October 23, 2010

भ्रष्टाचार के साये तले चमकते प्रतिभा के स्वर्णपदक

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल शुरु होने से पहले भारत को लेकर इतनी निराशाजनक और शर्मनाक खबरें आईं कि खेलों के प्रति रुचि ही जाती रही। चाहे वह फुट ओवरब्रिज धराशायी होने का मामला हो या दिल्ली में आई बाढ़ के बाद खेल गांव में सांप निकलने का या फिर करोड़ों के भष्ट्राचार का लेकिन जैसे- जैसे खेल आगे बढ़ते गया भारतीय खिलाडिय़ों ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन से पूरे माहौल को बदल डाला।

सबसे आश्चर्य और कमाल की बात तो यह है कि जिस राज्य में लड़की के पैदा होते ही उसे मार दिया जाता है या कन्या भ्रूण हत्या में जो राज्य सबसे आगे है और जहां 'ऑनर किलिंग के सबसे अधिक मामले सामने आ रहे हैं उसी हरियाणा की लड़कियों ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का नाम ऊंचा किया है। भारत को खेलों में पदक दिलाने वाली इन ज्यादातर खिलाडिय़ों की एक और खास बात है कि ये खिलाड़ी किसी बड़े शहर से नहीं बल्कि भारत के छोटे- छोटे गांवों और कस्बों से हैं। लड़कियां जो परंपराओं के नाम पर सताईं जाती हंै, परिवार के लिए बोझ मानी जाती हैं, ने इन बेडिय़ों को तोड़ कर दिखा दिया है कि कुछ कर गुजरने का जज़्बा हो तो कोई भी बेड़ी उनके कदमों को रोक नहीं सकती।
इस संदर्भ में यदि हम शहरों और गांवों की तुलना करें तो एक ओर चमक- दमक और सुविधा भरी शहरी जिंदगी है तो दूसरी ओर कड़ी मेहनत वाला गांवों का कठोर जीवन। शहरों की प्रतिभाओं को जितनी आसानी से उभरने का मौका मिलता है, उतना गांवों के खिलाडिय़ों को नहीं। फिर भी हरियाणा के भिवानी के एक छोटे से गांव बिलाली से आने वाली गीता कुश्ती में स्वर्ण जीतने वाली पहली महिला है। उनकी बहन बबीता ने 51 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में रजत पर कब्जा जमाया। फ्रीस्टाइल कुश्ती में हरियाणा की ही अनीता ने भी स्वर्ण पर कब्जा किया तो हरियाणा पुलिस में काम करने वाली निर्मला देवी रजत जीतकर आईं। डिस्कस थ्रो में तो भारत ने इतिहास रच दिया। हैरानी की बात नहीं कि स्वर्ण और कांस्य जीतने वाली कृष्णा पूणिया और सीमा हरियाणा की ही मिट्टी से हैं।
कुश्ती में मेडल जीतने वाली लड़कियां ऐसे परिवारों से आई हैं, जिनके पिताओं ने ही इन्हें मिट्टी के अखाड़े पर स्वयं उतारा है। 55 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल विजेता गीता गर्व से कहती है कि 'ऑनर किलिंग एक अलग मसला है। मेरी चार बहनें भी कुश्ती करती हैं। अगर आप परिवार का मान बढ़ाएंगी तो सभी आप के साथ खड़े होंगे। मेरे पिता हमेशा कहते थे कि उन्हें बेटों की जरूरत नहीं।'
इसी तरह मेरठ जिले के सिलोली गांव में जन्मी अलका तोमर जिसने 59 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड जीता है, का कहना है 'जब मैंने कुश्ती शुरू की तो पिताजी ने मेरे बाल कटवा दिए। आस- पड़ोस के लोगों ने कहा कि यह क्या कर दिया! लड़कियों से कुश्ती करवा रहा है। इनका क्या होगा! तब मेरे पिता का जवाब होता, मैं इन्हें आगे बढ़ता देखना चाहता हूं।' वह कहती है 'परिवार, गांव और समाज का नाम बढ़ाने वाले के खिलाफ कौन
जाएगा। मैं आज यहां तक पहुंची हूं तो सिर्फ परिवार, समाज और अपने कोचों की मदद से। अच्छा करूंगी तो और आगे बढूंगी। कोई नहीं रोकेगा मुझे।'
नेशनल बॉक्सिंग में पहचान बनाने वाली लड़कियों में 16 साल की हेमा योगेश और 22 साल की प्रीति बेनिवाल ने भी छोटे- छोटे गांव और कस्बों से होते हुए नेशनल टीम में जगह बनाई है। इन लड़कियों के लिए बॉक्सिंग जैसे खेल में आना आसान नहीं था। कुछ ऐसी ही कहानी तीरंदाजी की है। जमशेदपुर टाटा तीरंदाजी अकादमी तथा पश्चिम बंगाल के साईं तीरंदाजी सेंटर में कार्बन और ग्रेफाइट से निर्मित आधुनिक धनुष के साथ टारगेट को तीरों से भेद देने वाली लड़कियों में ज्यादातर आस- पास के आदिवासी इलाकों या ग्रामीण क्षेत्रों से ही हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि घंटो कठिन अभ्यास और अनुशासित जीवन से उनकी भुजाओं में सिर्फ ज्यादा ताकत ही नहीं, बल्कि एकाग्रता के मामले में भी वे शहरी लड़कियों से बीस ही बैठती हैं। तीरंदाजी में भारत के लिए स्वर्ण जीतने वाली16 साल की दीपिका कुमारी झारखंड के एक छोटे से गांव में रहती है। दीपिका के पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं।
इसी तरह दस हजार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली कविता राउत नाशिक के गांव से आई है, उसने धावक बनने का फैसला इसलिए किया क्योंकि वह नंगे पैर दौड़ सकती थी, उसके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि उसके लिए जूते खरीद सके। 4ङ्ग400 महिला रिले दौड़ में बड़ी सफलता मनजीत कौर, सिनी जोसफ, अश्वनी अकुंजी और मनदीप कौर की चौकड़ी ने दिलाई। उन्होंने नाइजीरिया और इंग्लैंड के धावकों को पछाड़ते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। और अंतिम दिन साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में महिला एकल का स्वर्ण जीतकर लड़कियों के खाते में एक और उपलब्धि जोड़ दी। हमें नाज़ है इन बेटियों पर।
सच बात तो ये है कि ये सभी लड़कियां छोटे जगहों की हैं- हरियाणा के हिसार या उत्तर- पूर्व के दूरदराज के इलाकों की ही नहीं, बल्कि पहाड़ के छोटे- छोटे गांवों की लड़कियों को बाक्सिंग के दस्तानों के साथ रिंग में देखना वाकई एक अलग अनुभव है। ये वास्तव में ऐसा खेल है, जिसे शहरों की बजाय छोटे स्थानों और ग्रामीण पृष्ठभूमि की लड़कियों ने ज्यादा अपनाया है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारतीय खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं जो ग्लैमरस स्पर्धाएं नहीं कहलातीं हैं। लेकिन उनके इस पदक का सम्मान तो तब होगा जब खेलों के समाप्ति के बाद हम उनकी इन उपलब्धियों को बिसरा न दें। बल्कि आगे होने वाले खेलों की बेहतर तैयारी करें। उन खेल प्रतिभाओं को आगे लाने के बारे में सोचें, उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निखरने का मौका देना चाहिए। यही वह सुनहरा समय है जब हम अपने खिलाडिय़ों और खेलों को बेहतर सुविधा और प्रशिक्षण दे सकते हैं। यदि यह काम ईमानदारी से किया जाए तो अगले दशक में भारत खेलों के मामले में नंबर एक पर होगा यह दावे के साथ कहा जा सकता है।
उपलब्धियों की इस चकाचौंध में इन खेलों की आड़ में हुए करोड़ों के भ्रष्टाचार को महज इसलिए नहीं भूल जाना चाहिए कि भारतीय खिलाडिय़ों ने बड़ी मात्रा में स्वर्ण पदक दिलाए हैं। भ्रष्टाचारियों को सजा मिले यह भी जरुरी है। ताकि ऐसे बदनुमा दाग से देश का सिर फिर कभी झुकने न पाए। यह दाग तभी धुल पाएगा जब इस सबसे बड़े भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों को सजा मिले। तभी सच्चे अर्थों में हमारी जीत होगी।

- रत्ना वर्मा

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