November 27, 2010

इस बार

- बालकवि बैरागी

प्रेम का कोई पर्याय
या विकल्प होता
तो धरती पर कोई प्रेमी
बेचैन होकर
इस तरह नहीं रोता।
चुन लेता वह कोई विकल्प
अपना लेता दूसरा पर्याय
पर हाय!
वैसा हुआ नहीं।

जब भी आप प्रेम करेंगे
किसी देह या किसी शरीर से
तब फिर आप
प्रेम को बना लेंगे सापेक्ष
चाहेंगे कि उधर से भी
वैसा ही हो
जैसा कि हो रहा है इधर से।
और फिर
सब कुछ हो जाता है
सशर्त-
काटो पहाड़
पार करो उफनता दरिया
कच्चे मटकों के सहारे
खेलो अपनी जान पर
याने कि आठों पहर चढ़े रहो
किसी मचान पर।
कहते रहो कि-
'मैंने या उसने किया नहीं है
यह तो बस हो गया है
क्योंकि यह किया नहीं जाता
हो जाता है
इसमें करने वाले का
सब कुछ खो जाता है'।।

पर जब यह नहीं होता
जिस्मानी
किसी देह या शरीर से
तो फिर पूछ देखो किसी
मीरा या कबीर से
किसी रूहानी संत या फकीर से
वे कहेंगे-
'प्रेम गली अति सांकरी
या में दो न समायÓ
या
'ढाई आखर प्रेम का
पढ़े सो पण्डत होय'
ऐसे में बदल जाता है
सारा व्याकरण
उलट जाते हैं सारे समीकरण
मार्ग हो जाता है एकांगी
फिर मार्ग- मार्ग नहीं
पंथ हो जाता है
वासना का वीरेन्द्र
संसारी संत हो जाता है।
बे मौसम
चटक जाता है चम्पा
महक पड़ता है मोगरा
खिलखिला पड़ती है चमेली
जयवंती हो जाती है जुही
पलकें खुल जाती है पारिजात की
कल्पवृक्ष की कोटरों से
झर पड़ता है कोई झरना
सार्थक हो जाती है सांसें
मन में मचल जाता है
एक नया मनोज
और गाने लगता है
अब क्या डरना और क्या मरना?
आयु की मटकी में से
टपक कर बिखरने लगता है
मन का माखन
अपने आप लुटने लगता है
आत्मा का अनुराग।।
इस एकांगी- अनंत पंथ पर
चलकर देखो- मचल कर देखो
एकाध बार ऐसी पहल कर देखो
अभी बहुत उम्र बाकी है
जरा सरल हो जाओ
सार्थक के साथ- साथ
सफल हो जाओ
बनालो खुद को एक द्वीप
जरा सजल हो जाओ
प्रेमी बनकर पछाड़ खाने से
बेहतर है
बस प्रेमल हो जाओ।।

बहुत आसान है प्रेमी होना
पर प्रेमल होना बहुत कठिन है
आसान नहीं है
अनजान वीराने में
वनफूल की तरह खिलना
और अनिश्चित जीवन
के अंधेरे में
आत्मदीप होकर जलना
कोई छोटा अवदान नहीं है।।

प्रेमी एक का होता है
'सिर्फ' होता है 'केवल' होता है
पर प्रेमल
हर अंधे आकाश में
करोड़ों सूरज- लाखों चांद
और हजारों झिलमिल
नये नक्षत्र बोता है।।

दीपावलियों पर
पूजा- पाठ, ताश- जुआ
न जाने क्या- क्या करते हो
अब के थोड़ा खुद के भीतर भी
उतर के देखो
करने जैसा एक काम ये भी है
इस बार ऐसा भी कर के देखो
काली कलूटी अमावस भी
पूजा की थाली हो जाएगी
दीवाली सचमुच दीवाली हो जाएगी
जिन्दगी एक हाथ से
बजने वाली ताली हो जाएगी।।

पता: धापू धाम, 169 डॉ. पुखराज वर्मा मार्ग,
नीमच (मप्र) 458 441
मोबाइल: 9425106136

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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