December 02, 2009

आयुर्वेद की महत्ता को वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया तांबा


भारतीय परिवार के रसोई में किसी जमाने में तांबे, पीतल, कांसे के बर्तन ही नजर आते थे। स्टील के बर्तन तो आधुनिक समय की देन है। दरअसल हमारी संस्कृति में तांबे, पीतल और कांसे के बर्तनों का इस्तेमाल करने के पीछे अनेक स्वास्थ्य संबंधी कारण छिपे हुए हैं।
भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के अनुसार तो नियमित रूप से तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी पीने से हमारा शरीर चुस्त-दुरूस्त रहता है तथा कब्ज एसिडिटी, अफारा, विविध चर्म-रोग, जोड़ों का दर्द इत्यादि शिकायतों से मुक्ति मिलती है। सवेरे उठकर बिना ब्रश किए हुए एक लीटर पानी पीना स्वास्थ के लिए हितकर होता है। आयुर्वेद की मानें तो ताम्र-धातु से निर्मित 'जल-पात्र' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। तांबे के अभाव में मिट्टी का 'जल-पात्र' भी हितकर बतलाया गया है।
तांबा खाद्य- पदार्थों को जहरीला बनाने वाले विषाणुओं को मारने की क्षमता तो रखता ही है, साथ ही कोशिकाओं की झिल्ली और एंजाइम में हस्तक्षेप करता है, जिससे रोगाणुओं के लिए जीवित रह पाना संभव नहीं हो पाता है।
अब देश- विदेश के वैज्ञानिकों ने भी आयुर्वेद की इस महत्ता को साबित करने के लिए शोध करना प्रारंभ कर दिया है। नेचर में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन की नार्थम्बिया यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्ट रॉब रीड ने अपनी भारत- यात्रा के दौरान तांबे के बर्तन में रखे पानी के फायदों के बारे में सुना और यह जाना कि यह पानी बीमारियों से कैसे बचाता है। उन्होंने यूनिवर्सिटी लौटकर इस तथ्य का परीक्षण करने का निर्णय किया। परीक्षण करते समय मिट्टी और तांबे के बरतनों में 'ई-कोली' रोगाणुओं वाला पानी भर दिया गया। परिणाम चौंकाने वाले थे। छह घंटों बाद तांबे के बर्तन में रखे पानी में इन रोगाणुओं की संख्या काफी कमी देखी गई। चौबीस घंटों के बाद पानी में नाम -मात्र के रोगाणु पाए गए, वहीं अड़तालीस घंटों के बाद इसमें रोगाणुओं की संख्या में काफी कमी देखी गई। रॉब ने सोसायटी फॉर जनरल माइक्रोबायोलॉजी की एडिनबरा में हुई बैठक में बताया कि रोगाणुओं का सफाया करने में तांबे [कॉपर] की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है।
ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि स्टेनलैस स्टील के बर्तनों वाले रसोईघरों की अपेक्षा तांबे के बर्तनों से सुसज्जित रसोईघर हानिकारक जीवाणुओं से अधिक सुरक्षित होते हैं। उन्होंने कहा कि तांबे के बर्तन में ई-कोली जैसे खतरनाक जीवाणु नहीं पनप सकते। परीक्षणों से यह भी साबित हुआ है कि सामान्य तापमान में तांबा सिर्फ चार घंटे में ई-कोली जैसे हानिकारक जीवाणुओं को मार डालता है। इसके विपरीत स्टेनलैस- स्टील के धरातल पर जीवाणु एक महीने से भी ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते हैं।
इसी प्रकार बर्मिघम के एक अस्पताल द्वारा कराए गए शोध से भी इसकी पुष्टि होती है कि यह आयुर्वेदिक मान्यता काफी हद तक सही है। अस्पताल ने एक दूसरे परिप्रेक्ष्य में इसे साबित किया है। शोधकर्ताओं ने एक पारंपरिक शौचालय की शीट, नल के हैंडल एवं दरवाजे के पुश-प्लेट को हटाकर उनकी जगह तांबे से बने सामान लगा दिए। उन्होंने दूसरे पारंपरिक शौचालय की उपरोक्त वस्तुओं की सतह पर मौजूद जीवाणुओं के घनत्व की तुलना ताम्र वस्तुओं की सतह पर उपलब्ध जीवाणुओं के घनत्व से की। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ताम्र सतह पर उपलब्ध जीवाणु की संख्या गैर ताम्र सतह पर उपलब्ध जीवाणुओं की संख्या से 90 से करीब 100 फीसदी कम थी।
अध्ययन दल के प्रमुख यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल बर्मिघम (यूएचबी) के प्रोफेसर टॉम इलियट कहते हैं, 'बर्मिघम एवं दक्षिण अफ्रीका में परीक्षण से पता चलता है कि तांबे के इस्तेमाल से अस्पताल के भूतल को काफी हद तक हानिकारक जीवाणु से मुक्त रखा जा सकता है।' उन्होंने कहा कि कॉपर बायोसाइड के इस्तेमाल से जुड़े शोध से भी पता चलता है कि तांबा संक्रमण को दूर करता है। यही तथ्य ताम्र पात्रों पर भी लागू होती है।
इसीलिए तो पुराने जमाने में लोग कहते थे कि लोहे के बर्तन में रखा हुआ दूध तथा तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी पीने से व्यक्ति को कभी भी
यकृत (लीवर) तथा रक्त-संबंधी रोग नहीं होते तथा पेट की किसी भी प्रकार की बीमारी से पीडि़त को तांबे के बर्तन में रखा पानी ही पीना चाहिए। तो यदि आप अपच, भूख नहीं लगना, कब्ज होना, अल्सर इत्यादि शिकायतों से पीडि़त रहते हैं, तो अविलंब ताम्र-पात्र में रखा हुआ पानी पीना आरंभ कर दें।
(उदंती फीचर्स)
ताम्रजल के लाभ
आयुर्वेद में रसरत्नसमुच्चय ग्रंथ के पांचवें अध्याय के श्लोक 46 में कहा गया है कि अंदर तथा बाहर से अच्छी तरह से साफ किए हुए तांबे या पीतल (यह मिश्र धातु 70 प्रतिशत तांबा और 30 प्रतिशत जस्ते का संयुग है) के बर्तनों में करीब आठ से दस घंटे तक रखे पानी में तांबे और जस्ते के गुण संक्रमित होते हैं और यह पानी (ताम्रजल) संपूर्ण शरीर के लिए लाभदायक होता है। इस ग्रंथ में तांबे-पीतल की धातुओं से बने बर्तन में तकरीबन आठ से दस घंटे रखा पानी पीना या ऐसे पानी में पकाए हुए व्यंजनों का सेवन करना सेहत के लिए फायदेमंद बताया गया है। तांबे तथा जस्ते के औषधीय गुण पानी में शामिल करने के लिए बर्तन का पूरी तरह से साफ - सुथरा होना अति आवश्यक है। इसलिए पानी रखने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले तांबे या पीतल के बर्तन हर एक दिन के बाद अच्छी तरह घिसकर चमकाने चाहिए। इसकेे लिए कि सी अच्छी कंपनी के माध्यम का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि काले बर्तनों में रखा हुआ पानी सेहत के लिए फायदेमंद नहीं रहता।
तांबे से शरीर को मिलने वाले लाभ- त्वचा में निखार आता है, कील-मुंहासों की शिकायतें भी दूर होती हैं। पेट में रहनेवाली कृमियों का विनाश होता है और भूख लगने में मदद मिलती है। बढ़ती हुई आयु की वजह से होने वाली रक्तचाप की बीमारी और रक्त के विकार नष्ट होने में सहायता मिलती है, मुंह फूलना, घमौरियां आना, आंखों की जलन जैसे उष्णता संबंधित विकार कम होते हैं। एसिडिटी से होने वाला सिरदर्द, चक्कर आना और पेट में जलन जैसी तकलीफें कम होती हैं। बवासीर तथा एनीमिया जैसी बीमारी में लाभदायक । इसके कफनाशक गुण का अनुभव बहुत से लोगों ने लिया है। पीतल के बर्तन में करीब आठ से दस घंटे पानी रखने से शरीर को तांबे और जस्ते, दोनों धातुओं के लाभ मिलेंगे। जस्ते से शरीर में प्रोटीन की वृद्घि तो होती ही है साथ ही यह बालों से संबंधित बीमारियों को दूर करने में भी लाभदायक होता है।

1 Comment:

Vinay Singh said...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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