September 27, 2012

'सॉरी'हिन्दी दिवस पर अंग्रेजी बोली

- अविनाश वाचस्पति

प्रकाशक और अखबार छापने वाले हिन्दी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्य पर भेंट देते हैं। 

हिन्दी दिवस है हिन्दी का जन्मदिन। जिसे मनाने के लिए हम ग्यारह महीने पहले से इंतजार करते है और फिर 15 दिन पहले से ही नोटों की बिंदिया गिनने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। अध्यक्ष और जूरी मेम्बर बनकर नोट बटोरते हैं और उस समय अंग्रेजी बोल-बोल कर सब हिन्दी को चिढ़ाते हैं। हिन्दी की कामयाबी के गीत अंग्रेजी में गाते हैं। कोई टोकता है तो 'सॉरी' कहकर खेद जताते हैं। सरकारी कार्यालयों में हिंदी के लिए सितम्बर माह में काम करने पर पुरस्कारों का अंबार लग जाता है। जिसे अनुपयोगी टिप्पणियां, शब्दों के अर्थ-अनर्थ लिखकर, निबंध, कविताएं लिख-सुना कर लूटा जाता है। लूट में हिस्सा हड़पने के लिए सब आपस में घुलमिल जाते हैं। हिन्दी को कूटने-पीटने और चिढ़ाने का यह सिलसिला जितना तेज होगा, उतना हिन्दी की चर्चा और विकास होगा।
हिन्दी के नाम पर सरकारी नौकरी में चांदी ही नहीं, विदेश यात्राओं का सोना भी बहुतायत में है किंतु सिर्फ हिन्दी में लेखन से रोजी-रोटी कमाने वालों का एक जून की रोटी का जुगाड़ भी नहीं होता है, खीर खाना तो टेढ़ी खीर है। प्रकाशक और अखबार छापने वाले हिन्दी लेखकों को जी भर कर लूटे जा रहे हैं। प्रकाशक लेखक से ही सहयोग के नाम पर दाम वसूलकर पुस्तकें छाप कर बेचते हैं, जिसके बदले में छपी हुई किताबें एमआरपी मूल्य पर भेंट देते हैं। गजब का सम्मोहन है कि लेखक इसमें मेहनत की कमाई का निवेश कर गर्वित होता है। किताबें अपने मित्र-लेखकों, नाते-रिश्तेदारों को फ्री में बांट-बांट कर खुश होता है कि अब उसका नाम बेस्ट लेखकों में गिन लिया जाएगा।
छपास रोग इतना विकट होता है कि लेखक मुगालते में जीता है, कि जैसा उसने लिखा है, वैसा कोई सोच भी नहीं सकता, लिखना तो दूर की बात है। बहुत सारे अखबार, पत्रिकाएं, लेखक को क्या मालूम चलेगा, की तर्ज पर ब्लॉगों और अखबारों में से उनकी छपी हुई रचनाएं फिर से छाप लेते हैं। इसका लेखक को मालूम चल भी जाता है किंतु वह असहाय सा न तो अखबार, मैगजीन वाले से लड़ पाता है और न ही अपनी बात पर अड़ पाता है। लेखक कुछ कहेगा तो संपादक पान की लाल पीक से रंगे हुए दांत निपोर कर कहेगा कि 'आपका नाम तो छाप दिया है रचना के साथ, अब क्या आपका नाम करेंसी नोटों पर भी छापूं।' उस पर लेखक यह कहकर कि 'मेरा आशय यह नहीं है, मैं पैसे के लिए नहीं लिखता हूं।' 'जब नाम के लिए लिखते हैं तब आपका नाम छाप तो दिया है, रचना के साथ।' फिर क्यों आपे से बाहर हुए जा रहे हैं और सचमुच संपादक की बात सुनकर लेखक फिर आपे के भीतर मुंह छिपाकर लिखना शुरू कर देता है। इससे साफ है कि हिन्दी का चौतरफा विकास होता रहेगा और हम सब राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी का जन्मदिन मना साल भर खुशी बटोरते रहेंगे।
संपर्क- साहित्यकार सदन, 195 पहली मंजिल,  सन्त नगर, नई दिल्ली- 110065 
        मो. 9213501292  E mail nukkadh@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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