January 01, 2021

कुछ क्षणिकाएँ- पहरे पर होता चाँद

पहरे पर होता चाँद

-रचना श्रीवास्तव 

  1

साँवली  रात की

सिलवटों में

खोए रहते थे हम

और पहरे पर होता चाँद

खुल चुकी हैं

सिलवटें अब तो ,

और घायल है चाँद

2

सौपके खुशबू

दर्द  ने बढ़ाया

सदा हौसला मेरा

आज जो मुड़के देखा

वो भी

हाथों में काँटे लिये खड़ा था

3

चाँद

जिसे आगोश में ले

जीभर रो लेती थी

अँगुलियों की झिर्री से

कूदकर बोला-

बरसात का मौसम

भाता नहीं मुझे

4

आज फिर

उतरी है

मोहब्बत के दरिया में

आज फिर डूबेगा

नाम कोई

कहते हैं-

प्यार करने वालों को

पक्के घड़े

नहीं मिलते

5

काली आँधी  के

गुजरने के बाद

उसने देखा-

चाँद खुद में सिमटा

रात की सिलवटों में पड़ा था

मैने उसे थामने को हाथ बढ़ाया

तो बोला

मुझे मत छुओ

मुझे ग्रहण लगा है

6

प्यार को

मज़बूरी  का कफ़न उढ़ा

सुकून से सुलाया था

दुनियादारी की हवा

उस को उड़ा गई

और मेरी गृहस्थी जल उठी

7

वो आया

 कुछ शब्द

मेरे हाथों में सौपके चला गया

अँजुरी की झिर्रियों स

निकल गिरे वो ज़मीन पर

एक सोता फूटा

8

और  

एक सोच थी 

जो मेरी थी 

आज तुमने उस पर भी 

पहरे लगा दिए 

कहकर

तुमने मुझसे पूछके 

सोचा था 

 हर चीज पर 

राज करना तुम्हें क्यों जरूरी है 

एक बार किसीको 

खुद पर राज करने दो 

समझ जाओगे 

कितनी घुटन होती  

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