October 29, 2011

ये चेहरा अपना सा लगता है

- आशा भाटी
गाँधी को देखा तो नहीं है हमने।
पर ये चेहरा गाँधी से मिलता है।
बहुत सादा है पर बहुत अपना सा लगता है।
एक सुलगता क्रांति का तूफान दिल में लिए हैं।
पर चेहरे पर एक शीतल चांदनी बिखरी है।
इस आवाज में कोई जादू है कि
खिंचते चले आ रहे हैं लोग।
उनकी आवाज ने देश के
सोए जनमानस को जगाया है।
जंतर- मंतर एक बड़ा सा आंगन बन गया है।
भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों का ठिकाना बन गया है।
अन्ना तुमने बीड़ा उठाया है,
नेताओं के काले चेहरों से नकाब उठाने का।
भ्रष्टाचार के राक्षसों से देश को बचाने का।
एक अंधी- बहरी सरकार को जगाने का।
इससे अच्छा उपाय और क्या हो सकता है।
कई बार क्रांतियां इस तरह भी आती हैं।
अहिंसा से भी अपनी बात कही जाती है।
हमारी कामना है ये अभियान सफल बने।
भारत फिर से महान और शक्तिशाली बने।
संपर्क- शताक्षी, 13/ 89 इन्दिरा नगर,
लखनऊ 226016,फोन. 0522- 2712477

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2 Comments:

At 30 October , Blogger दिलबागसिंह विर्क said...

अच्छी सोच को दर्शाती कविता, लेकिन अफसोस अन्ना के साथी निजी कारणों के चलते अन्ना के साथ हैं न कि देश भक्ति के कारण, फिर अन्ना कोई विकल्प भी तो नहीं बता रहे , कहीं यह आंदोलन 1977 के आंदोलन जैसा न हो जाए

 
At 01 November , Blogger दीपक 'मशाल' said...

उत्तम विचार.. पर कविता कहाँ है??

 

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