October 27, 2012

1 अक्टूबर: अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस



                      बुढ़ापा 
- डॉ. प्रीत अरोड़ा
मानवता की असली पहचान उसका दूसरों के साथ प्रेम, सद्भावना व आत्मीयता से व्यवहार करना है, परन्तु जब बात बुजुर्गों की होती है तो हम अपने इस व्यवहार को क्यों भूल जाते हैं ? जो माता-पिता अपना पूरा जीवन हमें सफल बनाने और लालन-पालन करने में समर्पित करते हैं और जब दायित्व निभाने का हमारा समय आता है तो हम अपने दायित्व से मुँह क्यों मोड़ लेते हैं? हम क्यों यह भूल जाते हैं कि अगर आज हम अपने बुजुर्गों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं तो हमारी भावी पीढ़ी हमारे साथ न जाने कैसा व्यवहार करेगी?
आज आपको अपने जीवन का आँखों देखा सच बता रही हूँ, हमारे साथ ही पड़ोस में वर्मा जी का परिवार रहता था। वर्मा जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु, दो बेटे-बहुएँ ,पोते- पोतियों  व दादी रहती थी। वर्मा जी स्वयं रेलवे में उच्च पद पर आसीन थे और उनके बेटे भी सरकारी कर्मचारी थे। आर्थिक रूप से सुसम्पन्न इस परिवार में किसी चीज की कमी न थी। अगर कमी थी तो शायद सिर्फ अच्छी सोच व संस्कारों की। परिवार में जहाँ प्रत्येक सदस्य एशो-आराम की जिन्दगी व्यतीत कर रहा था वहाँ दादी की किस्मत में घर के पिछले बरामदे में बना कच्चा- पक्का कमरा ही था। जिसमें दीवारों पर सीलन, बदबू व गंदगी से दम घुटता था। दादी के पति रमेश जी की मृत्यु के बाद उनकी पेंशन से ही दादी अपना गुजर करती थी परन्तु दादी के नाम जमीन-जायदाद काफी थी। दादी ने मुझे बताया था कि उन्हें इस कोठरी में भी सिर्फ इसलिए रखा गया है क्योंकि सभी की नजर उनकी जायदाद पर है और अगर उनके पास अच्छी खासी जायदाद न होती तो आज वे सड़कों पर या किसी ओल्ड ऐज होम में अपना जीवन बिता रही होतीं।
दादी सारा दिन चारपाई पर बैठी अपनी अंतिम सांसों के लिए भगवान से दुहाई मांगती रहती थी। चूंकि यह जिंदगी भी किसी नरक भोगने से कम न थी। अक्सर वर्मा जी की घर से दादी के रोने की आवाजें आया करती थी क्योंकि बात- बात पर दादी से मारपीट करना उनके लिए आम बात थी। यहाँ तक कि दादी को खाने के नाम पर सूखी व मोटी रोटी और पानी जैसी दाल ही नसीब होती थी। परन्तु ममता की प्रतिमूर्ति दादी उसे भी राजभोग समझकर खाती थी। हद तो तब हो गयी जब पैसों के पीछे अंधे हुए वर्मा जी ने दादी को खाने में जहर मिलाकर खिला दिया और जब वर्मा जी के परिवार को सजा मिलने की बारी आई तो उन्होंने पैसों और रुतबे के बलबूते पर अपने इस घिनौने अपराध को भी छुपा लिया
यह कड़वा सच हमारे समाज के अनगिनत घरों की कहानी बनता जा रहा है। आखिरकार पैसा ही अंधकार बनकर रिश्तों की गरिमा को ग्रहण लगा रहा है। दादी के जीवन की यह कड़वी घटना आज भी मेरे दिल को दहला देती है।
हमारे सामाज में ओल्ड ऐज होम की गिनती भी लगातार बढ़ती जा रही है और सच मानिए कभी आप ओल्ड ऐज होम के दरवाजे पर जाकर खड़े होंगे तो देखेंगे की वहाँ बूढ़ें माता- पिता की सुनी आँखों  से उभरते हजारों सवाल आपको दिखाई देंगे जिनका जवाब हमारे पास न होगा कि आखिर किस अपराध की सजा उन्हें दी जा रही है? क्या उनका अपराध यह था कि उन्होंने माँ-बाप बनकर आपना दायित्व निभाया? परन्तु दु:ख इस बात का है कि बच्चे अपने माता- पिता को ओल्ड ऐज होम का दरवाजा दिखाकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। हम भारतीय समाज में रहते हुए अक्सर सँस्कारों की बात करते हैं और भगवान की पूजा करके अपनी आस्था प्रकट करने की आदर्शवादी बातें सीखते-सिखाते हैं। मैं तो यह कहूँगी कि अगर आप अपने माता-पिता को मौत के घाट धकेलकर भगवान की पूजा करके या संस्कारों की बड़ी- बड़ी बातें करके स्वयं को इंसान मानते हैं तो यह इन्सानियत के नाम पर कलंक हैं क्योंकि हमारे माता-पिता में ही साक्षात् भगवान का रूप निवास करता है। तो हमारा पहला कत्र्तव्य बनता है कि हम अपने माता-पिता का सत्कार करें। हमारे माता-पिता के अधिकार अगर हम उन्हें नहीं देंगे तो कौन देगा? इसलिए हमारा, हमारे कानून व हमारे समाज का यह दायित्व है कि वे बजुर्गों के साथ हो रहे इसे अमानवीय व अभ्रद्र व्यवहार को रोकें। हम अपने बुजुर्गों का आदर- सम्मान करते हुए उन्हें परिवार व समाज में वह स्थान दें जिसके हकदार वे हैं। अगर बुजुर्गों के साथ हो रहे ऐसे दुव्र्यवहार का सिलसिला नहीं रुका तो वह दिन दूर नहीं जब इस चक्रव्यूह में फँसने की अगली गिनती हमारी होगी तो आइए प्रण लें...
'बुजुर्गों से करें प्यार यही है
समृद्ध सुखी जीवन का आधार।
    संपर्क: मकान नम्बर- 405, गुरूद्वारे के पीछे दशमेश नगर,  खरड़ ,जिला- मोहाली, पँजाब-140301, फोन-08054617915, Email- arorapreet366@gmail.com

1 Comment:

dilbag virk said...

विचारणीय आलेख

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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