October 22, 2013

अनकही

आस्था का उजाला
 - रत्ना वर्मा
पर्व-त्योहार हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं जैसे दीपावली, दशहरा, गणेश चतुर्थी, नवरात्र आदि। जिसमें हमारी धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है।  देवी- देवताओं वाले देश में उनके प्रति विश्वास ने गहरे तक हमारे दिलों में जड़ें जमा ली हैं, जिसके चलते भक्तजन अपने दुख -दर्द का निवारण करने और जीवन में सुख शांति की आशा लिये सिद्ध स्थलों के द्वार तक बड़ी संख्या में मत्था टेकने पहुँचते हैं। एक वह भी समय था ,जब हमारे देश में इसी आस्था के सहारे बड़ी -बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी गईं और जो भारत को गुलाम बनाने वालों के विरुद्ध जनता को एकजुट करने और जनजागृति फैलाने का बहुत बड़ा माध्यम बना। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को ऐसा स्वरूप दिया जिससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गए। उन्होंने पूजा को केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का जरिया बनाया और एक  जन-आंदोलन का स्वरूप दिया। यही नहीं ,इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन आज इन धार्मिक आस्था वाले पर्वों ने व्यापार का रूप अख़्तियार कर लिया है, आस्था का पूर्णरूपेण बाजारीकरण हो गया है, जिसकी दुःखद परिणति मध्यप्रदेश दतिया के रतनगढ़ में हुए भयानक हादसे जैसी दुर्घटनाएँ हैं। पिछले दिनों नवरात्र के दिन यहाँ मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं के बीच फैली अफवाह के बाद मची भगदड़ में लगभग 115 लोगों की मौत हो गई। नवरात्र या इसी तरह के अन्य धार्मिक अवसरों पर देश भर में हजारों, लाखों की भीड़ हर साल एक जगह इकट्ठा होती है।  यह कोई पहला हादसा नहीं है, इस तरह की घटनाएँ अब आम हो चुकी हैं, लेकिन उसके बाद भी इन हादसों से बचने के लिए कोई पुख़्ता इंतज़ाम नहीं किया जाना पूरी तरह से प्रशासकीय खामी को उजागर करता है। हर बार की तरह सरकार ने मुआवज़े की रकम की घोषणा करके और दुर्घटना के कारणों की जाँच का आदेश देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है।
अब जरा दशहरे के एक दिन पहले उड़ीसा व आंध्रप्रदेश में आए चक्रवाती तूफान फेलिन की ओर  देखते हैं। फेलिन प्रकृति जनित आपदा थी, लेकिन मौसम विज्ञान की आधुनिक तकनीक के जरिए उसके आने का पूर्वानुमान होने से प्रशासन पूरी तरह से तैयार था ; जिसके कारण उतनी उतनी भारी तबाही का सामना नहीं पड़ा और सैकड़ों लोगों की जान बचाई जा सकी।
 रतनगढ़ का हादसा और चक्रवाती तूफान दोनों हादसों की प्रकृति भिन्न- भिन्न थी ;पर रतनगढ़ हादसे से भी बचा जा सकता था ; यदि प्रशासन अपनी ओर से चाक- चौबंद रहता। रतनगढ़ में इकट्ठा हुई भीड़ अचानक आई भीड़ नहीं थी। शासन प्रशासन दोनों को यह पहले से मालूम है कि हर साल नवरात्र में यहाँ लाखों श्रद्धालु देवी के दर्शन करने आते हैं।
 हमारी भारतीय आस्था का इससे बड़ सबूत और क्या हो सकता है कि पहले दिन रतनगढ़ के जिस मंदिर में यह भयंकर हादसा हुआ था, उसके निशान अभी मिटे भी न थे कि आस्था का सैलाब दूसरे दिन भी उतनी ही तेजी से फिर उमड़ पड़ा। भक्त यह कहते हुए पाए गए कि जो हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है ,पर हमें तो देवी के दर्शन हर हाल में करना ही है। तो ऐसी आस्था वाले देश के सभी धार्मिक स्थलों में विशेष अवसरों पर पहले से कोई व्यवस्था नहीं की जाती ,यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है।
फेलिन तूफान के कहर को बेअसर करने में मिली सफलता और रतनगढ़ के हादसे में सौ से अधिक मौतों ने राज्यों में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अहमियत साबित कर दी है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के अधिकारी फेलिन से निपटने का बड़ा श्रेय ओडिशा और आंध्र प्रदेश के राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) को देते हैं , जबकि मध्य प्रदेश सरकार ने एसडीएमए बनाने की जरूरत ही नहीं समझी। इस संदर्भ में अन्य राज्यों को यह जान लेना होगा कि ओडिशा और आंध्र प्रदेश में मौजूद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अपने राज्यों के अधिकारियों को मौसम विभाग की चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए आपदा से निपटने की पूरी तैयारी कर ली थी। परिणाम सामने है कि 14 साल पहले जहाँ ओडिशा में तूफान से 10 हजार लोगों की मौत हुई थी, इस बार केवल दो दर्जन लोग ही इसके शिकार हुए।
 जाहिर है कि जो राज्य राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठित नहीं कर पाए हैं वे ऐसे हादसों की परवाह नहीं करते। इसका एक ताजा उदाहरण सामने है- इसी साल मई में मौसम विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की पूर्व चेतावनी के बावजूद उत्तराखंड सरकार आने वाली आपदा को समझ नहीं पाई। यही नहीं इतना बड़ा हादसा झेलने के चार महीने बाद भी उत्तराखंड में एसडीएमए का गठन नहीं हो पाया है। यह बात सिर्फ उत्तराखंड और मध्य प्रदेश पर लागू नहीं होती -हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, हरियाणा, केरल और तमिलनाडु जैसे एक दर्जन से ज्यादा राज्यों ने एसडीएमए का गठन नहीं किया है। वहीं, बिहार, ओडिशा, असम और गुजरात में न सिर्फ एसडीएमए बन चुका है, बल्कि बेहतर तरीके से काम भी कर रहा है।
जाहिर है खामियाँ हमारे स्वयं के भीतर है। जरूरत अँधकार की इस काली छाया से निकल कर उजाला फैलाने की है। प्रत्येक राज्य में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठित करने के साथ- साथ अब यह भी जरूरी हो गया है कि इस तरह के धार्मिक आस्था वाले स्थानों को संचालित करने वाले न्यास, संगठन या ट्रस्ट जो भी हो की भी उतनी ही जिम्मेदारी बनती है ; जितनी शासन प्रशासन की। उनके भक्त इतना चढ़ावा चढ़ाते हैं, उन पर सोने- चाँदी की बरसात होती है,क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपने भक्तों की सुरक्षा के प्रति गंभीर बनें। यह शासन की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे मंदिर, मस्जिद, मठों के प्रबंधकों के साथ मिलकर इस समस्या का निराकरण करें।
इन दिनों भारत में मानों अंध आस्था की आँधी- सी चल पड़ी है लोग ढोंगी बाबाओं के पीछे ऐसे भागते हैं ,मानों वही इनके दु:खहर्ता हैं, जबकि उनके काले धंधे एक के बाद एक उजागर होते चले जा रहे हैं और वे जेल की चक्की पीस रहे हैं। हमारे देश के हजारों लाखों धार्मिक संगठन जो बड़े बड़े मंदिर- मठो का संचालन करते हैं, जिनपर आम जनता आँख मूँदकर विश्वास करती है, अगर वे चाहें तो क्या नहीं कर सकते। जनता की जैसी भीड़ इन हादसे वाली जगहों पर जाती है ,वे ज्यादातर गरीब तबके की होती है, रोजी -रोटी जिनकी दिनचर्या होती है और भगवान से अपने उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करने वह ऐसे स्थानों पर श्रद्धा के साथ पहुँचती है। जिस तरह लोकमान्य तिलक ने समाज में फैले छूआछूत को दूर करने और आजादी के लिए एकजुट करने में जनता की इस भीड़ को संगठित किया था, उन्हें आज भी समाज की बुराइयों के खिलाफ जागृत किया जा सकता है। आस्था और उत्सव के इन स्थानों को यदि हम बाजारवाद बनाते चले जाएँगे तो अंध श्रद्धा का सैलाब ही बहेगा।
... तो आइये इस दीपावली पर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गणेश जी और समृद्धि की ज्योति जलाने वाली लक्ष्मी जी की आराधना करते हुए यह संकल्प लें कि वे हमारे दिलों से अंधविश्वास के अंधकार को मिटाने में हमारी सहायता करेंगे और हमें उजाले की ओर ले जाएंगे।

आप सबको दीपावली की शुभकामनाएँ।

                                                                       

2 Comments:

D.P. Mishra said...

bahut sundar samayik aalekh
diwali ki aapko bhi shubhakamanayen

pardeepsharma said...

andhvishwaass ke andhkaar ko ujale me lane ke liye ratna ji ko dhero badhai .....

jyotsna pradeep

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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