October 24, 2017

मौसम:

 ...धरा ने ओढ़ ली सफेद चादर  
- रश्मि शर्मा
कल निकल गई थी शहर से दूर.....अचानक नजर पड़ गई कास के सफेद फूलों पर। झट से याद आ गई स्कूल पाठ्यक्रम  में पढ़ी तुलसीदास रचित शरदलालित्य का वर्णन.....
 ‘वर्षा विगत शरदरितु आई, देखहूं लक्ष्मण परम सुहाई,
 फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढा़ई
  पुराने को तज के नए की ओर देखने का वक्त है शरदऋतु.....जब बारिश  समाप्ति की ओर होती है तो हमें सबसे पहले मैदानी इलाकों में कास के सफेद फूल लहलहाते दिखाई पड़ते हैं। लगता है धरा ने सफेद चादर ओढ़ ली है।  बहुत ही मनोरम होता है यह दृश्य....कास के फूल जब तेज हवाओं से झूमते हैं तो मन आनंदित हो जाता है, जैसा कि कल मेरा हो गया था। उस पर से लगातार बारिश....सफेद आसमान में आच्छादित बादलमन को धवल मुग्धता से बाँध रहे थे। जैसे पूरी धरा स्नान कर तरोताज़ा हो गई हो। सब कुछ नया, सुंदर मनमोहक.....
तो सामने खड़ी थी शरद ऋतु.....शरद ऋतु यानी त्योहारों का मौसम...फूलों का मौसम...सबसे खूबसूरत होता है नाजुक हरसिंगार का खिलना और धरती पर बिछ जाना.... मैं ढूँढती हूँ रातों में खिले हरसिंगार ...उसके नारंगी डंठल को देख हर्षित होती हूँ...और एकदम सुबह  समेट लाती हूं हथेलियों में। मन में उपजे नाज़ुक अहसास के साथ शहर के कुछ किलोमीटर दूर निकल जाइए तो तालाब - पोखरों में लाल-सफेद कमल और कुमदिनी लदे दिखते हैं, यहाँ तक कि गड्ढों में भी कुमुदिनी सुशोभित होती है। जी ललक उठता है  कि उतर जाएँ पोखरों में और तोड़ लाए कुछ कमल।
यह मौसम होता है साफ नीला आसमान और ठंड के आगमन से पहले खूबसूरत मौसम का सन्धि काल।  न गरमी न ठंड....मन खिला-खिला सा लगता है...खिले फूल ...खुले आसमान की तरह। मधुमालती की लताएँ भरने लगती हैं इसी वक्त। शाम को मालती के फूलों की हल्की-हल्की मादक खुशबू मन मोहती है और चाँद अपने पूरे सौंदर्य के साथ होता है। शरद पूर्णिमा का चाँद, सोलह कलाओं से परिपूर्ण। शरद में ही कृष्ण ने गोपियों संग रासलीला रचाई थी.....
शायद इसलिए हमारे कविगण इस ऋतु के प्रशंसक हैं। निराला लिखते  हैं...झरते हैं चुंबन गगन के’  तो उधर वैदिक वांग्मय सौ शरद की बात करता है- जीवेम्शरद- शतम्अर्थात कर्म करते हुए सौ शरद जीवित रहें।
यह ऐसा मौसम है जब न हमें ताप का अहसास होता है न ही ठंड का। फसलें भी लहलहाती हैं इसलिए सबके मन में खुशी होती है। उपर से सबसे ज्यादा त्योहार शरद ऋतु में ही मनाया जाता है। पितृपक्ष  के पंद्रह दिनों के बाद दशहरा। दशहरा में चार दिनों तक इतनी गहमागहमी होती है, लोग पूजोत्सव में इस कदर रमे होते हैं कि लगता नहीं पूरे झारखंड में कोई समस्या या गरीबी है।
वैसे भी झारखंड का राजनीतिक मौसम जैसा भी रहे, यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य इतना अभिभूत करने वाला है कि बाहर के राज्यों से आए लोगों की बातें छोड़ दीजिए...... हमें खुद अहसास होता है कि हम एक ऐसी जगह निवास करते हैं जहाँ पर प्रकृति ने कूट- कूट कर सौंदर्य भरा है और यह  नैसर्गिक है।  अब तक सरकारी उपेक्षा का शिकार है....शायद इसलिए अछूता सौंदर्य आंखों में भर आता है।
तुलसीदास लिखते हैं- शरद के सुहावने मौसम में राजा, तपस्वी, व्यापारी, भिखारी सब हर्षित होकर नगर में विचरते हैं और हम जैसे कुछ प्रकृति प्रेमी शरद ऋतु का वर्ष भर इंतजार करते हैं और शहर के कोलाहल से दूर गाँवों की ओर जा निकलते हैं।
सम्पर्कः रांची, झारखंड,
Email- rashmiarashmi@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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