January 31, 2012

कमीज

- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

महीने की आखिरी तारीख! शाम को जैसे ही पर्स खोलकर देखा, दस रूपए पड़े थे। हरीश चौंका, सुबह एक सौ साठ रूपए थे। अब सिर्फ दस रूपए बचे हैं?
पत्नी को आवाज दी और तनिक तल्खी से पूछा, 'पर्स में से एक सौ पचास रूपए तुमने लिए हैं?'
'नहीं, मैंने नहीं लिए।'
'फिर?'
'मैं क्या जानूँ किसने लिए हैं।'
'घर में रहती हो तुम, फिर कौन जानेगा?'
'हो सकता है किसी बच्चे ने लिए हों।'
'क्या तुमसे नहीं पूछा?'
'पूछता तो मैं आपको न बता देती, इतनी बकझक क्यों करती।' हरीश ने माथा पकड़ लिया। अगर वेतन मिलने में तीन-चार दिन की देरी हो गई तो घर में सब्जी भी नहीं आ सकेगी। उधार मांगना तो दूर, दूसरे को दिया अपना पैसा मांगने में भी लाज लगती है। घर में मेरी इस परेशानी को कोई कुछ समझता ही नहीं!
'नीतेश कहां गया?'
'अभी तो यहीं था। हो सकता है खेलने गया हो।'
'हो सकता है का क्या मतलब? तुम्हें कुछ पता भी रहता है या नहीं', वह झुंझलाया।
'आप भी कमाल करते हैं। कोई मुझे बताकर जाए तो जरूर पता होगा। बताकर तो कोई जाता नहीं, आप भी नहीं', पत्नी ठण्डेपन से बोली।
इतने में नीतेश आ पहुंचा। हाथ में एक पैकेट थामे ।
'क्या है पैकेट में?' हरीश ने रूखेपन से पूछा । वह सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
'पर्स में से डेढ़ सौ रुपए तुमने लिये?'
'मैंने...लिये', वह सिर झुकाए बोला।
'किसी से पूछा?' हरीश ने धीमी एवं कठोर आवाज में पूछा।
'नहीं', वह रूआंसा सा होकर बोला।
'क्यों? क्यों नहीं पूछा', हरीश चीखा।
'....।'
'चुप क्यों हो? तुम इतने बड़े हो गए हो। तुम्हें घर की हालत का अच्छी तरह पता है। क्या किया पैसों का', उसने दाँत पीसे।
नीलेश ने पैकेट आगे बढ़ा दिया-पंचशील में सेल लगी थी। आपके लिए एक शर्ट लेकर आया हूं। कहीं बाहर जाने के लिए आपके पास कोई अच्छी शर्ट नहीं है।'
'फि...फिर...भी...पूछ लेते ही', हरीश की आवाज की तल्खी न जाने कहां गुम हो गई थी। उसने पैकेट को सीने से सटा लिया।

अपने अपने सन्दर्भ

इस भयंकर ठंड में भी वेद बाबू दूध वाले के यहां मुझसे पहले बैठे मिले। मंकी कैप से झांकते उनके चेहरे पर हर दिन की तरह धूप-सी मुस्कान बिखरी थी।
लौटते समय वेदबाबू को सीने में दर्द महसूस होने लगा। वे मेरे कंधे, पर हाथ मारकर बोले- 'जानते हो, यह कैसा दर्द है?' मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मद्धिम स्वर में बोले- 'यह दर्दे- दिल है। यह दर्द या तो मुझ जैसे बूढ़ों को होता है या तुम जैसे जवानों को।'
मैं मुस्करा दिया।
धीरे- धीरे उनका दर्द बढऩे लगा।
'मैं आपको घर तक पहुंचा देता हूं।' मोड़ पर पहुंचकर मैंने आग्रह किया- 'आज आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही है।'
'तुम क्यों तकलीफ करते हो? मैं चला जाऊंगा। मेरे साथ तुम कहां तक चलोगे? अपने वारण्ट पर चित्रगुप्त के साइन होने भर की देर है।' वेद बाबू ने हंसकर मुझको रोकना चाहा।
मेरा हाथ पकड़कर आते हुए वेदबाबू को देखकर उनकी पत्नी चौंकी- 'लगता है आपकी तबियत और अधिक बिगड़ गई है? मैंने दूध लाने के लिए रोका था न?'
'
मुझे कुछ नहीं हुआ। यह वर्मा जिद कर बैठा कि बच्चों की तरह मेरा हाथ पकड़कर चलो। मैंने इनकी बात मान ली।' वे हंसे उनकी पत्नी ने आगे बढ़कर उन्हें ईजी चेयर पर बिठा दिया। दवाई देते हुए आहत स्वर में कहा- 'रात- रात भर बेटों के बारे में सोचते रहते हो। जब कोई बेटा हमको पास ही नहीं रखना चाहता तो हम क्या करें। जान दे दें ऐसी औलाद के लिए। कहते हैं- मकान छोटा है। आप लोगों को दिक्कत होगी। दिल्ली में ढंग के मकान बिना मोटी रकम दिए किराए पर मिलते ही नहीं।'
वेदबाबू ने चुप रहने का संकेत किया- 'उन्हें क्यों दोष देती हो भागवान! थोड़ी-सी सांसें रह गई हैं, किसी तरह पूरी हो ही जाएगी-' कहते- कहते हठात् दो आंसू उनकी बरौनियों में आकर उलझ गए।
संपर्क: फ्लैट -76,(दिल्ली सरकार) रोहिणी सैक्टर -11 , नई दिल्ली-110085 मो. 09313727493 Email: rdkamboj@gmail.com

4 Comments:

सुधाकल्प said...

एक लघुकथा में रिश्तों की मिठास ,दूसरी में रिश्तों की उपेक्षा --दोनों ही मर्म को छू गईं ।
सुधा भार्गव

सुनील गज्जाणी said...

namaskaar !
udanti ke khoobsurat ank ke liye . shree kamboj jee ki laghu kathae mujhe sada hi pasand aati hai . aur isikaram me ye bhi hai vishay aam aadami ka ho kar har dil ko sparsh karne wala hai . sunder . badhai
sadar

KAHI UNKAHI said...

काम्बोज जी की लघुकथाएँ पढ़ी...बहुत भाव-पूर्ण है...| मन को छू जाती है...एक ओर गरीबी की विवशता तो दूसरी में माँ-बाप का दर्द...| मेरी बधाई...|
प्रियंका गुप्ता

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दोनों लघुकथा बहुत मर्मस्पर्शी ....

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