November 12, 2019

चार क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ

-प्रियंका गुप्ता

1.यादें
जैसे एक आँच लगी हो उँगली में
और तिलमिला जाए मन;
या फिर
अँधेरे में
लगी हो एक ठोकर
बिन दिखे घाव में
दर्द भयंकर;
तकलीफ़ तो होती है-
है न ?
2. यादें
जैसे सर्द हवा में
बोनफायर के सामने बैठ
हाथ तापना;
या फिर
किसी रेगिस्तान में
झुलसने से पहले
नखलिस्तान का मिल जाना;
राहत तो मिलती है-
है न ?
3. अकेलापन
जैसे सीली सी धूप में
गीले कपड़े सुखाना
या फिर
आसमान की नमी को
आँखों में छुपाना;
बहुत देर नमी रहे तो
फफूँदी लग जाती है-
है न ?
4. अकेलापन
जैसे किसी अनजानी कील से
टीसता छिलापन
या फिर
गर्म धूप में भागते हुए
झुलसा पैर;
किसी को समझाओगे कैसे
बहुत दर्द होता है-
है न ?

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