उदंती.com को आपका सहयोग निरंतर मिल रहा है। कृपया उदंती की रचनाओँ पर अपनी टिप्पणी पोस्ट करके हमें प्रोत्साहित करें। आपकी मौलिक रचनाओं का स्वागत है। धन्यवाद।

Dec 18, 2012

परिवार

अकेले बच्चे
- डॉ. मोनिका शर्मा

घटना 1
नौ महीने की रिया उन मासूम बच्चों में से एक है जिसे नौकरानी के भरोसे छोड़ माता-पिता दोनों काम पर चले जाते थे। कुछ ही समय में रिया के माता-पिता को यह महसूस हुआ कि उनकी बच्ची नौकरानी के पास जाने से न केवल कतराने लगी बल्कि उसे देखकर ही उसके चेहरे पर डर के भाव भी आने लगे। दिन भर घर से बाहर रहने वाले माता-पिता को शक हुआ और उन्होंने घर पर कैमरा लगाकर नौकरानी पर स्टिंग ऑपरेशन किया। उसके बाद जो कुछ सामने आया उसे देखकर वे हैरान रह गये। 45 मिनट के इस वीडियो में उन्होंने देखा कि उनकी गैर मौजूदगी में नौकरानी रिया के साथ किस तरह की बदसलूकी करती थी। इस मासूम की किस तरह पिटाई करते हुए डॉट डपटकर उसे जबरदस्ती सुलाने की कोशिश कर रही थी। किसी भी अभिभावक का दिल दहला देने वाली यह यह घटना दिल्ली के नानकपुरा इलाके में हुई थी ।
घटना 2
देश के एक और महानगर में हुई ऐसी ही एक और घटना के मुताबिक बच्ची की सार -सँभाल के लिए रखी गयी नौकरानी ने मासूम पर ऐसा कहर ढाया कि उसने अपनी सुनने की ताकत भी खो दी। दरअसल नौकरानी को इस बात की चिंता सताती थी कि डाँट फटकार और बच्ची के रोने की आवाज आस-पड़ोस के लोग न सुन पायें इसी के चलते वह तेज आवाज में टीवी चलाकर बच्ची को कमरे में बंद कर देती थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि वह चार महीने की बच्ची हमेशा के लिए बहरी हो गई।
घटना 3
इसी तरह की एक और घटना के मुताबिक माता-पिता की गैर मौजूदगी में बच्चे की देखभाल के लिए रखे गए नौकर ने अपने आराम के लिए बच्चे को नशीला पदार्थ खिलाना शुरु कर दिया ताकि वह ज्यादातर समय सोता ही रहे और उसे परेशानी न उठानी पड़े। समय रहते माता-पिता चेत नहीं जाते तो यह दुधमुँहा बच्चा मानसिक विकृति का शिकार भी हो सकता था।
पारिवारिक विघटन का परिणाम-
आमतौर पर नौकरों के भरोसे घर पर बिल्कुल अकेले रहने वाले बच्चे वे होते हैं जिनके माता-पिता दोनों नौकरी पेशा होते हैं। किसी जमाने में कामकाजी माओं के बच्चों की जिम्मेदारी घर के बड़ों की हुआ करती थी। पर संयुक्त परिवारों में आए बिखराव ने इन मासूम बच्चों को नौकरो के भरोसे पलने के हालात पैदा कर दिए हैं। गौरतलब है कि बीते दो दशकों में ऐसी कामकाजी माँओं की संख्या में तेजी से बढ़ौतरी हुई है। जिनके बच्चे तीन साल से कम उम्र के है। एक और जहाँ कामकाजी महिलाओं की संख्या में इजाफा हुआ है वहीं दूसरी ओर बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाने वाले परिवारों की संख्या में काफी कमी आई है। यानि संयुक्त परिवारों का वह ताना-बाना टूट गया है जिसमें बच्चों का पालन पोषण घर के बड़ों बुजुर्गों की देखरेख में बड़ी आसानी हो जाता था। यही कारण है कि आजकल हमारी भावी पीढ़ी नौकरों के भरोसे पल रही है। जाहिर है कि उनके जीवन में संस्कार एवं प्यार की कमी तो है ही असुरक्षा एवं मानसिक प्रताडऩा भी कुछ कम नहीं है।
भावी जीवन पर नकारात्मक प्रभाव-
ऐसी महिलाओं की संख्या महज आठ प्रतिशत है जिन्होंने बच्चे को जन्म देने के बाद उसकी देखभाल के लिए सालभर तक अपने काम से छुट्टी ली हो। यह बात अमेरिका में हुए एक रिसर्च में सामने आई है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में हमारे देश में भी कॉरपोरेट वर्ल्ड में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। और हालात कुछ ऐसे ही बन गए हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बच्चों की परवरिश पर कमाई की सोच भारी पड़ रही है। ऐसे में सोचने की बात ये भी है कि अपने बच्चों के लिए पैसों से हर खुशी खरीदने की चाह में भागदौड़ करने वाले अभिभावक यह भूल जाते हैं कि उनकी पीठ पीछे बच्चों के साथ होने वाला यह व्यवहार इन मासूमों के भावी जीवन पर गहरा असर डाल सकता है। एसोचैम के सामाजिक विकास न्यास द्वारा किए गए नवीनतम अध्ययन में जो निष्कर्ष सामने आए हैं उसके मुताबिक कामकाजी माता-पिता मात्र आधा घंटा ही अपने बच्चों के साथ बिता पाते हैं। सर्वे में कामकाजी माँओं ने पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकार किया, कि वे बच्चों को बहुत कम समय दे पाती हैं । और उन्होंने अपने आप को बच्चों की देखभाल के मामले में दस में से दो नंबर दिये। इस सर्वे में शहरों के 3000 कामकाजी अभिभावकों से बात की गई। मनोचिकित्सकों का मानना है कि नौकरों के साथ बच्चे शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से सुरक्षित महसूस नहीं करते ऐसे में बच्चा बड़ा होकर जिद्दी, चिड़चिड़ा, मितभाषी या अकेलेपन का शिकार बन सकता है। मनोचिकित्सकों का मनना यह भी है कि छोटा सा बच्चा भी अपने साथ होने वाले व्यवहार को अच्छी तरह समझता है। और आगे चलकर इसका असर उसके पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है।
स्वास्थ्य समस्याएँ भी कम नहीं-
नौकरों के भरोसे पलने वाले नौनिहालों में स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ भी काफी होती हैं। ब्रेस्ट फीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया से जुड़ी राधा भुगरा के मुताबिक 'एक माँ को छह महीने तक के बच्चे को केवल अपना दूध ही पिलाना चाहिए और यह तभी हो सकता है जब माँ खुद घर पर बच्चे के साथ रह कर उसकी देखभाल करे।' चिकित्सकों का भी मानना है कि स्तनपान से न केवल बच्चा स्वस्थ रहता है, वह स्वयं को सुरक्षित भी महसूस करता है जिसके चलते माँ और बच्चे में भावनात्मक लगाव बढ़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी अनुमान है कि हर पांच में से दो बच्चों का विकास माँ का दूध नहीं मिल पाने के कारण ठीक से नहीं हो पाता। ऐसे में बच्चे की सेहत के लिए यह जरुरी है कि माँ कि गैरमौजूदगी में उसके खाने पीने का ठीक से ख़याल रखा जाए। इसमें कोई शक नहीं है कि यह काम घर परिवार के करीबी सदस्य या माँ से बेहतर और कोई नहीं कर सकता। नतीजतन नौकरों के सहारे पलने वाले बच्चों में शारीरिक विकास से जुड़ी समस्याएँ भी काफी देखने में आती हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि आज के शहरी जीवन में व्यस्तता के चलते बच्चों को नौकर के सहारे छोड़ा जाता है या उन्हें क्रेच में डाल दिया जाता है। जिसके चलते वे घर जैसे माहौल में बड़े नहीं होते। जिसका परिणाम यह होता है कि माता- पिता की अनुपस्थिति में उनके साथ होने वाली उपेक्षा, बदसलूकी और शारीरिक प्रताडऩा का व्यवहार उनमें कुंठा पैदा करने लगता है।
 संपर्क: 75/56  शिप्रा पथ, मानसरोवर, जयपुर (राजस्थान) 302020, 

No comments: