July 17, 2009

21वीं सदी के व्यंग्यकार

आना मिर्जा गालिब का जन्नत से हिन्दुस्तान
- विनोद शंकर शुक्ल
दिल्ली में पहले दिन ही मेरी तबियत घबराने लगी। आबादी की रेलमपेल, वाहनों के शोरगुल और कलकारखानों के धुएं ने दिल खट्टा कर दिया। मैंने आगरा जाने की ख्वाहिश जाहिर की। हवाई जहाज से मुझे आगरा पहुंचा दिया गया।
मिर्जा गालिब जन्नत से अपने पुराने जहान याने हिन्दुस्तान आए तो बेहद खुश थे, मगर हफ्तेभर में ही उनकी खुशी नौ दो ग्यारह हो गई। मौजूदा जहान और जमाना देखकर वे हैरत में रह गए, उन्होंने जमाने को लानत भेजी और तीन दिन में ही वतन लौट आए, वह वतन जो जन्नत के नाम से मशहूर है और अच्छे लोगों को मौत के बाद जिसकी नागरिकता नसीब होती है।
गालिब जैसे ही जन्नत से हवाई अड्डे पर उतरे, उन्हें पत्रकारों ने घेर लिया, मिर्जा ने बचने की लाख कोशिश की पर बच नहीं सके। पत्रकारों के बीच वे वैसे ही फंस गए, जैसे मक्खी मकड़ी में जाल में फंस जाती है, हार कर उन्होंने इंशा अल्लाह कहा और ये शेर उनके मुंह से निकल गया-
जर्नलिस्टों पर जोर नहीं, ये हैं वो आफत गालिब।
सामने पड़ जाए तो फिर जान बचाए न बनें ।।
पत्रकारों के पास प्रश्नों का पिटारा होता है। वीआईपी लोगों को देखते ही पिटारा खुल जाता है। सवालों के सांप धड़ाधड़ बाहर आने लगते हैं। इन पिटारों में अजीबो-गरीब सवाल होते हैं। जैसे मिस्टर प्रेसीडेंट आपको अण्डा पसंद है या आलू? मंत्रीजी  पहली बार सिगरेट आपने किस उम्र में पी थी? राज्यपाल महोदय, आप ब्याह करने घोड़ी पर चढ़कर गए थे या गाड़ी पर?
गालिब गिरफ्तार हो ही गए तो उन्होंने आत्म समर्पण करना ही उचित समझा। कहा- हजरत, बंदा हाजिर है। अल्लाताला भी आ जाए तो आपसे नहीं बच सकता! जो सलूक करना हो कीजिए।
शिकार के फंदे में आने से पत्रकार प्रसन्न हुए। सवाल का पहला गोला दैनिक 'हैवन हैराल्डÓ के प्रतिनिधि ने दागा- मिर्जा आप तो पन्द्रह दिनों के लिए हिन्दुस्तान गए थे? इतनी जल्दी कैसे लौट आए?
मिर्जा गालिब ने फिर ठण्डी श्वांस ली और कहा- 
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन।
बड़े बेआबरू होकर हिन्दुस्तां से हम निकले।।
गालिब को उखड़ा-उखड़ा देख पत्रकारों को हैरत हुई। 'अमरावती टाइम्स' के रिपोर्टर ने थोड़ा खीजकर कहा- अमां मिर्जा, आप अखबारनवीसों से मुखातिब हैं। मुशायरे में नहीं हैं, जो पूछ रहे हैं, उसका जवाब दीजिए।
साप्ताहिक 'जन्नत जहान' के ब्यूरो चीफ ने माईक गालिब के मुख के सामने कर दिया। पूछा- क्या हुआ हिन्दुस्तान में आपके साथ? क्या किसी ने पहचाना नहीं?
पाक्षिक 'पैराडाइज टुडे' के बुजुर्ग प्रतिनिधि ने व्यंग्य किया- हां भाई, जमीन के लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। वे भूल ही गए होंगे कि उनके देश में गालिब नाम का कोई शायर भी हुआ था?
गालिब ने इंकार किया। कहा, वे मुझे नहीं भूले। यह जरूर है कि आज के वजीरेआला और रियासतों के सदरों को वे भूल जाते हैं। कारण यह है कि वे उतनी ही जल्दी बदलते हैं, जितनी जल्दी शाम के आसमान के रंग!
रोजनामचा 'स्वर्ग का सूरज' के संवाददाता ने पूछा- तब आप मुशायरे में हूट हुए होंगे? आजकल अच्छी शायरी वही है, जो हूट होती है!
गालिब ने इससे भी इंकार किया, कहा- मेरी शायरी तो खूब जमीं, इरशाद मुकर्रर इरशाद के शोर से कान में घाव हो गए।
पत्रकारों को माजरा समझ में नहीं आया। दैनिक 'स्वर्गलोक' के प्रतिनिधि ने रोष भरे स्वर में पूछा- मिर्जा पहेलियां मत बुझाइए, आप पर जो गुजरी है, साफ-साफ बताइए।
गालिब ने इशारे से पत्रकारों को शांत रहने कहा फिर आहिस्ता-आहिस्ता गर्दन हिलाते हुए बोले- 'उल्टे-सीधे कयास लगाने में आप लोगों का जवाब नहीं। हकीकत यह है नीचे की दुनिया में अब आदमी नहीं रहते। दीवारें ही दीवारें हैं।'
इस जवाब पर एक साथ कई संवाददाता भड़क गए बोले- फिर पहेली? मिर्जा रात की चढ़ी क्या अब तक उतरी नहीं?
गालिब फीकी हंसी हंसे। बोले-अजीब बात है, जिसे मैं भूलना चाहता हूं, आप उसे कुरेद रहे हैं। खैर! आप चाहते हैं तो मैं अपने जख्मों की पट्टियां खोल देता हूं।
अखबारनवीसों में किसी बे्रकिंग न्यूज की उम्मीद जागी। वे चौकन्ने हो गए। ब्रेकिंग न्यूज अखबारों के लिए आक्सीजन होती है। गालिब ने एक-एक कर जख्म से पट्टियां उतारनी शुरु की। बोले- आपको तो पता ही है कि जन्नत और हिन्दोस्तां के अदीबों की अदला-बदली की स्कीम के तहत मैं हिन्दुस्तान गया था।
टीवी चैनल 'शबिस्तान' की युवा रिपोर्टर कुमारी उर्वशी ने कहा - हां मालूम है। जमीन के अदीब (साहित्यकार) यहां के अदब (साहित्य) का जायजा लेना चाहते थे और जन्नत के वहां का।
गालिब बोले- वल्लाह! जानकारी के सदके!
 मोहतरमा खूब तरक्की करोगी। अल्लाह तुम्हें सलामत रखे। हां तो हिन्दुस्तान रवाना होते वक्त मैं बहुत खुश था, अपना वतन दोबारा देखने की बहुत आरजू थी। आगरे की उन गलियों को देखना चाहता था, जहां मेरा बचपन गुजरा था। दिल्ली की उन सड़कों पर घूमना चाहता था, जहां मेरी शायरी परवान चढ़ी, अपनी खस्ताहाली के वे दिन याद कर गुदगुदी महसूस करना चाहता था, जब कर्ज लेकर मय पिया करता था। वो वाकया याद करना चाहता था, जब गदर के जमाने में अंग्रेजों ने मेरी पेंशन जब्त कर ली थी। लेकिन ... मिर्जा का गला रूंध गया, वाक्य अधूरा छोड़े वे दर्द की किसी गहरी खाड़ी में गोते लगाने लगे।
लेकिन ... लेकिन क्या? तमाम पत्रकारों की उत्सुकता फव्वारे की तरह एक साथ फूट पड़ी। सनसनीखेज स्टोरी की संभावना नजर आ रही थी, जो अखबारों की पहली पसंद है।
गालिब ने सिलसिलेवार बताना शुरु किया -
दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर उतरते ही मुझे फूलमालाओं से लाद दिया गया। 'गालिब जिंदाबाद...!  शायरे आजम जिंदाबाद! के नारे चारों तरफ गुंजने लगे। दिल्ली ने मुझे जैसे सिर पर बिठा लिया। एक जुलूस की शक्ल में मैं बाजे-गाजे के साथ बाहर लाया गया। पूरी दिल्ली मुझे देखने उमड़ पड़ी थी। जहां तक नजर जाती थी, मर्द औरतें और बच्चे दिखाई देते थे। खुशी हुई कि लोग मुझे भुले नहीं हैं, आंखें छलछला उठीं, पहली बार अल्लाह का शुक्रिया अदा करने की इच्छा हुई।'
परंतु तभी मैंने देखा, कुछ लोग पाकिस्तान जिंदाबाद... गालिब हमारा है का नारा लगा रहे थे और पुलिस उन्हें पीछे ठेल रही थी।
मेरे साथ खुली जीप पर स्वागत समिति के सदस्य सवार थे। मैंने पूछा-पाकिस्तान क्या बला है? और ये लोग चाहते क्या हैं।
सदर ने जवाब दिया- हिन्दुस्तान का बंटवारा हो चुका है। पाकिस्तान देश के दूसरे टुकड़े का नाम है, जमीन की तरह अदब और आर्ट को भी दोनों मुल्कों ने बांट लिया है। गायिका सुरैया हमारे हिस्से में आई तो नूरजहां उनके। फिराक को हमने अपने पास रखा, जोश मुलिहाबादी उन्हें दे दिया। ख्वाजा अहमद अब्बास को यहीं रहने दिया। मंटो (सआदत हसन) जाने लगा तो जाने दिया। दिल्ली हमारी हुई तो लाहौर उनका। अब पाकिस्तान के कुछ लोग आप पर अपना हक जताने आए हैं। वे आपको पाकिस्तान ले जाना चाहते हैं।
मुझे बड़ी हैरत हुई। मुल्क के टुकड़े की बात सुनकर मेरा दिल भी अंदर से चटक गया। वतन आने की खुशी काफूर हो गई। मैंने कहा- बहुत अफसोस की बात है! और अदब और आर्ट का बटवारा तो बेहद अफसोसजनक है। अदब और आर्ट तो हवा और पानी की तरह सबके होते हैं। उन्हें सूबाई हदों में कैद नहीं किया जा सकता।
स्वागत समिति के सदर ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने यह जरूर कहा- मिर्जा आप हिन्दुस्तान के हैं और आपको हमसे कोई नहीं छीन सकता। प्रेस कांफ्रेंस में आप साफ कह दीजिएगा कि आप किसी पाकिस्तान-वाकिस्तान को नहीं जानते। हिन्दुस्तान आपका वतन था, है और रहेगा।
शाम को मुझे सियासी लीडरों से मिलाया गया, एक लीडर जो आर्ट और कल्चर के वजीर भी थे, बोले- पाकिस्तानी डेलीगेशन आपसे मिलना चाहता था। मैंने मना कर दिया, मिर्जा साहिब यदि आप यह बयान दे दें कि आप हिन्दुस्तान को अपना मुल्क मानते हैं तो भारत सरकार आपका एक आलीशान स्मारक बनवाएगी। हम देशी और विदेशी भाषाओं में आपकी शायरी का तर्जुमा करने का जिम्मा भी उठाएंगे। आपकी जयंती पर अवकाश घोषित करेंगे।
मैं उठ खड़ा हुआ। मैंने गुस्से में कहा- जनाब, हिन्दुस्तान तो मेरा मुल्क है ही परंतु मेरे नाम पर सियासत बंद कीजिए,     शायर किसी एक मुल्क की जायदाद नहीं होता     कि उसे मकान और दुकान और नदी के पानी की तरह बांट लिया जाए, उसका कलाम पूरी दुनिया की मिल्कियत होता है...!
रात दो बजे कुछ लोगों ने आकर मेरे होटल के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुलते ही वे दबे पांव अंदर आए और मेरे कान में फुसफुसाकर बोले- हम पाक डेलीगेशन के लोग हैं। मुश्किल से आप तक पहुंचे हैं। बाहर पुलिस का सख्त पहरा है। आप जल्दी से इस कागज पर दस्तखत कर दीजिए।
मैंने      
पूछा-इसमें क्या लिखा है?
वे बोले -
यही कि
आप     पाकिस्तान को अपना मुल्क मानते हैं। भारत सरकार ने जबरदस्ती आपको नजरबंद कर रखा है।
मैंने नाराजगी से उत्तर दिया- मुझे किसी ने नजरबंद नहीं किया और वह सारा जहां मेरा मुल्क है, जहां तक मेरी आवाज पहुंचती है। आप लोग जा सकते हैं।
वे बोले- हम इस्लामाबाद विश्वविद्यालय का नाम आपके नाम पर रख देंगे। आप सिर्फ दस्तखत कर दीजिए।
मैंने कहा- मैं दस्तखत नहीं करुंगा। आप मेरी बेइज्जती कर रहे हैं।
वे मेरी ऊंची आवाज से घबराए बोले- आहिस्ता बोलिए। हम पकड़े जाएंगे। चलिए दस्तखत कीजिए। हम जकोबाबाद का नाम गालिबाबाद रखने का वचन देते हैं।
मैंने गुस्से से कहा- आप निकलते हैं या नहीं ...?
उन्होंने मेरे हाथ में पेन थमाते हुए कहा- मान जाइए, आपको शायरे पाकिस्तान कहा जाएगा। हम आपकी इस्लामाबाद में पचास फीट ऊं ची स्टेच्यू लगाएंगे। अदब के सबसे ऊंचे गालिब एवार्ड का भी ऐलान करेंगे।
बदतमीजी की हद हो गई थी!  मैंने जोर से आवाज लगाई- बाहर कोई है... वे घबराकर बाहर जाते हुए बड़बड़ाए- कश्मीर की तरह इस मसले को भी हम यूएनओ में ले जाएंगे। गालिब पाकिस्तान का है।
मैंने हमेशा हिन्दु-मुस्लिम एकता की हिमायत की थी। मेरे सैकड़ों खत इसके गवाह है। पर अब दोनों कौमों के बीच दीवारें ही दीवारें है। धर्म की दीवारें हैं, जाति-पाति की दीवारें हैं, ऊंच-नीच की दीवारें हैं, भाषा की दीवारें हैं, सूबों की दीवारें हैं, कठमुल्लापन की दीवारें हैं- जहां देखों दीवारें ही दीवारें दिखाई देती है। दीन के साथ दोनों के दौलतखाने भी अलग- अलग हैं। कोई हिन्दू मोहल्ला है तो कोई मुस्लिम। वोट भी वहां हिन्दु और मुस्लिम हो गए हैं, दोनों कौमें वहां या तो अपने-अपने आरक्षण के लफड़े में पड़ी रहती हैं या फिर मंदिर मस्जिद के झगड़ें में। दंगे दस्तखत बिठाने जैसी मामूली चीज हो गए हैं। एक मजहब का व्यक्ति दूसरे के सामने छींक भी दे तो दंगे भड़के उठते हैं। लोगों ने मजहब के आधार पर खुदा को बांट लिया है। जाति के आधार पर महापुरुषों को बांट लिया है। राजनीति के आधार पर नेताओं को बांट लिया है। गांधी किसी के हैं, सुभाष किसी के, जिन्ना किसी के। दोनों कौमों के बीच मोहब्बत के चश्मे हुआ करते थे, वो पूरी तरह सूख गए हैं।
दिल्ली में पहले दिन ही मेरी तबियत घबराने लगी। आबादी की रेलमपेल, वाहनों के शोरगुल और कलकारखानों के धुएं ने दिल खट्टा कर दिया। मैंने आगरा जाने की ख्वाहिश जाहिर की। हवाई जहाज से मुझे आगरा पहुंचा दिया गया। दो दिन के प्रवास में ही अफसरों ने मुझ पर अस्सी हजार का खर्च बताया जबकि वास्तविक खर्च महज सात हजार रुपए हुआ था। सरकार को बताया कि तीस हजार की मैंने दारु ही पी डाली। बाकी रकम होटल, हवाई जहाज और घूमने-फिरने की मद में डाल दी गई। भ्रष्टाचार के इस भीषण रूप ने मुझे जड़ से हिला दिया।
आगरे में दूसरे दिन पत्रकारों से मेरी बातचीत रखी गई। पत्रकार वार्ता शुरु ही हुई थी कि न जाने कहां से कुछ हथियारबंद लोग आ टपके और मुझे अपने साथ घसीटने लगे। फिर फौरन ही वैसा ही एक दूसरा गिरोह पैदा हो गया। दोनों के सरगनाओं ने मेरा एक-एक हाथ पकड़ लिया। एक कहता हिन्दुस्तान तो दूसरा कहता पाकिस्तान, उनकी इस खींचम-खींच से दर्द के मारे मैं तडफ़ड़ाने लगा। किन्तु वे जुनून में थे। हिन्दुस्तान- पाकिस्तान के झगड़े में मैं अपने दोनों बाजुओं से हाथ धो बैठा। उन्होंने मेरी दोनों बाजू उखाड़ लिए। फिर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया। बोले कि बाजुओं के आधार पर ही वे अपने-अपने देश में गालिब का भव्य स्मारक बनाएंगे।
इतने बयान के बाद कंधा हिलाकर गालिब ने अपना चोगा नीचे गिरा दिया। पत्रकारों ने देखा गालिब के दोनों हाथ कंधे से गायब थे। कुछ पत्रकारों के मुंह से उफ निकला और कुछ के कैमरे से क्लिक की आवाज!
एक पत्रकार ने चोगा उठाकर फिर गालिब के कंधे पर रख दिया। उन्हें ढांढस बंधाया तो उनकी आंखें छलछला आई। उन्होंने बहुत गमगीन होकर कहा -
दिल ही तो है न संगो- खिस्त दर्द से भर न आए क्यूं।
रोएंगे हम हजार बार कोई हमें सताए क्यूं।।

सम्पर्क : मेध मार्केट के सामने, बुढ़ापारा, रायपुर
मोबाइल : 9406030964
व्यंग्यकार के बारे में ...
विनोद शंकर शुक्ल व्यंग्य के एक वरिष्ठ लेखक हैं। वे अपने को व्यंग्य लिखने में हमेशा व्यस्त रखते हैं। व्यंग्य लिखना, व्यंग्य पढऩा और व्यंग्य की गोष्ठियों में शिरकत करना, व्यंग्य पर बेबाक बातें करना व्यंग्य रचना का अच्छे से पाठ करना ये सब उन्हें बड़ा प्रिय हैै। विनोद शंकर शुक्ल जिस समय सक्रिय हुए थे उस समय उनके आसपास उनके समकालीन लेखकों की एक अच्छी चौकड़ी बन गई थी और ये सभी अपने समय के प्रसिद्घ अखबारों में व्यंग्य के कॉलम लिख रहे थे। इनमें लतीफ घोंघी, प्रभाकर चौबे, त्रिभुवन पाण्डेय शामिल थे। इन चारों ने मिलकर व्यंग्य लेखन के लिए एक अच्छा वातावरण बनाया और व्यंग्य की सबसे उर्जावान धरती मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ को समृद्घ किया। विनोद शंकर शुक्ल को सामयिक घटनाएं बड़ी प्रेरित करती हैं, वे तत्काल ही ऐसे प्रेरक विषयों पर व्यंग्य लिख मारते हैं। उनके पास खड़ी बोली की एक मोहक भाषा है। वे उन व्यंग्यकारों में से हैं जो व्यंग्य में एक सूत्रधार पैदा कर उनसे वार्ता करते हैं। उनकी यह वार्ता चटखारेपन ली हुई और बाल की खाल उधेड़ती हुई आगे बढ़ती है और तब उनकी रचना पूरी होती है। यहां प्रस्तुत रचना में उनकी इस तरह की कोशिश को देखा जा सकता है। 21वीं सदी के व्यंग्यकार  की यह चौथी कड़ी है,  इस कड़ी में  'आना मिर्जा गालिब का जन्नत से हिन्दुस्तान' में लेखक ने समाज में बढ़ रही साम्प्रादायिकता पर चिन्ता व्यक्त की है। साथ ही देश में हर कहीं बन रहे और बढ़ रहे भारत-पाकिस्तान मानसिकता को भी उन्होंने रेखांकित किया है। लेखकों और शायरों को भी किसी भौगोलिक दुनियां में बांटने के लिए जो सरकारी-गैरसरकारी उपक्रम चलाए जाते हैं यहां उनका अच्छा उपहास उड़ाया गया है।
-विनोद साव

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