April 10, 2011

जाऊं पिया के देस ओ रसिया मैं सजधज के...

- जवाहर चौधरी

रेडियो बजा तो सब निहाल हो गए। उसकी आवाज बाजे से ज्यादा साफ और अच्छी थी। आवाज को कम- ज्यादा करने की सुविधा भी चौंकाने वाली थी। कई दिनों तक लोग रेडियो को देखने के लिए आते रहे। साफ आवाज सुन कर बूढ़े और महिलाएं समझतीं कि इस डब्बे में लोग बैठे बोल रहे हैं।
1958- 59 का समय याद आ रहा है। इन्दौर ...... एक छोटा सा शहर, जिसमें घोड़े से चलने वाला तांगा और बैलगाडिय़ां खूब थीं। सामान्य लोग पैदल चला करते थे। युवाओं में सायकल का बड़ा क्रेज था। सूट पहने, टाई बांधे सायकल सवार को देख कर लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। उस वक्त की फिल्मों में हीरो- हीरोइन भी सायकल के सहारे ही प्रेम की शुरुआत करते थे। दहेज में सायकल देने का चलन शुरू हो गया था। दूल्हे प्राय: दुल्हन की अपेक्षा सायकल पा कर ज्यादा खुश होते। सायकिल को धोने- पोंछने और चमकाने के अलावा पहियों में गजरे आदि डाल कर सजाने का शौक आम था।
बिजली सब जगह नहीं थी, दुकानों में पेट्रोमेक्स जला करते थे। सूने इलाके में स्थित हमारा घर कंदील से रौशन होता था। मनोरंजन के लिए लोग प्राय: ताश पर निर्भर होते थे। कुछ लोग शतरंज या चौसर भी जानते थे। लेकिन इनकी संख्या बहुत कम थी। संगीत की जरूरत वाद्ययंत्रों से पूरी हो पाती थी जिसमें ढ़ोलक सबको सुलभ थी। पिताजी ने चाबी से चलने- बजने वाला एक रेकार्ड प्लेयर खरीद लिया था जिसे 'चूड़ी वाला बाजा' कहते थे। घर में बहुत से रेकार्ड जमा किए हुए थे। उन्हें बाजे का बड़ा शौक था। एक डिब्बी में बाजा बजाने के लिए पिन हुआ करती थी। एक पिन से चार या पांच बार रेकार्ड बजाया जा सकता था। पिन वे छुपा कर रखते थे, मंहगी आती थी।
उन दिनों एक गाना खूब बजाया जाता था -- ' चली कौन से देस गुजरिया तू सजधज के ........ जाउं पिया के देस ओ रसिया मैं सजधज के ..... '। मुझे भी बाजा सुनना बहुत भाता था। यह गीत तो बहुत ही पसंद था। लेकिन इजाजत नहीं थी बजाने की। इसलिए प्रतीक्षा रहती कि पिताजी के कोई दोस्त आ जाएं। दोस्त अक्सर शाम को आते और 'बाजा-महफिल' जमती। कई गाने सुने जाते लेकिन ' चली कौन से देस ..' दो-तीन या इससे अधिक बार बजता।
कुछ समय बाद रेडियो के बारे में चर्चा होने लगी। पिताजी के दोस्त बाजा- महफिल के दौरान तिलस्मी रेडियो का खूब बखान करते। एक दिन रेडियो आ ही गया। बगल में रखी भारी सी लाल बैटरी से उसे चलाया जाता। सिगनल पकडऩे के लिए घर के उपर तांबे की जाली का पट्टीनुमा एंटीना बांधा गया जो बारह- तेरह फिट लंबा था। रेडियो बजा तो सब निहाल हो गए। उसकी आवाज बाजे से ज्यादा साफ और अच्छी थी। आवाज को कम- ज्यादा करने की सुविधा भी चौंकाने वाली थी। कई दिनों तक लोग रेडियो को देखने के लिए आते रहे। साफ आवाज सुन कर बूढ़े और महिलाएं समझतीं कि इस डब्बे में लोग बैठे बोल रहे हैं। रेडियो सायकल से बड़ा सपना बनने जा रहा था।
जल्द ही रेडियो सिलोन में दिलचस्पी बढ़ी, खासकर बिनाका गीतमाला में। अमीन सायानी की आवाज में जादू का सा असर था, जब वे 'भाइयो और बहनो' के संबोधन के साथ कुछ कहते तो कानों में शहद घुल उठती। बुधवार का दिन इतना खास हो गया कि इसे 'बिनाका-डे' कहा जाने लगा। शाम होते ही लोग आने लगते। आंगन में बड़ी सी दरी बिछाई जाती जो पूरी भर जाती। उन दिनों पहली पायदान पर रानी रूपमती का गीत 'आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं .....' महीनों तक बजता रहा था। सायानी एक बार मुकेश और एक बार लता मंगेशकर की आवाज में इसे सुनवाते। इस गीत के आते- आते श्रोताओं का आनंद अपने चरम पर होता, वे झूमने लगते।
इस बैटरी- रेडियो को भी बड़ी किफायत से चलाया जाता था क्योंकि बैटरी बहुत मंहगी आती थी। इसलिए अभी 'चूड़ी वाले बाजे' का महत्व कम नहीं हुआ था। याद नहीं कब तक ऐसा चला और बिजली आ गई। कुछ दिनों बाद ही बिजली वाला रेडियो भी।
पहले 'चूड़ी वाला बाजा' बेकार हुआ, फिर बैटरी-रेडियो भी घटे दामों बाहर निकला। लेकिन इनकी यादें हैं कि टीवी युग में भी अपनी जगह बनाए हुए हैं।
संपर्क- 16 कौशल्यापुरी, चितावाद रोड, इंदौर- 452001, मो.- 09 826361533,
Email- jc.indore@gmail.com, jawaharchoudhary.blogspot.com

1 Comment:

सहज साहित्य said...

जाऊँ पिया के देस-- संस्मरण ने पुरानी यादें ताज़ा कर दीं। 1965 में हमारे गाँव में रडियो आया था । चौपाल में सब चुपचाप होकर सुनते थे । देहाती कार्यक्रम में जब कार्यक्रम के प्रस्तोता राम-राम कहते थे तो श्री अमोलक सिंह ( जिनका रेडियो था) बड़ी ज़ोर से-"राम-राम भाई राम-राम"-कहते थे ।एक बार किसी ने पूछ लिया कि ताऊ रेडियो कितने बैण्ड की है? उनका उत्तर आज तक मन ही मन मुस्काने को मज़बूर करता है-" अरै भाई इसमैं तो बहर भित्तर बैण्ड ही बैण्ड हैं।"

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष