March 17, 2010

दिशा

- फ्रांज काफ्का

'बड़े दुख की बात है कि दुनिया दिन प्रतिदिन छोटी होती जा रही है' चूहे ने कहा- 'पहले यह इतनी बड़ी थी कि मुझे बहुत डर लगता था। मैं दौड़ता ही जा रहा था और जब आखिर में मुझे अपने दाएं- बाएं दीवारें दिखाई देने लगीं थी तो मुझे ख़ुशी हुई थी। परन्तु अब ये लम्बी- लम्बी दीवारें इतनी तेजी से एक दूसरे की तरफ बढ़ रही हैं कि मैं पलक झपकते ही उस अंतिम छोर पर आ पहुंचा हूं, जहां कोने में एक चूहेदानी रखी है और मैं उसकी ओर बढ़ता जा रहा हूं।'
'और यहां बस, दिशा- भर बदलने की ज़रूरत है।' बिल्ली ने कहा, और उसे खा गई ।
खिड़की
जीवन में अलग-थलग रहते हुए भी हर व्यक्ति जब- तब कहीं न कहीं किसी हद तक किसी से जुडऩा चाहता है । दिन के अलग-अलग समय में, अलग-अलग मौसम और अलग-अलग काम-धन्धा होने के बावजूद भी हर आदमी कम से कम एक स्नेहिल बांह की ओर खुलने वाली खिड़की चाहता है और इसलिए वह उसके बगैर बहुत अधिक समय तक नहीं रह पाएगा । कुछ भी न करने की मन:स्थिति के बावजूद वह थके कदमों से खिड़की की ओर बढ़ जाता है और बेमन से कभी लोगों और कभी आसमान की ओर देखने लगता है, उसका सिर धीरे से पीछे की ओर झुक जाता है। परन्तु इस स्थिति में भी सड़क पर दौड़ते घोड़े, उनकी बग्घियों की खडख़ड़ और शोरगुल उसे अपनी ओर खींच लेंगे और अन्त्तत: वह जीवन- धारा से जुड़ ही जाएगा।

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