July 11, 2010

रंग- बिरंगी दुनिया

ऐसे मशहूर हो गई यह तस्वीर
द्वितीय विश्व युद्ध के खात्मे पर मनाए जा रहे जश्न के दौरान एक अमेरिकी नाविक का चुंबन लेते हुए अनजाने में इस बहुचर्चित तस्वीर का हिस्सा बनीं पूर्व नर्स एडिथ शेन की 23 जून 2010 को 92 साल की उम्र में मौत हो गई।
एडिथ की यह तस्वीर उस समय खींच ली गई ती जब द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने पर अपनी खुशी का इजहार करने के लिए न्यूयार्क में एक सैनिक ने गर्मजोशी के साथ उनका चुम्बन ले लिया था। तब उन्हें इसका अहसास भी नहीं रहा होगा कि उनकी तस्वीर इस तरह खींच ली जाएगी और एक भयावह युद्ध के इतिहास की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक बन जाएगी।
एडिथ 14 अगस्त 1945 को न्यूयॉर्क में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं और यही वह तारीख थी जब रेडियो नेटवर्क की मदद से पता चला कि जापानियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। तब एडिथ युद्ध के खात्मे का जश्न मनाने के लिए टाइम्स स्क्वायर पर गई थीं। वहां जश्न मनाने के दौरान एडिथ नौसेना के एक नाविक की बांहों में चली गईं। एडिथ की ओर से किए गए इस किस को फोटोग्राफर एल्फ्रेड आइजेनस्टाड्ट ने अपने कैमरे में कैद कर लिया और बाद में यह तस्वीर मैगजीन में प्रकाशित होकर दुनिया भर में मशहूर हो गई।
कई साल पहले जब एडिथ से इस तस्वीर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा- मैं डॉक्टर्स हॉस्पिटल से टाइम्स स्क्वायर गई थी क्योंकि जंग खत्म हो चुकी थी। एक न्यूयॉर्क निवासी और कहां जा सकता था? वहां इस व्यक्ति ने मुझे पकड़कर किस किया और फिर हम अलग- अलग दिशाओं में चले गए। वह कौन था, यह जानने का कोई तरीका नहीं था। लेकिन मुझे जरा भी बुरा नहीं लगा क्योंकि वह उनमें से था जिसने हमारे लिए जंग लड़ी थी। कई पुरुष दावा करते रहे हैं कि चित्र में नर्स को चुम्बन करते हुए उनका चित्र है, परंतु ऐसे सभी वादे विवादास्पद रहे हैं।
10 हजार रुपये कमाने वाला लंगूर
दिल्ली में कुछ वर्ष पूर्व बंदरों के आतंक से लोग त्रस्त थे तब इस समस्या से निजात पाने के लिए लंगूरों का सहारा लिया गया था। आज दिल्ली ही नहीं, देश के कई शहरों में लोग बंदरों के आतंक से दुखी हैं। इनमें से एक शहर कानपुर भी है। यहां एस्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन का ऑफिस जिस जगह है वहां बंदरों ने काफी उत्पात मचा रखा है। वे न लोगों के घरों से खाना, कपड़े आदि उठा लेते हैं तथा घर में रखे गमलों आदि को भी तोड़- फोड़ देते हैं यहां तक तो फिर भी ठीक है पर जनाब ये लंगूर एस्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफिस से फाइलें भी उठा कर ले जाते थे और उसे फाड़ देते थे।
कई लोगों को ये काट भी चुके हैं इन सब कारणों से लोगों का सुबह- शाम बाहर निकलना भी मुश्किल हो रहा था। कई स्तर पर इन बंदरों को यहां से भगाने का प्रयास किया गया पर हर प्रयास विफल रहा तो वहां के लोग लंगूर की शरण में आ गए। इस लंगूर से बंदर डर कर दूर ही रहते हैं। अब इस लंगूर की इस मुहल्ले और ऑफिस के गेट पर ड्यूटी लगा दी गई है। बिलकुल किसी मुस्तैद चौकीदार की तरह यह लंगूर यहां तैनात रहता है।
इंश्योरेंस के डिप्टी डायरेक्टर प्रकाश चन्द शर्मा के अनुसार अब काफी राहत है। कोई बंदर यदि निकट आता भी है तो उसे यह लंगूर डरा कर भगा देता है। दिन में यह लंगूर अपने मालिक के साथ मुहल्ले के दो- चार चक्कर भी लगा आता है।
लेकिन यह लंगूर यहां कोई फ्री में काम नहीं कर रहा है। बाकायदा इसे दस हजार महीने की तनख्वाह दी जाती है। इसके मालिक का कहना है इससे ही इसका खाना-पीना चलता है। यानी लंगूर भी खुश, मालिक भी और लोग तो हैं ही खुश।

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