September 09, 2018

जीवन के दो रंग

1. बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने...
जनवरी 1977 की एक सर्द शाम। दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की एक रैली थी। रैली यूँ तो 4 बजे शुरू हो गई थी, लेकिन अटल बिहारी बाजपेयी जी की बारी आते- आते रात के साढ़े नौ बज गए थे। जैसे ही बाजपेयी जी बोलने के लिए खड़े हुए, वहाँ मौजूद हज़ारों लोग भी खड़े हो कर ताली बजाने लगे।
अचानक बाजपेयी जी ने अपने दोनों हाथ उठा कर लोगों की तालियों को शान्त किया। अपनी आँखें बंद कीं  और एक मिसरा पढ़ा-
'बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने...
बाजपेयी जी थोड़ा ठिठके। लोग आपे से बाहर हो रहे थे। बाजपेयी जी ने फिर अपनी आँखें बंद कीं। फिर एक लम्बा पॉज़ लिया और मिसरे को पूरा किया-
'कहने सुनने को बहुत हैं अफ़साने।
इस बार तालियों का दौर और लंबा था। जब शोर रुका तो बाजपेयी जी ने एक और लंबा पॉज़ लिया और दो और पंक्तियाँ पढ़ीं-
 'खुली हवा में ज़रा साँस तो ले लें,
 कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने?’
उस जनसभा में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह बताती हैं- ''ये शायद 'विंटेज वाजपेयीका सर्वश्रेष्ठ रूप था। हज़ारों -हज़ार लोग कड़कड़ाती सर्दी और बूँदा-बाँदी के बीच बाजपेयी जी को सुनने के लिए जमा हुए थे। इसके बावजूद कि तत्कालीन सरकार ने उन्हें रैली में जाने से रोकने के लिए उस दिन दूरदर्शन पर 1973 की सबसे हिट फिल्म 'बॉबीदिखाने का फ़ैसला किया था;लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ था। बॉबी और बाजपेयी जी के बीच लोगों ने बाजपेयी को चुना। उस रात उन्होंने सिद्ध किया कि उन्हें बेबात ही भारतीय राजनीति का सर्वश्रेष्ठ वक्ता नहीं कहा जाता।‘’
2. राखी की वह अनुपम सौगात
 बाजपेयी जी जहॉँ जाते, एक अपनेपन का रिश्ता स्वत: ही जुड़ जाता था। फतेहाबाद में भी करीब 43 साल पहले वह एक आदर्श रिश्ता जोड़ गए। वह रिश्ता था, धर्म भाई का। अपने स्तर पर वह इस रिश्ते को बखूबी निभाते रहे। उस सुखद पल को याद करती हुई डॉ. एन रॉय की बेटी डॉ. रमेश चक्रवर्ती बेहद भावुक हो जाती हैं।
वह बताती हैं कि वर्ष 1975 में भारतीय जनसंघ के कट्टर समर्थक डा. एन रॉय के घर कार्यकर्ताओं की मीटिंग रखी गई थी। डॉ. मंगल सेन सरीखे कद्दावर जनसंघ के पदाधिकारियों की मौजूदगी वाली इस बैठक की अध्यक्षता अटलजी को करनी थी। वह समय से आए। मैंने उनका स्वागत किया। इसके बाद अटलजी की कलाई पर राखी बाँधी और फिर तिलक लगाया। अटलजी ने मेरे सिर पर स्नेह-भरा हाथ रखते हुए सौ रुपये दिए थे। उस सौ के नोट को मैंने वर्षों तक सहेज कर रखा।
डॉ. रमेश चक्रवर्ती कहती हैं, धर्म-भाई स्वीकारते हुए उन्होंने पत्राचार करते रहने के लिए कहा। इस तरह करीब 15 साल तक चिट्ठियाँ लिखने का सिलसिला जारी रहा। अटलजी उनके हर पत्र का जवाब देते थे। उनका जवाब देश के प्रति ईमानदार रहने के आदेश से ही शुरू होता था। इसके बाद ही हालचाल पूछा जाता था। डॉ. चक्रवर्ती कहती हैं कि अपने भाई के व्यक्तित्व पर ताउम्र नाज करती रहूँगी। जन-जन के प्रिय भाई अटलजी को शत-शत नमन...।

Labels:

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home