September 15, 2017

सामयिक

   आस्था का खौफनाक चेहरा
 - डॉ. महेश परिमल
कहा गया है कि धर्म का नशा अफीम से भी खतरनाक होता है। हमारे देश में धर्म के नाम पर बहुत कुछ ऐसा होता रहा है, जो नहीं होना चाहिए। धर्म की राजनीति क्या होती है, यह सभी जानते हैं, पर राजनीति का धर्म क्या होता है, यह कोई नहीं जानता। आज धर्म को राजनीति से ऐसे जोड़ दिया गया है कि पता ही नहीं चलता कि कब धर्म की बात हो रही है, कब राजनीति की बात हो रही है। वास्तव में हमारे देश में जितने भी आस्था के केंद्र हैं, वे सभी राजनीति के शिकार हैं। नहीं भी हैं, तो उसे बना लिया जाता है। अभी तो दो बाबा जेल में हैं, पर सभी बाबाओं पर ईमानदारी से कार्रवाई हो, तो देश के जेलें छोटी पड़ने  लगेंगी। देखा जाए, तो बाबाओं के ये डेरे वास्तव में आस्थाओं के खौफनाक चेहरे हैं। जो कभी राजनीति में चमकते हैं, तो कभी धर्म के नाम पर लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं। देश के सारे बाबाओं को राजनीति का संरक्षण मिलता ही रहता है, तभी ये इतने फलते-फूलते हैं। बिना राजनीतिक संरक्षण के ये आगे बढ़ ही नहीं सकते।
राजनीति का संरक्षण पाकर पहले तो ये कथित बाबा अपना आश्रम बनाते हैं। इसके लिए जमीन शासन की तरफ ही मुहैया की जाती है। फिर ये अपने अनुयायी बनाना शुरू करते हैं, इसके बाद वे अपनी ही समानांतर सरकार बनाने लगते हैं। अनुयायियों की संख्या के आधार पर बाबाओं का रुतबा बढ़ने लगता है। इसके बाद प्रदेश में जो भी सरकार हो, बिना इस सरकार के कुछ भी होना संभव नहीं हो पाता। प्रादेशिक स्तर पर इन बाबाओं का इतना प्रभाव होता है कि सरकार ही पलटकर रख दें। इन बाबाओं पर सीधे हाथ भी नहीं डाला जा सकता ; क्योंकि धर्म के आड़ में इनके यहाँ अस्पताल, कॉलेज, सेवाभावी संस्थाएँ चलती हैं। अनजाने में वे सरकार की सहायता ही करते रहते हैं। ऐसे में उन्हें छेड़ना सरकार को उचित नहीं लगता। वास्तव में जो काम सरकार को करना चाहिए, वह इन बाबाओं की सरकार करती है। एक आम आदमी को आखिर क्या चाहिए? तमाम सुविधाएँ। सरकारी कार्यालयों में उनके काम आसानी से हो जाएँ। ऐसा सरकार कर नहीं पातीं, क्योंकि सरकारी कर्मचारी ही कामचोर हैं। इससे इन बाबाओं के अनुयायी बन जाने पर उसे वे तमाम सुविधाएँ मिल जाती हैं, जो अब तक उनसे दूर थीं। बाबाओं के अस्पताल में इलाज, उनके स्कूल-कॉलेज में बच्चों की पढ़ाई, उसके बाद बाबा के ही कहने पर नौकरी और शादी भी हो जाती है। इससे बाबाओं के भक्तों की संख्या भी बढ़ती और उधर बाबाओं का रुतबा भी। जो सरकारी कर्मचारी आम आदमी के कामों को करने में आना-कानी करते, वही कर्मचारी इन बाबाओं के अनुयायियों का काम बिना किसी हुज्जत के करते हैं। तो ऐसे में साधारण आदमी क्यों न बने इन बाबाओं का अनुयायी।
जहाँ सरकारी तंत्र विफल होता है, वहीं से शुरू हेती है बाबाओं की सरकार। सरकारी तंत्र की विफलता का यह बाबा पूरा लाभ उठाते हैं। देश में नक्सली आतंकवाद बढऩे के पीछे भी यही कारण है। जो काम सरकार को करना चाहिए, वह नक्सली या फिर ये कथित बाबा करते हैं। ऐसे में उनकी तरफ झुकाव स्वाभाविक है। जब आम आदमी देखता है कि मंत्री, अफसर, नेता जब बाबाओं के दरवाजे पर मत्था टेकते हैं, तो फिर वे टेकें, तो बुरा क्या है? यही आम आदमी गच्चा खा जाता है। मंत्री-नेता-अफसर तो अपने स्वार्थ के कारण इन बाबाओं की शरण में जाते हैं, पर आम आदमी इनकी शरण में जाकर पहले तो खूब पाता है, बाद में काफी कुछ खो देता है। उसका पाना सभी को दिखाई देता है, पर उसका खोना किसी को भी दिखाई नहीं देता। वह कानून की सहायता लेना चाहे, तो भी नहीं ले सकता। क्योंकि बाबाओं के आदमी चारों तरफ होते हैं। बाबाओं की तरफ उठने वाली उँगली काट दी जाती है। उनकी तरफ उठने वाली आँखें निकाल दी जाती हैं। इन बाबाओं के विशाल आश्रम में श्मशान और कब्रिस्तान भी होते हैं, जहाँ कई लाशें दफना दी जाती हैं या फिर जला दी जाती हैं। इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता। आस्था के नाम पर इन आश्रमों में वह सब-कुछ होता है, जो नहीं होना चाहिए। बाहर से दिखाई कुछ और देता है, पर अंदर जो होता है वह बहुत ही वीभत्स होता है।
सरकार वोट के कारण इन बाबाओं की शरण में होती है। जिस बाबा के जितने अधिक अनुयायी, उसका उतना ही दबदबा सरकार पर होता है। बाबा के एक इशारे पर लाखों वोट नेताओं को मिल जाते हैं, तो फिर नेता क्यों न इन बाबाओं के पिछलग्गू बनें? इन कथित आश्रम से ही सरकार चलती है। कई बाबाओं को आज भी वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है। आखिर किस वजह से? हर नेता का अपना एक बाबा होता ही है और हर बाबा के कई नेता उनके चंगुल में होते हैं। इन लोगों का चोली-दामन का साथ होता है। जनता के सामने ये बाबा चमत्कार करते हैं, जनता उनकी अनुयायी हो जाती है। इसी जनता के नाम पर ये बाबा नेताओं को ब्लेकमेल करते हैं। जनता को मिलने वाली सारी सरकारी सुविधाएँ बाबाओं को मिलने लगती है। फिर बाबा अपनी सरकार बनाकर ये सुविधाएँ जनता को देते हैं। सरकार की नाकामी का नतीजा हैं बाबाओं की सरकार।
इस समय देश में बाबाओं के न जाने कितने आश्रम चल रहे हैं, आज तक किसी भी सरकार ने इन आश्रमों पर छापा नहीं डाला। न केंद्र सरकार की हिम्मत हुई और न ही राज्य सरकार ने साहस दिखाया। अधिकतर नेताओं का काला धन इन्हीं आश्रमों में ही है। सरकार, नेता, पुलिस को अच्छी तरह से मालूम होता है कि इन आश्रमों में क्या हो रहा है? पर हिम्मत नहीं होती, इन बाबाओं पर हाथ डालने की। हाथ डाला, तो सरकार जा सकती है, नेतागिरी खत्म हो सकती है और अफसरों की अफसरी खत्म हो सकती है। इसी डर के कारण ये आश्रम फल-फूल रहे हैं। देश में धर्म के नाम पर एक समानांतर सरकार चल रही होती है। इन्हें छेड़ने का साहस कोई नहीं कर पाता। हाँ, जब ये आश्रम एय्याशी का अड्डा बन जाते हैं, जब अति होने लगती है। बाबा सरकार को चुनौती देने लगते हैं, तब कानून की आड़ में सरकार उस बाबा की सल्तनत को ध्वस्त करने की कोशिश करती है। आसाराम-गुरमीत तो मोहरा मात्र हैं, इनके पीछे के कनेक्शन को जिस दिन ये आम जनता जान जाएगी, तो कई सफेदपोश खौफनाक चेहरे समाज के सामने आएँगे, जिसके बारे में किसी ने अभी तक सोचा ही नहीं था।
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