March 15, 2016

छत्तीसगढ़ में फाग

          राधे बिन होरी न होय

                                         - संजीव तिवारी

लोक गीत किसी भी भौगोलिक क्षेत्र की संस्कृति का ऐसा अभिन्न अंग हैं जिनमें हमारी प्रकृति व परम्पराओं की स्पष्ट झलक नजर आती है।
 छत्तीसगढ़ में लोकगीतों की समृद्ध परम्परा कालांतर से लोक मानस के कंठ कठ में तरंगित है। करमा, ददरिया जैसे सदाबहार गीत एवं भोजली, गौरा, जस व फाग गीत जैसे त्यौहारों पर गाये जाने लोक गीतों का अपना अपना महत्त्व है। वाचिक परम्परा के रूप में सदियों से यहाँ के किसान- मजदूर पारम्परिक लोकगीतों को गाते आ रहे हैं जिसमें प्यार है, चुहलबाजी है, शिक्षा है और समसामयिक जीवन का प्रतिबिम्ब भी है क्योंकि लोकगीत जन के मन में उल्लास व आनंद के साथ ही अपनी परम्पराओं को भी जीवंत रखने व लोक-शिक्षण का काम करती है। लोक-जीवन की स्पष्ट झलक लोक-गीतों में ही मुखरित होती है जिससे किसी क्षेत्र विशेष की सामाजिक जीवन को परखा व समझा जा सकता है। ऐसे सभी तत्वों को समेटा हुआ, ॠतुराज बसंत के आगमन में गाए जाने वाला, हमारा लोकगीत फाग है।
भारत के कोने कोने में फागुन में फाग गीत गाये जाते हैं एवं सभी स्थानों के फाग गीतों की विषय वस्तु राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंगों ही होते हैं । छत्तीसगढ़ के भी गली- गली में नगाड़े की थाप के साथ राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंग भरे फाग गीत जन- जन के मुँह से बरबस फूटने लगते हैं। बसंत पंचमी को गाँव के बईगा द्वारा होलवार में पूजा करने के बाद शुरू फाग गीत प्रथम पूज्य गणेश के आह्वान से साथ स्फुटित होता है-
गनपति को मनाव, गनपति को मनाव / प्रथम चरण गनपति को / काखर पुत गनपति ये, काखर हनुमान / काखर पुत भैरव हैं, काखर भगवान / प्रथम चरण गनपति को / गौरी पुत गनपित है, अंजनी के हनुमान / देवी सतालिका पुत भैरव हैं, / कौसिल्या के हैं राम / प्रथम चरण गनपति को ।
पद- राग और सुर- ताल के साथ फाग का आगाज होता है-
 'सुरू से पद अउ रागन मैं गावव, मैं गांववन सिरि रे गनेस’फाग तो आरंभ हो गया किन्तु राधा- कृष्ण नहीं आये हैं, वे मित्रों के साथ कुंजन में होरी खेल रहे है, राधा के बिना होली अधूरी है, जाओ मित्र उसे बुला लाओ, क्योंकि राधा के पीछे- पीछे कान्हा दौड़ै चले आयेंगें-
दे दे बुलउवा राधे को, / सुरू से दे दे बुलउवा राधे को / राधे बिन होरी न होय, / राधे बिन होरी न होय, दे दे बुलउवा राधे को।
फाग अपने यौवन में है नगाड़ा धड़क रहा है, राधा के आते ही उत्साह चौगुना हो जाता है। राधा किसन होरी खेलने लगते हैं, गायक के साथ मस्ती में डूबे वादक दो जोड़ी, तीन जोड़ी फिर दस जोड़ी नगाड़े को थाप देता है-  बजे नगाड़ा दस जोड़ी, राधा किसन खेले होरी। कृष्ण के शरारती प्रसंगों को गीतों में पिरो कर छत्तीसगढ़ का फाग जब नगाड़े से सुर मिलाता है तो बाल- युवा- वृद्ध जोश के साथ होरी है... होरी है.... कहते हुए नाचने लगते हैं, रंगों की बरसात शुरू हो जाती है -
छोटे से श्याम कन्हैया हो, / छोटे से श्याम कन्हैया मुख मुरली बजाए, / मुख मुरली बजाए छोटे से श्याम कन्हैया ! / छोटे मोटे रूखवा कदंब के, डारा लहसे जाए डारा लहसे जाए/ ता उपर चढके कन्हैंया, मुख मुरली बजाए मुख मुरली बजाए / छोटे से श्याम कन्हैया / सांकूर खोर गोकुल के, राधा पनिया जाए राधा पनिया जाए / बीचे में मिलगे कन्हैया, गले लियो लपटाए तन लियो लपटाए, छोटे से श्याम कन्हैया।
छत्तीसगढ़ में फागुन के लगते ही किसानों के घरों में तेलई चढ़ जाता है अईरसा, देहरौरी व भजिया नित नये पकवान, बनने लगते हैं । युवा लड़के राधा किसन के फाग गीतों में अपनी नवयौवना प्रेमिका को संदेश देते हैं तो साथ में गा रहे बुजुर्ग फागुन के यौवन उर्जा से मतवारी हुई डोकरी को उढ़रिया भगा ले जाने का स्वप्न सजाते हैं-
तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया, / तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया / फागुन के रे तिहार, तोला खवाहूं गुल- गुल भजिया / कउने हा मारे नजरिया, कोने सीटी रे बजाए / कउने भगा गे उढरिया, फागुन के रे तिहार ... / टूरी हा मारे नजरिया, टूरा सीटी रे बजाए / डोकरी भगा गे उढ़रिया, फागुन के रे तिहार ....
छत्तीसगढ़ में लड़कियाँ  विवाह के बाद पहली होली अपने माता पिता के गाँव में ही मनाती है एवं होली के बाद अपने पति के गाँव में जाती है इसके कारण होली के समय गाँव में नवविवाहित युवतियों की भीड़ रहती है । इनमें से कुछ विवाह के बाद पति से अनबन के चलते अपने माता पिता के गाँव में बहुत दिनों से रह रही होती हैं । विवाहित युवा लड़की किसी अन्य लड़के से प्रेम करती है जिसके साथ रहना चाहती है पर गाँव के लड़के उसकी अल्हड़ता व चंचलता से जलते है वे उस लड़की की दादी से कहते हैं -
ये टूरी बड़ा इतरावथे रे, / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना / येसो गवन येला दे देते बूढ़ी दाई, / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना/ कहंवा हे मईके कहवां ससुरार हे / कहंवा ये जाही भगा के ओ बूढ़ी दाई / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना / रईपुर हे मईके दुरूगा ससुरार हे / भेलई ये जाही बना के ओ बूढ़ी दाई / ये टूरी बड़ा मेछरावथे ना।
फाग गीतों के प्रेम में चुहलबाजी भी है, केदार यादव के गाये ददरिया गीत को भी नगाड़े के चोट पर फाग का रूप दिया जाता है और मोहनी खाये टूरा मन नाचने लगते हैं-
का तै मोला मोहनी डार दिये गोंदा फूल / का तै मोला मोहनी डार दिये ना / रूपे के रूखवा म चढि़ गये तैं हा / मन के मोर मदरस ला झार दिये गोंदा फूल / का तै मोला मोहनी डार दिये ना।
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला अब गोरि के उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल / पवन चले अलबेला अब गोरि के
उडि़ उडि़ चलथे खंधेला रे लाल / (बसंत में गोरी के बाल कंधों से उड़- उड़ रहे हैं क्योंकि अलबेला पवन चल रहा है)
फाग में प्रेम प्रसंग के साथ प्रेमिका को पाने के लिए शौर्य प्रदर्शन के प्रतीक रूप में जन जन के आदर्श आल्हा- उदल भी उतर आते हैं। खांडा पखाडते हुए आल्हा, उदल की प्रमिका सोनवा को लाने निकलता है, मस्ती से झूमते युवक गाते हैं -
उदल बांधे हथियार, उदल बांधे तलवार / एक रानी सोनवा के कारन / काखर डेरा मधुबन में, / काखर कदली कछार / काखर डेरा मईहर में, उदल बांधे तलवार ..... / आल्हा के डेरा मधुबन में, उदल कदली कछार / सोनवा के डेरा मईहर में, उदल बाँधे तलवार .....
प्रेम रस से सराबोर इस लोकगीत में बाल- युवा- वृद्ध सब पर मादकता छा जाती है पर उन्हें अपने प्रदेश व देश पर नाज है । राष्ट्रपिता के अवदान स्वरूप प्राप्त आजादी का मतलब उन्हें मालूम है, अंग्रेजों के छक्के छुडाने वाले गाँधी बबा भी फाग में समाते हैं -
गाँधी बबा झंडा गढ़ा दिये भारत में / अगरेज ला चना रे चबाय, अंगरेज के मजा ला बताए / गाँधी बबा झंडा गढा दिये भारत में / गडवईया गडवईया, गडवईया जवाहर लाल / गाँधी बबा झंडा गढा दिये भारत में ।
वाचिक परम्परा में सर्वत्र छाये इस लोकगीत में समय काल व परिस्थिति के अनुसार तत्कालीन विचार व घटनाएँ भी समाती रही हैं । चीन के आक्रमण के समय गाँवों में गाये जाने वाले एक फाग गीत हमें पोटिया गाँव के देवजी राम साहू से सस्वर सुनने को मिला आप भी देखें -
भारत के रे जवान, भारत के रे जवान / रक्षा करव रे हमर देस के / हमर देसे ला कहिथें सोनेकर चिरिया / चीनी नियत लगाए, चीनी नियत लगाए / मुह फारे देखे पाकिस्तान ह, येला गोली ले उडाव
येला गोली ले उडाव, नई रे ठिकाना हमर देश के / भारत के रे जवान, भारत के रे जवान .....
आजादी की लड़ाई, गांधी जी के सत्याग्रह, आल्हा उदल की लड़ाई के साथ समसामयिक विषयों का भी समावेश समयानुसार फाग में होता है -
अरे खाड़ा पखाड़ो दू दल में, आल्हा खाड़ा पखाड़ो दू दल में / उदल के रचे रे बिहाव, आल्हा खाड़ा पखाड़ो दू दल में।
रेलगाड़ी मजा उड़ा ले टेसन में / तोर धुआं उडय़ रे अकास,/ रेलगाड़ी मजा उड़ा ले टेसन में ।
फाग गीतों में आनंद रस घोलने का काम आलाप एवं कबीर से होता है। बीच बीच में अरे रे रे ..... सुन ले मोर कबीर से शुरू कबीर के दोहों को उच्च स्वर में गाया जाता है एवं पद के अंतिम शव्दों को दोंहों में शामिल कर फाग अपने तीव्र उन्माद में फिर से आ जाता है । कभी कभी राधा- कृष्ण के रास प्रसंग तो कभी प्रेम छंद भी कबीर के रूप में गाए जाते हैं। आलाप फाग शुरू करने के पहले उच्च स्वर में विषय वस्तु से सम्बन्धित छोटे छंद या पदों के रूप में किसी एक व्यक्ति के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है यथा-
लाली उड़य चुनरिया गोरी, लाली लाली बाती / रंग तो मैं हर लगाहूँ रंगरेली, जाबे केती केती हो...
 प्राय:  उसी के द्वारा उस गीत को उठाया, अर्थात शुरू किया जाता है । सरररा.... रे भाई सुनले मोर कबीर... के साथ चढ़ाव में बजते मादर में कुछ पलो के लिए खामोशी छा जाती है गायक- वादक के साथ ही श्रोताओं का ध्यान कबीर पढऩे वाले पर केन्द्रित हो जाती है। वह एक दो लाईन का पद सुरीले व तीव्र स्वर में गाता है। यह कबीर या साखी फाग के बीच में फाग के उत्साह को बढ़ाने के लिए किसी एक व्यक्ति के द्वारा गाया जाता है एवं बाकी लोग पद के अंतिम शब्दों को दुहराते हुए साथ देते हैं। इसके साथ ही कबीर के दोहे या अन्य प्रचलित दोहे, छंद की समाप्ति के बाद पढ़े जाते है पुन-  वही फाग अपने पूरे उर्जा के साथ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुच जाता है। उतार चढ़ाव के बीच प्रचलित कबीर कुछ ऐसे प्रस्तुत होते हैं -
बिन आदर के पाहुना, बिन आदर घर जाए कि यारों बिन आदर घर जाए ।
मुँहु मुरेर के पानी देवय, अउ कुकुर बरोबर खाय कि यारों कुकुर बरोबर खाय।।
आधा रोटी डेढ़ बरी, सब संतन मिल खाय, कि यारों सब संतन मिल खाय।
आधा रात को पेट पिरावय, त कोलकी डहर जाए कि यारों कोलकी डहर जाए ।।
ललमुही टूरी बजार में बईठे, हरियर फीता गुथाय कि यारों हरियर फीता गुथाय।
वो ललमुही टूरी ला देख के, भइया सबके मुह पंछाय कि यारों सबके मुह पंछाय।।
पातर पान बम्भूर के, केरा पान दलगीर कि यारों केरा पान दलगीर।
पातर मुँह के छोकरी, बात करे गंभीर कि यारों बात करे गंभीर।।
होली की रात, होली जलने पर गाँव के होलवार में होले डांड तक यानी होलिका की सीमा तक, अश्लील फाग भी गाया जाता है ।यह अश्लील गीत होलिका के प्रति विरोध का प्रतीक है, होलिका को गाली देने के लिए सामूहिक स्वर में नारे लगाए जाते हैं , इसीलिए यहां किसी को गंदी गंदी गाली देने पर 'होले पढ़त हसकहा जाता है। होलिका के जलने से लेकर सुबह तक ये गीत चलते हैं फिर होलिका के राख को एक दूसरे पर उड़ाते हुए फाग गाते हुए गाँव तक आते हैं गाँव में आते ही इसकी अश्लीलता समाप्त हो जाती है । गोरी ओ तोर बिछौना पैरा के”साथ कुछ चुहलपन साथ रहती है -
मेछा वाले रे जवान, पागा वाला रे जवान / मारत हे अंखियाँ कच ले बान / कहंवा ले लानबोन लुगरा पोलका, / कहंवा ले लाबो पान / रईपुर ले लानबोन लुगरा पोलका, / दुरुग ले पान/ कहंवा ले लानबोन किसबिन, / कहंवा के रे जवान कहंवा के जवान / मारत हे अंखियां कच ले बान ।
छत्तीसगढ़ में फाग के लिए किसबिन यानी नर्तकी को बुलाया जाता था पूर्व में फागुन में नाच गान करने वाली किसबिनो का पूरा का पूरा मुहगा किसी किसी गांव में होता था जहां से किसबिन को निश्चित पारिश्रमिक पर लगा कर फाग वाले दिनो के लिए लाया जाता था । किसबिने मांदर की थाप पर नृत्य पेश करती थी -आमा के डारा लहस गे रे.... और जवान उस पर रंग गुलाल उडाते थे। कालांतर में यह प्रथा कुछ कुत्सित रूप में सामने आने लगी थी , अत: अब किसबिन नचाने की प्रथा लगभग समाप्त हो गई है । आधुनिक प्रयोगों में पुरुषों के साथ ही महिलाओं के द्वारा भी फाग गाया जा रहा है । सीडी- कैसेटों के इस दौर में फाग के ढेरों गीत बसंत पंचमी के साथ ही छत्तीसगढ़ में गूंजने लगा है मेरा मन भौंरा भी रुनझुन नाचता गाता हुआ फाग में मदमस्त है।
बसंत पंचमी से धड़के नगाड़े और उड़ते गुलालों की रम्य छटा होली के दिन अपने पूरे उन्माद में होता है। गाँव के चौक- चौपाल में गुंजित फाग होली के दिन सुबह से देर शाम तक अनवरत चलता है।  रंग भरी पिचकारियों से बरसते रंगों एवं उड़ते गुलाल में मदमस्त छत्तीसगढ़ अपने फागुन महराज को अगले वर्ष फिर से आने की न्यौता देता है-
अब के गये ले कब अईहव हो, अब के गये ले कब अईहव हो / फागुन महराज, फागुन महराज, / अब के गए ले कब अईहव / कामे मनाबो हरेली, कामे तीजा रे तिहार / कामे मनाबो दसेला, कब उडे रे गुलाल। अब के गये ले कब अईहव हो.../ सावन मनाबो हरेली, भदो तीजा रे तिहार/ क्वांर मनाबो दसेला, फागुन उड़े रे गुलाल। अब के गये ले कब अईहव हो.....
छत्तीसगढ़ का फाग इतना कर्णप्रिय है कि इसे बार बार सुनने को मन करता है । आजकल पारम्ंपरिक फाग गीतों सहित नये प्रयोगों के गीतों के ढेरों कैसेट- सीडी बाजार में उपलब्ध हैं जिससे हमारा यह लोकगीत समृद्ध हुआ है । पूर्व प्रकाशनों में फील्ड सांग्स आफ छत्तीसगढ़ व इसका हिन्दी अनुवाद छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का अध्ययन-  श्यामा प्रसाद दुबे, लोक गाथा-  सीताराम नायक, छत्तीसगढ़ के लोकगीत-  दानेश्वर शर्मा व फोक सांग्स आफ छत्तीसगढ़-  वेरियर एल्विन सहित छत्तीसगढ़ी लघु पत्रिकाओं में झांपी-  जमुना प्रसाद कसार, लोकाक्षर-  नंदकुमार तिवारी, छत्तीसगढ़ी -  मुक्तिदूत आदि एवं छत्तीसगढ़ के समाचार पत्रों के फीचर पृष्ठों में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी फाग संगृहीत हैं ;किन्तु जिस तरह से ददरिया व जस गीतों पर कार्य हुआ है वैसा कार्य फाग पर अभी भी नहीं हो पाया है इसके संकलन व संर्वधन एवं संरक्षण की आवश्यकता है।

सम्पर्क:  Email- tiwari.sanjeeva@gmail.com, aarambha.blogspot.com, gurturgoth.com, मो. 9926615707

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