July 10, 2020

करिश्मा कुदरत का

करिश्मा कुदरत का
- विजय जोशी (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
              बचपन में सुमित्रानंदन पंत रचित एक कविता धरती कितना देती है आज फिर एक बार मानस पटल पर उभर आई - मैंने बचपन में छुपकर पैसे बोये थेसोचा था पैसों के पेड़ उगेंगे, और मैं फूल फूल कर मोटा सेठ बनूंगा। कविता इसी तर्ज पर आगे बढ़ती जाती है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ और समापन तक यह बात सिद्ध हो जाती कि पैसे का सोच तो बहुत छोटा था। धरती तो उससे कई गुना आगे जाकर कितना अधिक देती है इंसान को।
बात का संदर्भ यह है प्रकृति ने पुरुष और पर्यावरण का इतना सुंदर संतुलन बना रखा है कि मानवता निर्बाध रूप से सतत आगे बढ़ सके। आदमी जीने के लिये आक्सीजन(O2) ग्रहण कर बदले में कार्बन डाइ आक्साइड (CO2) छोड़ता है तो पेड़ रात में उसी कार्बन डाइ आक्साइड को फिर आक्सीजन में परिवर्तित करके आदमी को लौटा देते हैं ताकि वह जी सके। लेकिन दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आदमी के लोभ का तो निरंतर विस्तार हो रहा है और पेड़ रहे हैं सिमट। लालचग्रस्त इंसान को इतनी छोटी सी बात भी समझ में नहीं आई कि पेड़ कटेंगे तो वह कैसे जी पाएगा प्रदूषित वातावरण में। और तब आता है वह पल जब प्रकृति उसे सबक सिखाती है संभावतया कोरोना जैसी किसी त्रासदी का आकार लेकर।
    खैर यहां प्रसंग की सामयिकता उभरी है एक छोटे से उदाहरण के माध्यम से। एक  बुजुर्ग को हाल ही में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उसे वेंटिलेटर पर रखते हुए आक्सीजन की सहायता से स्वस्थ किया गया और जब स्वस्थ हुआ तो डाक्टर ने उसे कृंदन न करने की सांत्वना देते हुए वेंटिलेटर उपयोग का भरी भरकम बिल थमा दिया।
 बिल सचमुच बहुत अधिक था जो उसने चुका तो दियाकिन्तु उसी पल उसे एहसास हुआ कुदरत के करिश्मे का। उसने  कहा मैंने अपने जीवन के अस्सी वसंत देख लिए, लेकिन इस बात को कभी अनुभव नहीं किया कि प्रकृति ने इतने वर्ष कुछ भी लिए बगैर नि:शुल्क आक्सीजन प्रदान कर मुझे जीवित रखा। मुझे एक भी पैसा नहीं चुकाना पड़ा। लेकिन केवल एक दिन अस्पताल में रहने के लिये उसी आक्सीजन हेतु कितनी अधिक राशि चुकानी पड़ी जो एक आदमी के संभव ही नहीं। अब मुझे समझ में आया कि मैं ईश्वर और प्रकृति का कितना ऋणी हूँ तथा इस अवदान के लिए मैंने एक बार भी धन्यवाद तक नहीं कहा।   
उपरोक्त संस्मरण भले ही पूरी तरह प्रामाणिक न हो पर इसकी सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे तथ्य हमें तब ही समझ में आते हैं जब हम अस्पतालों में भर्ती होते हैं। मंतव्य स्पष्ट है कि यदि अब भी न चेते तो किस दिन काल कवलित होकर इतिहास बन जाएँगे हमें खुद ज्ञात नहीं। सो जब जागे तभी सवेरा। उत्तिष्ठ भारत। बकलम इक़बाल वतन की फ़िक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है।
धरती बंजर हो गयीबादल गए विदेश
पर्यावरण बिगाड़ करलड़ते सारे देश
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

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14 Comments:

At 20 July , Blogger प्रीति अग्रवाल said...

बहुत सुंदर निष्कर्ष!....प्रकृति की उदारता, और मानव की कृपणता का सटीक वर्णन!

 
At 21 July , Blogger विजय जोशी said...

हार्दिक धन्यवाद

 
At 22 July , Blogger Tarak Nath Chowdhury said...

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At 22 July , Blogger Tarak Nath Chowdhury said...

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At 22 July , Blogger Tarak Nath Chowdhury said...

आज विजय जोशी जी के इस आलेख के माध्यम से जान पाया कि पेड़-पौधेCO2से नहींN2(नत्रजन)से आॉकसीजन बनाते हैं।नवीन ञानकारी प्रदाता को *साधुवाद*!

 
At 26 July , Blogger Sudershan Ratnakar said...

प्रकृति तो ख़ुशी से हमें झोलियाँ भर भरके सौग़ातें देती है यह तो मानव ही कृतघ्न है जो उसका दोहन करने में एक पल भी नहीं चूकता। बहुत सुंदर

 
At 30 July , Blogger विजय जोशी said...

That was mistake by my end by oversight. So regretted. I a firm believer in 2 theories.
1) Theory of non attachment preached by Lord Krishna
2) Theory of Confession preached in christianity.
So confess Tarak NathJi.
Kind Regards

 
At 30 July , Blogger विजय जोशी said...

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार सुदर्शनजी.

 
At 30 July , Blogger देवेन्द्र जोशी said...

प्रकृति का काम तो देना ही है। लेकिन लालच उसके लिए हानिकारक है।

 
At 30 July , Blogger विजय जोशी said...

बिल्कुल सही कहा आपने. आप से सकारात्मकता का पाठ पढ़ा है मैंने. सो सादर साभार आपका आभार

 
At 31 July , Blogger Vijendra Singh Bhadauria said...

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At 31 July , Blogger Vijendra Singh Bhadauria said...

गलती के लिए साधुवाद!
अच्छा ताना मार लेते हैं :)
मगर इस कहानी में कुछ अच्छाई भी दिखी या सिर्फ गलती ही देख सके?

If someone is trying to convey a good message to society then we should obviously support him by making him aware of his mistakes. But you don't seem to support.. rather you seem to demotivate the author.

It is not fair !

 
At 01 August , Blogger विजय जोशी said...

Dear Vijendra,
- I'm touched by Your concern for me. You know I try my best to not to feel offended in an awkward situation like this.
- पश्चाताप एवं प्रायश्चित is essence of life particularly when our fault affects image of an organization or magazine even though it must have happened inadvertently.
- They are 2 approach in such situations Fault Finding or Root Cause Analysis. Choice is ours to adopt.
- In fact Tulsi has welcomed the importance of right critics in life.
- निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छपाय
- बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय
Hope You are doing fine on software development front. Shall meet shortly on webinar dedicated to managing life.
Thanks & Regards

 
At 01 August , Blogger Vijendra Singh Bhadauria said...

Yes I will surely be attending it sir

 

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