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Apr 20, 2017

शोध

  एक झूठ सौ बार बोला जाए तो...
यह काफी पुरानी कहावत है कि एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सच लगने लगता है। सोशल मीडिया के ज़माने में यह बात और भी सही साबित हो रही है। फर्जी खबरों से परेशान होकर गूगल और फेसबुक ने वादा किया है कि वे इस समस्या से निपटने के प्रयास कर रहे हैं। मगर सवाल यह है कि क्या यह वाकई एक समस्या है और क्या लोग वाकई इतने भोले-भाले होते हैं कि झूठ को बार-बार बोलने से उस पर यकीन करने लगें?
कुछ अध्ययनों से तो लगता है कि सचमुच ऐसा ही होता है। यू.एस. के एक पत्रकार क्रेग सिल्वरमैन ने कुछ ऑनलाइन झूठी खबरों का विश्लेषण करने पर पाया कि झूठी खबरों को ज़्यादा तवज्जो मिलती है , बनिस्बत उन आलेखों के जो इन खबरों का पर्दाफाश करने की कोशिश करते हैं।
शायद आपको लगे कि आप ऐसी झूठी खबरों के जाल में नहीं फँस सकते। मगर 1940 में किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष था कि - कोई अफवाह जितनी ज़्यादा बार कही जाए, वह उतनी ही संभव लगने लगती है।  इसका मतलब है कि कोई अफवाह सिर्फ प्रसार के दम पर लोगों के विचारों और अभिमतों को प्रभावित कर सकती है।
इसके बाद 1977 में एक और अध्ययन ने इसी बात को थोड़ा अलग ढंग से प्रस्तुत किया था। यूएस के कुछ शोधकर्ताओं ने कॉलेज के विद्यार्थियों से किसी वक्तव्य की प्रामाणिकता को लेकर पूछताछ की। उन्हें बताया गया था कि वह वक्तव्य सही भी हो सकता है और गलत भी। शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि उसी वक्तव्य को कुछ दिनों बाद फिर से दोहराया जाए ,तो इस बात की संभावना बढ़ती है कि विद्यार्थी उस पर यकीन करने लगेंगे।
वर्ष 2015 में वान्डरविल्ट विश्वविद्यालय (टेनेसी) की लिज़ा फेजिय़ो ने एक अध्ययन में देखा कि चाहे विद्यार्थी जानते हों कि कोई कथन गलत है, मगर यदि उसे दोहराया जाए, तो काफी संभावना बनती है कि वे उस पर विश्वास कर लेंगे। फेज़ियो का कहना है कि झूठी खबरें लोगों को तब भी प्रभावित कर सकती हैं ,जब वे जानते हैं कि वह झूठी है। वही खबर या वही सुर्खियाँ बार-बार पढऩे पर लगने लगता है कि शायद वह सच है। लोग प्राय: जाँच करने की कोशिश भी नहीं करते।
मसलन, हाल में किए गए एक अध्ययन में यूएस के हाई स्कूल छात्रों को एक तस्वीर दिखाई थी। इसमें बताया गया था कि दुर्घटना के बाद फुकुशिमा दाइची परमाणु बिजली घर के आसपास पौधों पर विकृत फूल उग रहे हैं। जब यह पूछा गया कि क्या वह तस्वीर बिजली घर के आसपास की स्थिति का प्रमाण माना जा सकता है, तो मात्र 20 प्रतिशत छात्रों ने ही इस पर शंका ज़ाहिर की जबकि 40 प्रतिशत ने तो माना कि यह स्पष्ट प्रमाण है। तस्वीर के साथ यह नहीं बताया गया था इसे प्रस्तुत किसने किया है।
कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है कि आजकल लोग सर्च इंजिन्स पर काफी भरोसा करते हैं और उसमें भी जो पहली प्रविष्टि होती है, उसे ही सच मान लेते हैं।
ऐसी स्थिति में आलोचनात्मक सोच विकसित करने का महत्त्व बहुत बढ़ जाता है ,अन्यथा हम झूठ और सच का फैसला किए बगैर अफवाहों के जंगल में हाथ-पाँव मारते रहेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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