June 05, 2010

चॉकलेट

-परितोष चक्रवर्ती
राजधानी के आने में सिर्फ 15 मिनट रह गये हैं। उसकी पाली के साथी अभी तक नहीं पहुंचे। कम से कम शेखू और जॉन को तो अब तक आ जाना चाहिए था।
पिंटू उस्ताद को देखने से लगता ही नहीं कि उसकी उम्र कुल जमा 13 वर्ष है। वह अपनी टोली का सबसे लम्बा और अधिक उम्र का लगता है।
बाप की दारूबाजी और रोज की मारपीट से वह इतना तंग रहता है कि अक्सर दो- दो बजे रात तक घर नहीं जाता। आठ दिन पहले की बात है, जब देर रात पुलिस की गश्त में वह पहाडग़ंज में पकड़ा गया था। वो तो भला हो जीआरपी के चंडी हवलदार का जो उस समय चाय पीने के लिए स्टेशन के बाहर निकले थे, ड्यूटी पर थे और उन्होंने इंस्पेक्टर से बात की थी और मिन्नत-खुशामद करते उसे छुड़ा लिया था। कहीं थाने में ले जाया गया होता तो निश्चित रूप से उसे बुक कर देते। फिर भी इंस्पेक्टर ने सीधे-सीधे नहीं छोड़ा, कसके तीन-चार हाथ जड़ ही दिये थे। खाये-पिये बदन का वह इतना वजनी हाथ था कि पिंटू के दांत हिल गये थे।
कमोबेश टोली के सब लड़कों के घर की यही कहानी है। शेखू का बाप नई दिल्ली स्टेशन का पुराना बिल्ले वाला कुली है। ढेर सारे भाई-बहन, कमाई कम, चिकचिक ज्यादा। उस पर दारू का तांडव। जॉन की कहानी कुछ अलग है। उसके पापा प्वाइंट्समैन हैं, उसकी दो मां हैं। बड़ी मां सिलाई-कढ़ाई करके अलग पैसा कमाती है और अलग झोपड़ी में रहती है। बड़ी मां के भी दो बच्चे हैं। जो स्कूल जाते हैं, पर जॉन के चार भाई-बहनों में सिर्फ बड़ी बहन ही पढऩे जाती है। एक सरकारी स्कूल है, पांचवीं तक। जॉन वहां जाता था लेकिन पढ़ाई-लिखाई में उसका मन नहीं लगता। उधर के प्राय: सभी बच्चे रेलवे स्टेशन के आस-पास छोटे-मोटे काम में लग जाते हैं।
इस नये काम की शुरूआत तो एक तरह से चंडी हवलदार के कहने से ही हुई। ये सच है कि चंडी हवलदार नि:स्वार्थ कोई काम नहीं करते, लेकिन पिंटू को फिर भी वे अच्छा मानते हैं। पिछले दिनों प्लेटफार्म नं. एक से लेकर दस तक जमाल की दादागिरी चलती थी। जमाल अपनी पसन्द की चीजें पहले खुद छांटता था, फिर बचा हुआ सामान अन्य लड़कों में बांटता था। बोतल और प्लास्टिक पैकेट और इन फेंकी हुई चीजों में कभी-कभार ही कोई अच्छी चीज मिल पाती। इस तरह के भेद-भाव से सब दु:खी रहते थे।
शेखू ने तो सीधे-सीधे जमाल पर हमला ही बोल दिया, 'तू हम लोगों को ठगता है, सारा अच्छा माल खुद निकाल लेता है। दस-दस गाडिय़ां अटेन (अटेंड) करने के बाद भी हमें नाश्ते तक का पैसा नहीं मिलता। तुम तो गाड़ी खंगालते नहीं हो, फिर भी सारा माल झपट लेते हो।'
खूब गुत्थमगुत्था हुई। बात और बिगड़ जाती कि चंडी हवलदार कहीं से प्रकट हो गये। उन्होंने उसी दिन प्लेटफार्म का बंटवारा कर दिया। एक से छह नम्बर तक के प्लेटफार्म जमाल और उसके साथियों के और सात से बारह नम्बर प्लेटफार्म पिंटू उस्ताद के हिस्से में। इस बंटवारे के साथ ही यह तय हो गया था कि सप्ताह में एक नम्बर की एक अद्धी चंडी हवलदार को देनी होगी और किसी एक दिन मुर्गा खिलाना पड़ेगा। गनीमत है कि पैसे की चर्चा चंडी हवलदार ने नहीं की। वैसे उनके हिस्से में नगद पैसे आते ही कितने हैं, जो हवलदार को देते?
उसके बाद भी झमेले कम नहीं थे। ट्रेन के आते ही कुलियों से पहले उन्हें ट्रेन में चढऩे की इजाजत नहीं थी। कई बार तो यात्रियों के छोड़े हुए अच्छे सामान कुली ही चेप लेते थे। पिंटू ने एक बार देखा कि फोटोखींचने वाला एक मोबाइल सीट पर पड़ा है। देवक सिंह कुली ने उसे चुपके से जेब में रख लिया था। पिंटू ने कुली को कहा भी कि सिर्फ पांच रुपये दे दे, नहीं तो सबको बता देगा। इतना कहना था कि उस कुली ने अपने दो आदमी बुला लिये और खाली कोच के अन्दर ही उसकी अच्छी-खासी पिटाई कर दी। पिंटू उस्ताद के पास सिवाय चंडी हवलदार के कोई सहारा नहीं था। अंतत: चंडी ने ही कुलियों के मेट से बात की और तय किया कि कोई भी यात्री गाड़ी प्लेटफार्म में पहुंचने के दस मिनट तक मवाली लड़के ट्रेन के भीतर नहीं जाएंगे, अब चाहे इससे कुछ हाथ लगे या न लगे। कुलियों से भी यह कौल ले लिया कि वे अब सिर्फ सामान उतारेंगे और चढ़ाएंगे, बाकी सामान नहीं छुएंगे। इस अलिखित संविधान पर सारा कारोबार चल रहा था।
चंडी हवलदार की सहानुभूति इन लड़कों के साथ एक दूसरी वजह से भी थी। दबी जबान से जमाल जैसे कुछ शरारती लड़के यह बात कहने से नहीं चूकते कि पिंटू उस्ताद और शेखू के घर में चंडी का आना-जाना वर्षों से है। इस बात को लेकर कभी-कभी पिंटू और शेखू को चिढ़ाया भी जाता रहा है। मगर ऐसी नोंक-झोंक और फब्तियों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। अक्सर पीकर घर लौटे हुए बाप जो तांडव मचाते हैं, उससे अब इन किशोरों के मन में रिश्तों की कोई खास अहमियत नहीं रह गई है। मारपीट, गाली-गलौज के बीच गुजरे हुए दिन में वे खुश तब होते हैं जब किसी ट्रेन के डिब्बे से उन्हें कोई नायाब-सी चीज पड़ी हुई मिल जाती है। बिज्जू के हाथ की वह घड़ी अब भी दूसरे लड़कों को चिढ़ाती रहती है। एक बार तो खुद हवलदार ने बिज्जू से 50 रुपये में वह घड़ी मांगी थी। ले-देकर बिज्जू ने एक पौव्वा लाकर हवलदार को दिया, तब कहीं जाकर हवलदार की नजर घड़ी पर से हटी...।
अब विम्पी रेस्टोरेंट के पास भी उन लोगों का जमा होना जीआरपी को खटकने लगा। पिंटू उस्ताद ने सभी को कह दिया कि होम सिग्नल के दायीं तरफ एक पान की दुकान है, वहीं सब लोग इकट्ठे हो जाएं। पान वाला तीरथराम वैसे बीसेक साल का है, लेकिन पिंटू से उसकी दोस्ती हो गई है। यात्री गाड़ी में यात्रियों द्वारा तम्बाखू के जितने पाऊच पिंटू और उसके साथियों को मिल जाते हैं, उन्हें वह करीब एक चौथाई कीमत पर खरीद लेता है। कभी-कभी इसके एवज में उन्हें उधारी में बीड़ी भी मिल जाती है।
पिंटू की उस छोटी-सी टोली में आठ-नौ साल से लेकर उसकी उम्र अर्थात बारह-तेरह साल तक के सात लड़के हैं। दो छोटे लड़के संजू और मन्ना साथ इसलिए रहते हैं कि बर्थ के नीचे घुसकर झांकने में सुविधा रहती है। छूटे हुए सामान अधिकतर ए.सी. डिब्बों में ही मिलते हैं। राजधानी एक्सप्रेस उनकी जुबान में 'गोल्डन ट्रेन' है। यह पिंटू का दिया हुआ नाम है।
केवल चंडी हवलदार से ही दोस्ती से काम नहीं चलता है। जीआरपी के इंस्पेक्टर भदौरिया को भी 15-15 दिनों में सलामी देनी पड़ती है। सभी लड़के मिलकर एक पूरा बोतल बैगपाइपर का भदौरिया को पहुंचाते हैं। पैसे की मांग भी भदौरिया ने की थी, तब चंडी हवलदार ने लड़कों का साथ दिया था और भदौरिया को समझाया था, 'हुजूर, ये पैसे कहां से दे सकते हैं? बड़े लोग भी एक-एक पैसा गिनकर रखते हैं। इनके लिए कोई क्या छोड़ेगा। गरीब लड़के हैं, इन पर रहम खाइए।'
पुलिसवालों की पुलिसवाले सुन लेते हैं। सो एक बैगपाइपर से अंतत: मामला निपटा।
कुछ सिपाही भी हैं जो बीच-बीच में कॉलर-वॉलर पकड़कर अक्सर दो-चार जमा देते हैं। इसका भी पिंटू ने नाम रखा है 'हुप्पी।' घर पर प्राय: सभी बच्चे अपने बाप से ऐसी 'हुप्पी' आये दिन पाते रहते हैं। साथी कहते हैं कि पिंटू ने ही अपनी स्टाइल से संजू बाबा वाली 'झप्पी' का विरोधी शब्द 'हुप्पी' ढूंढ लिया है। 'झप्पी' में प्यार टपकता है- तो 'हुप्पी' में घूंसा बरसता है।
बोतलबंद पानी की खाली बोतलें इकट्ठा कर वे पान की दुकान में जमा करते हैं। आजकल कुछ यात्री थोड़ा ज्यादा ही नियम-कायदे का पालन करने लगे हैं। बोतल को बिल्कुल मोड़कर फेंकते हैं। ऐसी तमाम बोतलों का भाव न के बराबर होता है। ढक्कन औरबोतल दोनों अलग-अलग कर ली जाती है। पिंटू उस्ताद ने दो व्यापारियों को ढूंढ लिया है जो ढक्कन और बोतल खरीद लेते हैं। साफ-सुथरी बोतल के एवज में 10 पैसे प्रति बोतल मिलते हैं और ढक्कन के पांच पैसे। मुड़ी-तुड़ी बोतलें वजन से बिकती हैं। इन बोतलों के बहुत कम पैसे मिलते हैं। सेठजी की मर्जी है, वे जितना दे दें। वैसे खंगालने को बाथरूम भी खंगाल लिया जाता है। वहां गलती से भी नहीं झांकता है तो संजू। उसका कहना है कि मैं बाथरूम का सामान देखता ही नहीं। दो-तीन बार बड़ा धोखा हो गया। औरतों वाले पैड अखबार में ऐसे लपेट कर छोड़े गये थे जैसे वह बड़ा कीमती सामान हो। पहले तो संजू को खून-वून देखकर डर लगा था, पर बाद में पिंटू उस्ताद ने अपनी भाषा में उसे समझा दिया था। तब से उसे घिन-सी आती है। हालांकि उसी टायलेट से उसे एक बार घड़ी मिल चुकी है लेकिन फिर भी वह टायलेट में अक्सर नहीं झांकता।
पिंटू का कहना है कि 'गरीब आदमी को काहे का घिन!' एक बार तो विदेशी लैट्रिन के पैन में उसे एक पर्स दिख गया था और उसने हाथ डालकर उसे निकाल लिया था। अब तक की सबसे बड़ी कमाई वही थी। तीन हजार नगद मिले थे। अक्सर चॉकलेट के आधे हिस्से इन्हें मिल जाते हैं तो बिना देर किये इसे वे निगल लेते हैं। हालांकि अलिखित नियम यह है कि जो भी सामान हाथ लगेगा वह पान दुकान के पास जाकर बांटा जाएगा लेकिन ये दोनों साथी चॉकलेट और खाने-पीने के सामान के मामले में उसे चट कर जाने में ही भलाई समझते हैं। दो शिफ्टों में काम को बांट लिया गया है। अपेक्षाकृत उम्र में छोटे बच्चों को रेलवे स्टेशन से रवाना होने वाली कुछ गाडिय़ों में अगले स्टापेज तक भेजा जाता है। एक झाड़ू करीब-करीब चार महीने तक काम में लाई जाती है। झाड़ू लगाने के बाद वे पैसे मांगते हैं और फिर दूसरी ट्रेन में ठीक उसी तरह सफाई करते और पैसे मांगते वापस होते हैं। पिंटू सिर्फ इनकी सुरक्षा के लिए साथ में जाता है तो कभी शेखू की ड्यूटी लगती है। जब स्क्वायड की चेकिंग होती है तब इनकी मुसीबत बढ़ जाती है। कभी-कभी कोई टीटी इन्हें बीच में ही ट्रेन रूकने पर बलात उतार देता है। एक बार तो संजू को पटरी के किनारे-किनारे दिल्ली स्टेशन तक लौटने के लिए 15 कि.मी. पैदल तय करने पड़े थे। एकत्रित पैसे में से कभी-कभी टीटी को भी कुछ चढ़ावा देना पड़ जाता है। यद्यपि हवलदार ने सबके मना कर रखा है कि कोई 'यार्ड' की तरफ नहीं जाएगा, क्योंकि यार्ड में आरपीएफ की ड्यूटी होती है। इनके हत्थे चढऩे पर जीआरपी वाले बीच-बचाव नहीं करते क्योंकि दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है।
जिस दिन रेलवे के बड़े अधिकारी का निरीक्षण होता है उस दिन पहले से ही खबर हो जाती है और मन मारकर उस दिन की रोजी का नुकसान सहना पड़ता है। कभी-कभी ऐसे दिनों में चंडी हवलदार उदार हो जाते हैं। कार स्टैंड पर उस तरफ जो चाय वाला बैठता है उसके जरिये वे लड़कों की टोली को आधा कप चाय पिलवा देते हैं। बच्चे खुश हो जाते हैं और हवलदार को बच्चों का आशीष इन शब्दों में मिलता है- 'चचा, आज जरूर आपको कोई मोटा धूर (आसामी) मिलेगा।' सुनकर हवलदार की अधपकी मूंछों पर मुस्कराहट फैल जाती है। ए.सी. डिब्बों के सामने जो साइड पॉकेट बने होते हैं, उन्हीं को खंगालने में सबकी रूचि रहती है। कभी-कभी सीट के नीचे भी कोई सामान छूट गया होता है। वे पहले ते बड़ी तेजी से हाथ डाल देते थे लेकिन अब जब से बमबाजी के किस्से होने लगे हैं, डरते-डरते ही पड़े हुए पैकेट को छूते हैं। बीच-बीच में पिंटू सबकी क्लास भी लेता है कि इस किस्म के पैकेट से दूर रहा जाए, ज्यादा संदेह होने पर हवलदार को भी इसकी सूचना दे दी जाए।
उस दिन मंगलवार था। तीन नम्बर प्लेटफार्म पर कोलकाता राजधानी एक्सप्रेस आ रही थी। उसके पहले ही एक पूरी ट्रेन बच्चे खंगाल चुके थे। पान दुकान से कुछ दूरी पर मन्ना और संजू एक पत्थर पर आकर बैठे। मन्ना और दिनों की अपेक्षा बहुत खुश था। वह थोड़ी देर तक चुप रहा, पर ज्यादा देर तक अपने को रोक नहीं पाया। उसने संजू से कहा- 'यार, आज बहुत अच्छी चीज मुझे मिली है, इसे मैं जमा नहीं करूंगा।' संजू ने उत्सुकता जताई, तो मन्ना ने अपनी जेब से बड़े जतन के साथ 'पर्क चॉकलेट का एक साबुत बार निकाला और सामने रख दिया।चॉकलेट का बार देखते ही संजू की बांछे खिल गईं, 'अरे ये तो प्रीति जिंटा वाली चॉकलेट है। ज्यादा चॉकलेट वाली एक्स्ट्रा लार्ज।'
मन्ना ने कहा- 'हां, ये ए.सी. फस्र्ट में मेरे को मिला।'
संजू ने कहा- 'चल, इसको आधा-आधा करके खा लेते हैं।'
मन्ना को यह बात अच्छी नहीं लगी, 'नहीं यार, मेरी छोटी बहन गुड्डी जब नायडू अंकल के यहां टी.वी. देखने जाती है तो लौटकर कहती है कि भइया, प्रीति जिंटा वाली चॉकलेट क्यों नहीं लाते? पापा भी कभी नहीं लाते। आज अचानक यह चॉकलेट मिली है, तो इसे मैं घर ले जाऊंगा। थोड़ी-सी खुद खाऊंगा और बाकी गुड्डी को दूंगा यार तू भी मेरे साथ चल। पहले गुड्डी को दिखाएंगे, फिर उसे खिलाएंगे बाद में हम दोनों भी थोड़ी-थोड़ी खा लेंगे।'
संजू तैश में आ गया, 'ऐसी बात है तो पहले सबके सामने सामान जमा करना होगा। तब तय होगा कि क्या किया जाए, और नहीं तो चुपचाप मुझे आधा दे और आधा तू अपने घर ले जा।'
मन्ना ने तड़पकर कहा- 'ठीक है, तू बता देगा तो बता दे! मैं भी बता दूंगा कि उस दिन सम्पूर्ण क्रांति एक्सप्रेस के ए.सी. में तुझे एक अंगूठी मिली थी जो तूने अपनी मां को दे दी थी। पिंटू उस्ताद को मैं भी यह बात बता दूंगा।'
इस धमकी का संजू पर तुरंत असर हुआ। उसका स्वर धीमा हो गया। उसने मनाने के स्वर में कहा- 'यार, तू मेरा अच्छा दोस्त है। मेरा मन कर रहा है चॉकलेट खाने का, चल आधे से थोड़ा कम दे दे।'
मन्ना ने चॉकलेट को पुन: अपनी जेब में रखते हुए कहा- 'नहीं यार, ये चॉकलेट मैं नहीं दूंगा। बोल तो रहा हूं घर चल, गुड्डी को चॉकलेट दिखाएंगे और आधा हिस्सा उसे देकर हम भी थोड़ी-थोड़ी खा लेंगे।'
लेकिन संजू का मन फिर भी नहीं मान रहा था। बार-बार उसे लग रहा था जैसे प्रीति जिंटा ने 'पर्क' की वह बड़ी चॉकलेट (एक्स्ट्रा लार्ज) मन्ना की जेब में छिपा दी है। उसके मुंह में चॉकलेटी स्वाद का पानी लबालब भरता जा रहा है...।
मन्ना ने भी टीवी पर प्रीति जिंटा को चॉकलेट के साथ देखा है। मगर चॉकलेट इतनी खूबसूरत दिखती है, इस बात का अहसास उसे आज हुआ। उसने बड़ी मुश्किल से अपने मन पर काबू किया और संजू को भी रोका। उसे रह-रहकर गुडिय़ा की याद आने लगी। महीनों से वह गाहे-बगाहे एक्स्ट्रा लार्ज चॉकलेट की बात करती रही है। उसने पहले से ही कह रखा था कि वह वही चॉकलेट इस बार राखी में लेगी, लेकिन संयोग बनता ही नहीं है। एक साबुत एक्स्ट्रा लार्ज चॉकलेट 15 रुपये में आता है। इतना तो दिन भर की कमाई से नहीं निकलता।
पिंटू उस्ताद कभी-कभी बड़ों की तरह बात करता है। वह कहता है... 'ये सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। टीवी में दिखा-दिखाकर ये हमारा पैसा छीन लेते हैं। साली अठन्नी वाली चॉकलेट में और इसमें फर्क ही क्या है? उसे परदे पर प्रीति जिंटा खाती है, इसे हम खाते हैं। इतना ही फर्क है न'
मन्ना को पिंटू की बात समझ में नहीं आती। उसे बस गुड्डी का चेहरा याद आ जाता है। इसीलिए वह इस पर्क के पैकेट को स्वयं भी चार-छह बार जेब से निकालकर देख चुका है। गुड्डी के चेहरे की खुशी की कल्पना मात्र से उसे सिहरन-सी होती है। तभी एक तेज सीटी की आवाज से दोनों चौक जाते हैं...
हावड़ा राजधानी के आने का संकेत हो चुका है। प्लेटफार्म पर चहल-पहल बढ़ गई है। संजू के मन-मस्तिष्क में अभी भी चॉकलेट बार का बड़ा साइज तैर रहा है, 'साले, मन्ना की ऐसी तैसी! आधा चॉकलेट दे ही देता तो क्या हो जाता? पाई हुई चीज पर भी इतना इतराना! पूरा का पूरा साबुत चॉकलेट-बार दुकानों और टीवी के बाहर इतने करीब से पहली बार उसने देखा था। काश आधा हिस्सा मिल जाता तो...'
वे दोनों प्लेटफार्म के उल्टे हिस्से में दौड़ पड़े थे। शायद राजधानी में कोई बेहतर खाने का सामान हाथ लग जाए?
अचानक एक चीख सुनकर संजू के सोचने का क्रम टूट गया। लूप लाइन को उसने पार ही किया था कि उसकी नजर सामने जा पड़ी। पता नहीं कैसे मन्ना दो नम्बर प्लेटफार्म से खाली रैक वाली एक गाड़ी के नीचे आ गया था। पूरे डिब्बे उसकी देह पर से गुजर गये थे। ड्राइवर ने जब तक ट्रेन रोकी, तब तक किसी का ध्यान मन्ना की ओर नहीं गया। संजू कुछ देर के लिए सन्न रह गया था...।
दोनों लाइनों के बीच मन्ना का आधा शरीर कटकर अलग हो गया था। कमर के नीचे का हिस्सा बाहर की ओर पड़ा था। हाफपैंट का ऊपरी हिस्सा खून से भींग गया था।
अचानक संजू को जैसे कुछ याद हो आया। वह तेजी से मन्ना के कटे हुए जिस्म की ओर दौड़ा। कोई और वहां पहुंच पाता, इसके पहले संजू लाश के पास पहुंच गया। हड़बड़ी में मन्ना के चेहरे की ओर भी देखने की फुरसत नहीं थी उसे। उसने अन्दाज से मन्ना के हाफपैंट की उसी जेब में हाथ डाला जिसमें चॉकलेट बार रखी थी। एक झटके से उसने खींचकर चॉकलेट निकाली और सरपट प्लेटफार्म की ओर दौड़ गया...।

1 Comment:

राजेश उत्‍साही said...

परितोष चक्रवर्ती की यह तथाकथित कहानी पढ़कर ऐसा लगा जैसे उन्‍होंने अपनी किसी लम्‍बी कहानी या उपन्‍यास के लिए जो नोटस् लिए हैं वे प्रस्‍तुत कर दिए। हालांकि विषय अछूता है। अगर हमें इसे कहानी मान भी लें तो उसका अंत उन्‍होंने जिस तरह से किया है, वह सारे कथानक और उपजी संवदेना को एक झटके में नष्‍ट कर देता है। मेरे ख्‍याल से कहानी की सफलता इसी बात में थी कि वह पाठक के दिमाग में इन बच्‍चों के जीवन के बारे में सोचने का सबब बने। वे जब भी स्‍टेशन पर इन बच्‍चों को देखें उनके बारे में सोचें। लेकिन जो दुखांत है वह कहानी को याद रखने लायक ही नहीं छोड़ती। कायदे से कहानी को ' वे प्‍लेटफार्म की ओर दौड़ पड़े । शायद राजधानी में कुछ खाने का सामान हाथ लग जाए।' पर ही खत्‍म हो जाना चाहिए।

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