September 10, 2020

मुक्तछंद कविता


परकटा परिन्दा

- रमेशराज

आज फिर
लटका हुआ था
पत्नी का चेहरा
फटी हुई धोती
और पेटीकोट की शिकायत के साथ।

आज फिर
बिन चूडिय़ों के
सूने-सूने दिख रहे थे
पत्नी के हाथ।

मैंने उसका आदमी
होने का सबूत देना चाहा
सारा इल्जाम
अपने सर लेना चाहा,
मैं बाजार गया और
अपनी अँगूठी बेचकर
धोती-चूड़ी
और पेटीकोट खरीद लाया।
इसके बाद
मैं हफ्तों मुसका नहीं पाया।

आज फिर लटका हुआ था
मेरे बेटे का चेहरा
कॉपी, पेंसिल, किताब
और स्कूल फीस की
शिकायत के साथ,
आज फिर वह
पहले की तरह
कर नहीं रहा था
हंस-हंस कर बात।

मैंने उसे बाप होने का
सबूत देने चाहा
मैं लाला रामदीन के
घर पर गया
और अपनी घड़ी
गिरवी रख आया।
फिर बाजार से
कॉपी, किताब खरीद लाया,
स्कूल फीस चुका आया।

बच्चे ने पूछा मुझ से
घड़ी के बारे में,
पत्नी ने पूछा मुझ से
अँगूठी के बारे में।
मैंने आदमी और बाप
दोनों का एक साथ
सबूत देना चाहा।
उत्तर में
मेरे होठों पर
एक अम्ल-घुली मुस्कराहट थी
गले में
परकटे परिन्दे जैसी
चहचहाचट थी।

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