October 27, 2012

आपके पत्र



संस्कृत के प्रति गहरी आस्था
अगस्त अंक में संस्कृत भाषा के महत्व को दर्शाता आलेख, भाई लोकेन्द्र के गहन अध्ययन व संस्कृत के प्रति गहरी आस्था का परिचायक है। सच है संस्कृत से ही अधिकांश भारतीय ही नहीं कई विदेशी भाषाएं भी विकसित हुई हैं। आज संस्कृत को पीछे करने में अंग्रेजियत भरी राजनीति काम कर रही है।
अनामिका की रचना बेटी होना कभी न खलता.. सुन्दर कविता है जिसमें उम्मीदों भरी संभावनाएं हैं परंतु काश ऐसा कभी हो। वहीं वीरांगना के नाम को सार्थक करने वाली कैप्टन सहगल के विषय में इतनी उपयोगी जानकारी देने के लिये श्री यादव का हार्दिक अभिनन्दन।
                      -गिरिजा कुलश्रेष्ठ, girija.kulshreshth@gmail.com
कुशलता से किया गया सामग्री चयन
उदंती अगस्त 2012 का अंक पढ़ा। सामग्री का चयन बहुत कुशलता से किया गया है। साहित्य की लगभग सभी विधाएं इसमें हैं और वह भी समसामयिक विषयों पर। फ्रेडशिप डे की पुरजोर वकालत सभी तार्किकता के साथ प्रस्तुत की गई है। बेहतर होता कि नए-नए आयातित समस्त 'डेकी एक सूची भी दी जाती तो स्वत: यह स्पष्ट हो जाता कि बाजारवाद और दिखावटीपन का अनुपात इन सब में कितना अधिक है। अफसोस तो इस बात का है कि ऐसे डे को हम भारतीय पृष्ठ भूमि से नहीं जोड़ सकते। यदि हम कृष्ण-सुदामा की दोस्ती की मिसाल देते हैं तो सेक्यूलर वादिता को क्लेश होता है।
फिल्मों में और चुटकुलों में राखी बांधने की अवधारणा का मजाक उड़ाया जाता है। लड़के लड़की फ्रेडशिप डे तो मनाएँगे पर क्या इसे राखी डे का रूप भी दे सकते हैं?
                   -ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव, brijshrivastava@rediffmail.com 
 
बेटी होना कभी न खलता...
अगस्त अंक में यदि बागडोर होती शासन की मेरे हाथों में के अंतर्गत प्रकाशित रचना बेटी होना कभी न खलता... पढ़कर यही कहना चाहूँगी कि- यही तो मुश्किल है, अपने शासन से आप खल-जनों को कैसे दूर रखेंगी। वे तो बिना काज दाहिने-बायें आ खड़े होंगे? सबसे पहले तो उनसे निबटना है।
                      -प्रतिभा सक्सेना,  Pratibha.Saksena@gmail.com
अनामिका जी की उपरोक्त रचना पर इमरान अंसारी ने उन्हें बहुत सारी शुभकामनाएं दी हैं, तो कैलाश शर्मा ने काश ऐसा होता करते हुए   इसे एक सुंदर रचना कहा है, वहीं संजय भास्कर ने अति सुंदर कहते हुए प्रशन्सा की है।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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