December 05, 2020

व्यंग्य- दया के पात्र

-विनय कुमार पाठक

तर्केशजी और जिज्ञासु प्रसाद निकले अपने ऑफिस से, लंच लेने के बाद। जानकार लोगों का कहना है कि ऑफिस में लगातार चार घंटे आराम करने के बाद थोड़ा टहल घूम लेना सेहत के लिहाज से अच्छा रहता है। ऑफिस जाने वाले छुट्टी से इस कारण से भी कतराते हैं कि घर में मैडम ठीक से आराम नहीं करने देतीं और तुलनात्मक रूप से ऑफिस में ज्यादा आराम मिलता है। लॉकडाउन के दौरान घर में रहने वालों ने इस बात को शिद्दत से महसूस किया। ऑफिस के ठीक सामने सड़क से बाईं ओर जाने के बाद एक तिराहा था। वहाँ से बायें मुड़ने पर  सड़क के उस पार मंत्रालय था इस पार विधान भवन। रोड के किनारे चल कर दोनों विधान भवन के रास्ते से हो कर एक चक्कर लगा कर वापस ऑफिस आ जाते थे। आज रोड पार कर दोनों विधान भवन की ओर मुड़ने को हुए कि देखा रास्ते को रोक दिया गया है। अरे! यह क्या इतनी ताम झाम क्यों है यहाँ। जिज्ञासु ने पूछा। विधान सभा का सत्र प्रारंभ होने वाला है, लगता है उसी की तैयारी हो रही है। तर्केश जी ने कहा। पर इसके लिए इतनी तैयारी करने की क्या आवश्यकता है?’ जिज्ञासु ने जिज्ञासा व्यक्त की। दलित-पीड़ित-कमजोर लोगों के प्रति दुनिया का नजरिया बड़ा ही क्रूर है और व्यवहार बड़ा आततायी। अतः उन्हें सुरक्षा और संरक्षा देना लाजिमी है। तर्केश जी ने बताया। पर यहाँ दलित-पीड़ित कौन है?’ जिज्ञासु की जिज्ञासा शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी जैसे काश्मीर की समस्या धारा 370 के समाप्त होने के बाद भी समाप्त होने का नाम नहीं लेती। भाई दलित-पीड़ित, वंचित-लुंठित विधान सभा के सदस्यगण है। उनके लिए ही अस्थायी टेंट लगाए जा रहे हैं।  उनके लिए ही  इन टेंटों में सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने कैंप किया हुआ है। ऊँचे-ऊँचे मचान लगाकर एके 47 से लेकर केए 94 तक के स्टेनगन से सुरक्षा प्रहरियों को लैस किया गया है। और वो देखिए आँखों पर चश्मा लगाए ब्लैक कमांडो भी उन्हीं की रक्षा के लिए तैनात हैं।

विधान सभा में जो विधायकगण आएँगे, वे बेचारे दबे-कुचले, दलित-पीड़ित, अपमानित- प्रताड़ित हैरान-परेशान लोग कैसे हो सकते हैं? वे तो साक्षात्‌ विधायिका हैं, विधि बनाते हैं। उन्हें इतनी सुरक्षा क्यों चाहिए भला?’

यदि इतनी सुरक्षा व्यवस्था न की जाए, तो जाने कौन आकर इनके कान के नीचे बजा दे, कौन चेहरे को उनके दिल के रंग की तरह काले रंग से पोत दे, कौन मिर्ची पावडर स्प्रे कर उन्हें वे एहसास दिला दे, जो वे जनता को अपने कृत्यों तथा वचनों से अक्सर अहसास दिलाते रहते हैं।

दोनों विधान भवन की ओर मुड़ नहीं सकते थे अतः एयर इंडिया कार्यालय से होकर वापस आए। रास्ते में उन्होंने देखा कि राह में आने वाले छोटे-मोटे पान गुटखा की दुकानों, मोची की दुकानों आदि को भी बंद कर दिया गया था। बेचारे फूटपाथ के दुकानदारों, कर्मकारों से भी दबे कुचले हैं और दुनिया है कि उनके खिलाफ विषवमन करती रहती है। उनके ऊपर जनता के टैक्स के पैसे का दुरुपयोग करने का आरोप मढ़ती रहती है। तरह- तरह के अनुचित प्रश्न जैसे जब अनलिमिटेड कॉल 2000 रुपये में उपलब्ध है तो उन्हें 60-65 हजार रुपये टेलीफोन बिल के कैसे मिलते हैं! जब वे जनसेवा करते हैं ,तो पेंशन के हकदार कैसे हैं? जब सभी जगहों पर सेवानिवृत्ति की आयु तय है तो उन्हें कब्र में पैर लटकने पर भी सक्रिय रह कर कुकर्म, माफ कीजिएगा जनता की सेवा करने का मौका क्यों दिया जाता है? उन्हें कैंटीन में इतनीस्ती  दर पर खाना क्यों मिलता है, जितना तो लाल कार्ड वालों को भी नहीं मिलता। मुफ़्त यात्रा की सुविधा मिलती है आदि- आदि।

अरे भाई, जो इतना कमज़ोर है कि उसे आम जनता से सुरक्षा लेनी पड़ रही है ,उसके प्रति दया भाव रखो, न कि तरह-तरह के प्रश्न उठाकर उन्हें अपमानित प्रताड़ित करो। अब ये मत कहना अपमान तो उसका होता है, जिसका मान होता है; इनका अपमान होना तो संभव ही नहीं है। इन कमजोर निरीह प्राणियों पर बस दया करो। अपने देश में तरह तरह के कमजोर दलित पीड़ित लोग हैं, जिन्हें आरक्षण की आवश्यकता पड़ती है। हरियाणा में देखो कमज़ोर लोग सिर्फ चंद हज़ार गाड़ियों में आग लगा पाए अपने आरक्षण की माँग के लिए। राजस्थान में देखो बेचारे दलित-पीड़ित सिर्फ़ रेलवे ट्रैक उखाड़ पाते हैं और सिर्फ हज़ारों लाखों लोगों को ही परेशान कर पाते हैं। बेचारे हवाई यात्रा के ट्रैक को कहाँ उड़ा पाते हैं? इसी प्रकार महाराष्ट्र में बेचारे दलितो-पीड़ितों ने भी कुछ हजार दुकानों- वाहनों को ही नुकसान पहुँचा पाए, जबकि मुंबई जैसे शहर में इसके लिए काफी संभावनाएँ थीं। इसी प्रकार हमारे विधान सभा के सदस्य और सांसद भी बेचारे सिर्फ़ अपने देश का ही अहित कर पाते हैं, जबकि दुनिया में दो सौ देश हैं। अब बताओ ये हैं कि नहीं दया के पात्र?’

तर्केश जी और जिज्ञासुजी रास्ते में पुलिस बल से खुद को बचाते हुए वापस ऑफिस को आए और प्रण लिया कि जबतक विधान सभा का सत्र चलेगा वे ऑफिस से बाहर चहलकदमी करने नहीं जाएँगे; क्योंकि हो सकता है किसी को पदोन्नति लेने की जल्दी हो और ऐसे में उन्हें शहरी नक्सल की आवश्यकता आ पड़े और मजबूरी में उन्हें उनका सदुपयोग करना पड़े।

सम्पर्कः 605, सेम-ए, शिप्रा सृष्टि, इंदिरापुरम, गाजियाबाद , उ.  प्र. 201014टMobile no.  9001895412

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3 Comments:

At 12 December , Anonymous Anonymous said...

सामाज के इन पीड़ित वर्ग की सुरक्षा हमारा धर्म ही नहीं महाधरम है वर्ना बाकी लोग पीड़ित अलग ढंग से पीड़ित हो जायेंगे...
बिनाय जी, आपने सामाज के पीड़ितों की दशा (दुर्दशा) बहुत ही बेहतरीन ढंग से सजाया है.
Dilip.dk2001@gmail.com (dilip kumar Turi)

 
At 12 December , Blogger Unknown said...

Excellent sir ji

 
At 12 December , Blogger Binay Kumar Pathak विनय कुमार पाठक said...

Thanks sir

 

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