December 28, 2011

दर्द आंसू में ढलता नहीं

- जहीर कुरेशी

हिम नयन में पिघलता नहीं,
दर्द आंसू में ढलता नहीं।
अनवरत साथ चलते हुए,
वो मेरे साथ चलता नहीं।
मुग्ध है अपनी मुस्कान पर,
फूल के बाद, फलता नहीं।
रंग रितुओं ने बदले, मगर,
मन का मौसम बदलता नहीं।
तुलना बेटी से करने के बाद,
फिर... कली को मसलता नहीं।
द्वंद से वो भी थकने लगा,
वो जो घर से निकलता नहीं।
कितने दिन से शयन-कक्ष में,
एक दीपक भी जलता नहीं।
नींद की मेजबानी
नींद की मेजबानी मिली,
स्वप्न से जब कहानी मिली।
दिन में सूरजमुखी से मिले,
रात भर रातरानी मिली
रंग फसलों ने बदले नहीं,
हर समय फस्ल धानी मिली।
उनको 'लिव इन' सुरक्षित लगा,
प्यार में बुद्धिमानी मिली।
नीम की पत्तियों की तरह,
झूठ से सच बयानी मिली।
हर नदी में समंदर तलक,
जिंदगी की निशानी मिली।
शेर में थी नयी व्यंजना,
किन्तु सज-धज पुरानी मिली।

संपर्क- समीर काटेज, बी-21 सूर्य नगर, शब्द प्रताप आश्रम के पास,
ग्वालियर 474012 (मप्र), मो. 09425790565

2 Comments:

दिलबाग विर्क said...
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सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

dono gazlen bahut achchhi ....

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
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