बता सकता है कि तारों और ग्रहों की परिक्रमा और किसी आदमी के 50 या 80 साल में मरने, या किसी के इंजीनियर या डॉक्टर या वकील बनने के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे देश में अधिकांश लोग नक्षत्र शास्त्र को मानते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए क्योंकि उनका मानसिक स्तर कमतर है। इस मानसिक स्तर में लोट- पोट होने और इसको जारी रखने के बजाए मीडिया को इसको उन्नत करने की कोशिश करनी चाहिए।
कई चैनल दिखाते हैं कि- जिक्र करते हैं और दिखाते हैं कि कोई हिंदू देवता कहां पैदा हुए थे, कहाँ- कहाँ वे रहे, वगैरह वगैरह। क्या यह अंध- विश्वास को फैलाना नहीं है?
मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि समूची मीडिया में कोई अच्छा पत्रकार नहीं है। कई बेहतरीन पत्रकार हैं। पी. साईनाथ एक ऐसे ही नाम हैं, जिनका नाम भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो कई राज्यों में किसान आत्महत्याओं के मामलों को उजागर करने की कहानी, जिसे कई सालों तक दबाया गया कभी कही ही नहीं जाती। लेकिन ऐसे अच्छे पत्रकार अपवाद हैं। बहुसंख्य ऐसे लोग हैं, जो जनहितों पर खरा उतरने की कोई चाहत नहीं रखते।
मीडिया के इन दोषों को दूर करने के लिए मुझे दो चीजें करनी हैं। पहला, मेरा प्रस्ताव है कि प्रत्येक दो माह या अन्य किसी निश्चित अंतराल में मीडिया के साथ (इलेक्टॉनिक मीडिया सहित) नियमित बैठकें हों। ये बैठकें समूची प्रेस कौंसिल की होने वाली नियमित बैठकें नहीं होंगी, लेकिन अनौपचारिक मेलजोल होगा जहाँ हम मीडिया से संबंधित मुद्दों पर विचार विमर्श करेंगे और उनका लोकतांत्रिक तरीके से, अर्थात बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश करेंगे। मेरा यकीन है कि 90 फीसदी समस्याएँ इन तरीकों से सुलझाई जा सकती हैं।
दूसरा, एक हद के बाद जहाँ मीडिया का एक हिस्सा उपरोक्त सुझाए गए लोकतांत्रिक प्रयासों के बावजूद इन्हें अनुत्पादक साबित करने की हठ पर अड़ा हो, कठोर उपायों की जरूरत पड़ेगी। इस संबंध में, मैंने प्रधानमंत्री को प्रेस आयोग अधिनियम में संशोधन करने का आग्रह किया है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस कौंसिल, जिसका संशोधित नाम मीडिया आयोग हो सकता है, के दायरे में लाया जाए और इसे और शक्ति- संपन्न बनाया जाए। मिसाल के लिए, सरकारी विज्ञापन बंद करना, या किसी अतिरेक स्थित में, कुछ समय के लिए मीडिया हाउस के लायसेंस को निरस्त करना। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- 'बिन भय होय न प्रीतÓ यद्यपि, इसका इस्तेमाल सिर्फ बेहद, अतिरेक स्थितियों में और लोकतांत्रिक उपायों के असफल होने के बाद ही किया जाएगा।
यहाँ एक आपत्ति हो सकती है कि यह तो मीडिया की स्वतंत्रता को बाधित करना है। ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती, जो कि अमूर्त और परम हो। सभी स्वतंत्रताएँ तर्कसंगत सीमा का विषय होती हैं, और इसमें जिम्मेदारी भी निहित होती है। एक लोकतंत्र में, हर कोई जनता के प्रति उत्तरदाई है, और इसीलिए हमारा मीडिया भी है।
निष्कर्षत: भारतीय मीडिया को अब आत्मचिंतन, एक उत्तरदायित्व की समझ और परिपक्वता विकसित करना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं हैं कि इसे सुधारा नहीं जा सकता। मेरी मान्यता है कि गड़बड़ी करने वालों में 80 फीसदी एक धैर्यपूर्ण बातचीत के जरिए, उनकी गलतियों को इंगित करके अच्छे लोग बनाए जा सकते हैं और धीरे- धीरे उन्हें उस सम्मानजनक रास्ते की ओर अग्रसर किया जा सकता है, जिस पर यूरोप का मीडिया नवजागरण काल में चल रहा था।
(www.ravivar.com से)
अनुवाद-  अनिल मिश्र *भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने यह आलेख हाल ही में पत्रकारों के लिये आयोजित एक कार्यक्रम में पढ़ा था।    

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