January 27, 2018

व्यंग्य

   किसी के पास भी टाइम नहीं हैं
                     - देवेंद्रराज सुथार
मैंने बस स्टैंड पर खड़े एक भाईसाहब से पूछा - क्या टाइम हुआ है ? मोबाइल पर व्यस्त और मुह में दबा हुए पान मसाला मस्त बोले -  मेरे पास टाइम बताने के लिए फोकट का टाइम नहीं है। जवाब के बाद मैं समझ गया भाईसाहब बड़े व्यस्त किस्म के प्राणी है। खैर ! बस आई और मैं बस में बैठकर पहुँच गया एक अजनबी शहर की हवा खाने। मैंने बस से उतरते ही एक चाय की टपरी वाले से पूछा - भाईसाहब ! तनिक यह पता तो बताये जरा ! टपरी वाला बोला - पता जानने के पन्द्रह रुपये लगेंगे और पते पर पार्सल करने के पचास रुपये नकद लिये जाएँगे। बोलो मंजूर होतो बाकी फोकट का अपुन के पास टाइम नहीं है। मैंने सोचकर विचार किया चलो ! इंसान के पास पता बताने के लिए भले ही टाइम न हो, पर हमारे प्रिय गूगल भाई के पास पता बताने के लिए टाइम ही टाइम है। मैंने गूगल पर पड़ताल की ओर पते पर पहुँच गया।  
मित्र से मिलकर वापस बस स्टैंड पर आया, तो एक दृष्टिहीन सज्जन हर किसी से सड़क पार करवाने की विनती कर रहे थे। कोई भाई सड़क पार करवा दो ! पर उनकी तरफ कोई भाई ध्यान नहीं दे रहा था। शायद ! किसी के पास उनके लिए टाइम नहीं है। इधर, दूसरी ओर मैं देखता हूँ दो गुंडों की लड़ाई हो रही है। लड़ाई का लुत्फ़ उठाने के लिए भीड़ का हुजूम उमड़ पड़ा है। जैसे गुड़ पर मक्खियाँ भिनभिनाती है, वैसे ही लोग भिनभिना रहे है। तमाशबीन हाथ में मोबाल लेकर मजे से वीडियो उतार रहे है। मैं समझ गया लोग वीडियो लेने में व्यस्त है। इसलिए टाइम नहीं है। मैंने सज्जन को सड़क पार करवा और घर आ गया। लेकिन, मेरी जिज्ञासा का अभी अंत नहीं हुआ था। मेरी तहकीकात जारी थी। टाइम लोगों से इतना दूर क्यों भाग रहा है ? आखिर लोग इतने व्यस्त कैसे होते जा रहे है ? ऐसे कई सवाल खोपड़ी में बवाल कर रहे थे। यूँ कहिए कि बवाल ही नहीं धमाल मचा रहे थे।
हैरत तो यह जानकार हुई कि हमारे पड़ोस के जो युवा बेरोजगारी की बीन बजाते मिलते थे, जब वे भी यह कहने लगे हमारी पास टाइम नहीं है। मैंने रात दिन खोज की तो मुझे पता चला कि लोगों के पास भले ही किसी अबला की अस्मत बचाने के लिए टाइम नहीं हो पर लूटने के लिए टाइम ही टाइम है। भले ही लोगों के पास वोट देने का टाइम नहीं हो पर सरकार को गालियाँ देने के लिए टाइम ही टाइम है। भले ही यार के पास अपने लँगोटिये यार के लिए टाइम न हो पर फेसबुक पर शीला सुलबुली से चैट करने के लिए टाइम ही टाइम है। भले नेताओं के पास विकास को जमीन पर अवतरित करने के लिए टाइम नहीं हो पर नारों की गंगा-यमुना प्रवाहित करने के लिए टाइम ही टाइम है। भले लोगों के पास बावन सेकंड के राष्ट्रगान के लिए टाइम न हो और चार घंटे की फिल्म देखने के लिए टाइम ही टाइम है। 
जब आज के इस इंडिया में इंसान के लिए इंसान के पास टाइम नहीं है तो डिजिटल इंडिया में तो टाइम शोध का विषय बन चुका होगा। आज जब देश का हर इंसान कह रहा है टाइम नहीं है... टाइम नहीं है...तो आबादी इतनी है और यदि टाइम मिल जाये तो कितनी ? टाइम नहीं है तो इतने घोटाले हो रहे है और यदि टाइम मिल जाए तो कितने? टाइम नहीं है तो इतने बाबा पकड़े जा रहे है और टाइम मिल तो जाये कितने ? बच्चा पैदा होते ही चलना सीख रहा है। माँ कहती है - मेरे कान्हा, मेरे लाल घुटनों पर चल, बाललीला तो कर। बेटा कहता है - माँ ! तेरी बात तो सही है, मेरे पास टाइम नहीं है। व्यापारी के पास परिवार के लिए और नेता के पास सरकार के लिए टाइम नहीं है। यह बात सोलह आने सही है, पुलिस के पास रक्षा के लिए और शिक्षक के पास शिक्षा के लिए टाइम नहीं है। फेसबुक के दौर में बच्चों के पास बुक के लिए टाइम नहीं है। पड़ोसी के दुःख और खुद के सुख के लिए भी टाइम नहीं है। अमीर की क्या बात करेयहाँ तो गरीब के पास भी टाइम नहीं है। 
लेखक परिचयः वर्तमान में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अध्ययनरत। विभिन्न समाचार-पत्रों में व्यंग्यों का प्रकाशन। सम्पर्कः गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान- 343025, मो. 8107177196
Email: devendrasuthar196@gmail.com

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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