February 25, 2009

अपनी जिम्मेदारी से मुंह न मोड़ें

- रश्मि वर्मा

'अस्पताल' अपने आप में कष्टप्रद शब्द है उस पर किसी अपने को लेकर जाना और वहां इलाज के लिए इधर से उधर भटकना, डॉक्टर के इंतजार में आते जाते मरीजों को देखना और इन सबके साथ अस्पताल के आस- पास फैली गंदीगी तो जैसे अस्पताल की पहचान होती है। अस्पताल में प्रवेश करते ही मरीजों की लाईन और दर्द को देखकर घबराहट वैसे ही बढ़ जाती है जो अच्छे भले स्वस्थ इंसान को बीमार कर देता है।

मुझे समझ नहीं आता हमारे देश में अस्पताल के माहौल को इतना मनहूसियत भरा बना कर क्यों रखा जाता है। प्राईवेट क्लिनिक तुलनात्मक रुप से जरुर साफ नजर आते हैं वहां के वातावरण को भी कुछ हल्का करने की कोशिश की जाती है। जहां इंतजार में बैठे मरीजों के लिए कुछ पत्रिकाएं होती हैं। टीवी लगाकर भी मरीज के इन कष्टप्रद क्षणों को कम करने की कोशिश की जाती है। कई जगह मधुर संगीत भी सुनाई देने लगा है। यदि सभी अस्पतालों में सफाई और मन को शांत रखने वाला वातावरण मिले तो फिर कहना ही क्या? मरीज वहां से आधा स्वस्थ होकर निकलेगा और आधा दवाई खाने के बाद ठीक हो जाएगा।

परंतु अस्पताल के माहौल और व्यवस्था को लेकर जिस तरह के अनुभवों से मैं गुजरी हूं आप भी अनुभव कर चुके होंगे। एक बार मैं अपने परिवार के बीमार सदस्य को लेकर अस्पताल पहुंची। नंबर लगा कर मैं अपनी बारी के आने का इंतजार करने लगी, मेरे आगे अभी दो मरीज और थे। मैं कुछ समझ पाती कि अचानक एक वार्डबॉय के साथ दो सज्जन डॉक्टर के केबिन में धड़धड़ाते हुए घुस गए। गुस्सा तो बहुत आया कि यह क्या बात हुई हम घंटों लाइन लगाए बैठे हैं और ये वीआईपी आते ही अंदर चले गए। लेकिन मैं अपना गुस्सा पी गई, क्योंकि मेरे साथ एक बीमार व्यक्ति था। ऐसे माहौल में यदि मैं लडऩे लगती या गुस्सा जाहिर करती तो उस बीमार की मन:स्थिति क्या होती। सो चुपचाप बैठी रही। बाद में जब पता चलता है कि डॉक्टर की केबिन में इस तरह अंदर जाने वाला, नगर का प्रभावशाली व्यक्ति है या डॉक्टर का परिचित अथवा अस्पताल को मोटी रकम दान देने वाला, तब मन होता कि उनसे जाकर पूछूं- क्या आपकी तकलीफ हमारी तकलीफ से ज्यादा है?

लेकिन अस्पताल का दर्द सिर्फ इतना ही नहीं होता। इस लम्बे इंतजार में और भी कई तरह के अनुभवों से गुजरना होता है। इन दिनों हर रोज एक नया अस्पताल खुल रहा है तो क्या हुआ, उससे दोगुनी गति से मरीजों की संख्या भी तो बढ़ती ही जा रही है। जब भी अस्पताल जाओ खासकर सरकारी अस्पताल वहां आस-पास इतनी अधिक गंदगी होती है कि सांस लेना दूभर होता है। अस्पताल का वातावरण घुटन भरा होता है कि यह सब अच्छे भले इंसान को बीमार कर देता है।

प्रश्न यह उठता है कि ये गंदगी करने वाले होते कौन हैं, हम ही ना? अस्पताल मेनेजमेंट सफाई की व्यवस्था नहीं करवाता होगा ऐसा तो हो नहीं सकता, और जहां ऐसा नहीं होता तो इसके लिए भी वहां शिकायत की जा सकती है। पर अस्पताल की सफाई क्या केवल अस्पताल मैनेजमेंट की ही जिम्मेदारी है? क्या इस सफाई में हम अपना योगदान नहीं कर सकते? क्या यह हमारी भी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अस्पताल को स्वच्छ रख सकें। हम यह सोच कर क्यों कुछ नहीं करते कि हमें क्या करना है सिर्फ एक दिन ही तो यहां आना है उसके लिए कौन मुसीबत मोल ले। यही वजह है कि बहुत कुछ गलत होते हुए देखकर भी हम अनदेखा कर जाते हैं।

इसी तरह डॉक्टर कब मिलेंगे, कौन से नंबर के कमरे में मिलेंगे जैसी सतही जानकारी न मिलने के कारण भी मरीज को लिए- लिए इधर से उधर और कभी- कभी कई- कई मंजिल तक ऊपर से नीचे होते रहना पड़ता है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन की पूछताछ वाली व्यवस्था जिम्मेदार होती है। हम क्यों नहीं इन सबकी शिकायत करते।

जिम्मेदारी से भागना तो समस्या का हल नहीं है। हमें पहल तो करनी ही होगी, कि जब डॉक्टर से मिलने कोई वीआईपी लाईन तोड़े तो खड़े होकर उनसे कह सकें कि हम दो घंटे से बैठे हैं या तो आप भी लाईन में लग जाईए या फिर डॉक्टर से अलग से समय लेकर आईए, जनता के समय में आकर उनकी बद्दुआएं क्यों लेते हैं। सीधे डॉक्टर के पास जाकर भी इसकी शिकायत करें।

कहने का तात्पर्य यह कि सिर्फ गुस्सा करने से काम नहीं बनने वाला। उस गुस्से को खतम करने के लिए आगे आना होगा ताकि कोई लम्बी लाइन तोडक़र आपके समय को छीनने की कोशिश न करे। तो आईए जाग जाएं और इस गुस्से को जागरुकता में बदल लें।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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