December 13, 2008

जिम्मेदार मीडिया का गढ़ छत्तीसगढ़

- जयराम दास



खारून में भले ही काफी पानी न बहा हो लेकिन रायपुर तो मैट्रो जनित रफ्तार से चल पड़ा है । साथ ही शहर का मीडिया भी उसी रफ्तार से कदमताल करने लगा, तेजी से विकसित होते इस अवसरों के शहर के साथ।


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विचारधारा के प्रति अति आग्रह, संगठनों के प्रेस विज्ञप्ति पर अत्यधिक निर्भरता, कस्बायी संस्करणों की बाढ़ के बावजूद गांव-मड़ई की खबरों का कम होते जाना दुखद हैं जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।


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बात 25 जुलाई 2004 की है। पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त एक युवक एक राजनीतिक पार्टी के मीडिया में काम करने का नियुक्ति पत्र लिये रायपुर स्टेशन पर उतरा। साथ में एक झोला लिए, एक ऐसा झोला जिसमें निम्न मध्य वर्गीय परिवार के सपने बंद थे और थे दो जोड़ी कपड़े तथा अपने लिखे और प्रकाशित कुछ आलेख। अपने इसी बैसाखी की दौलत वो दिल्ली से आकर एक नये राज्य की नयी राजधानी और नये लोगों के बीच पांव जमाने की फिराक में था।
कुछ इस तरह की करने चला था पार समंदर को आज वो, लेकिन वो हाथ में लिए कागज की नाव था।

उस समय का रायपुर एक कस्बेनुमा उंघता-अनमना अलसाया सा शहर लेकिन जिस पर जल्द से जल्द राजधानी जैसा बन जाने का भूत सवार था, तो उस युवक को भी मीडिया पर्सन बन जाने का। आज जब इस अनजाने से युवक की आंखों से रायपुर को देखा जाय तो अद्भुत अलौकिक चमत्कारिक परिवर्तनों का शहर जान पड़ता है यह तो। तब से खारून में भले ही काफी पानी न बहा हो लेकिन रायपुर तो मैट्रो जनित रफ्तार से चल पड़ा है। साथ ही शहर का मीडिया भी उसी रफ्तार से कदमताल करने लगा, तेजी से विकसित होते इस अवसरों के शहर के साथ। कहते हैं हर क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। निश्चय ही शहर के इस विकास के समानुपाती रूप में ही अच्छी और बुरी चीजें भी मीडिया में साफ-साफ दिखने लगीं।

यदि अच्छी चीजों की बात करें तो प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद के विरोध में-कुछेक अपवादों को छोडक़र-जिस तरह का रूख यहां के अखबारों ने दिखाया उसकी जितनी तारीफ की जाय वह कम है। कम से कम कुछ संवेदनशील मुद्दे पर तो इसने राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया को भी आईना दिखाया है। आपको याद होगा जब देश के सारे इलेक्ट्रानिक चैनल आरूषि को न्याय दिलाने में व्यस्त थे। जिस समय सारे समाचार माध्यम उस पीडि़त परिवार के हर रात लेखा जोखा मांगने की ''पुनीत'' जिम्मेदारी निभा रहा था तब रायपुर अपने 26 लाख बस्तरिया भाई-बहनों को नक्सली ब्लैक आउट से मुक्त करने के प्रयास में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था।

यह भी याद रखने योग्य है कि जब कथित मराठी-राज ठाकरे मुम्बई को अपनी बपौती साबित करने की जद्दोजहद में लगा था और बार-बार फटकारे जाने के बाद भी हिंदी मीडिया स्थानीय टीवी चैनलों से फुटेज ले-ले कर उसे प्रसारित करने में व्यस्त था वहां रायपुर का एक अखबार धमतरी निवासी एक दूसरे ठाकरे, राजू ठाकरे की खबर मुख्यता से प्रकाशित कर रहा था। इस ठाकरे ने रंभा इंगोले नाम की एक वृद्धा की मृत्यु हो जाने पर उन्हें अपनी मां बनाकर उनका अंतिम संस्कार एवं श्राद्ध कर्म अपने हाथों से किया था। तो ये जो राज ठाकरे और राजू ठाकरे में फर्क है, आदमीयत और भलमनसाहत का। कमोवेश रायपुर के समाचार माध्यम ने कथित राष्ट्रीय मीडिया से वही फर्क कायम रखा है।

यहां के मीडिया की एक और सबसे बड़ी सफलता जो कही जाएगी वो है छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का सम्मान दिलवाना। कोई लाख कुछ कह ले लेकिन वह कथित आंदोलन केवल और केवल अखबारों के माध्यम से ही चलाया गया। बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मुठ्ठीभर बुद्धिजीवियों द्वारा शुरू किये गये उस दोस्ताना संघर्ष को, मुखर लेकिन मूक जनभावनाओं की नब्ज जिस तरह से अखबार ने पकड़ी और जितनी जल्दी सरकार का ध्यान आकृष्ट करने में सफल रही, वैसी सफलता तो टीआरपीवादी मीडिया सपने में भी नहीं सोच सकती है। इसके अलावे जब-जब किसी समूह विशेष या कुछ मीडिया द्वारा प्रदेश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया गया, छत्तीसगढ़ ने उसे मुंहतोड़ जवाब देने में पल भर की देरी नहीं की। याद कीजिए एक कुंठित लेखक ने दिल्ली से प्रकाशित एक साहित्यिक पत्रिका में बस्तर- बालाओं का अपमान किया था, सारे के सारे अखबारों ने एक स्वर में उस असभ्य पत्रिका की बखिया उधेड़ कर रख दी थी। या एक खूबसूरत, लोकप्रिय नेत्री को ''स्टोरी'' के माध्यम से बेइज्जत करने का प्रयास एक राष्ट्रीय चैनल के स्थानीय संवाददाता द्वारा किया गया तो उसे भी दुत्कारने में स्तंभ लेखकों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। एक अखबार ने उसके कैमरे की तुलना बंदर के हाथ में उस्तरा तक से कर दी थी।

महान ऐतिहासिक आदिवासी आंदोलन सलवा जुडूम की चर्चा किये बिना मीडिया विमर्श संभव ही नहीं है। इस महान आंदोलन का दुष्प्रचार जिस तरह जाने या अनजाने में गैर छत्तीसगढ़ी मीडिया ने किया है, नक्शा में देखकर भी मुश्किल से एर्राबोर और रानीबोदली को पहचान सकने की अक्षमता के बावजूद दिल्ली में रहने वाले भाई लोगों ने सुनी-सुनायी बात या दुष्प्रचार के आधार पर जितनी भड़ास निकाली, जिस तरह से बिना मतलब प्रदेश को बदनाम किया, सैकड़ों आदिवासियों के मारे जाने, लाखों गरीबों के अंधकार में झोंक देने पर ऊफ तक न करने वाले, नोटिस तक नहीं लेने वाले भाई लोगों ने जिस तरह किसी नक्सली की सामान्य गिरफ्तारी पर भी हायतौबा मचायी उसके लिए इतिहास उन लोगों को कभी माफ नहीं करेगा। कई बार तो इस मामले में ऐसी हास्यास्पद, लज्जास्पद स्थिति आयी कि एक ही अखबार में एक ही दिन में जिस घटना की स्थानीय संपादक द्वारा तारीफ की गई उसी अखबार के दूसरे पन्ने पर दिल्ली के भाई लोगों द्वारा उसी समाचार की भत्र्सना भी की गई।
लब्बोलुबाब यह कि यहां के समाचार माध्यमों ने अपने सामाजिक सरोकारों का परिचय देकर अपनी जिम्मेदार रिपोर्टिंग द्वारा निश्चय ही सप्रे जी की परंपरा को आगे ही बढ़ाया है। उनकी पुनीत आत्मा को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है। साथ ही रायपुर द्वारा दिल्ली को आईना दिखाने का काम भी किया गया है। बावजूद इसके कुछ विसंगतियां है। खासकर विज्ञापन और समाचार में फासला निरंतर कम होते जाना, या समाचारों का संबंध डायरेक्टली विज्ञापनों से जोड़ देना, आंख मूंदकर विरोध या समर्थन, विचारधारा के प्रति अति आग्रह, संगठनों के प्रेस विज्ञप्ति पर अत्यधिक निर्भरता, कस्बायी संस्करणों की बाढ़ के बावजूद गांव-मड़ई की खबरों का कम होते जाना दुखद हैं जिसपर ध्यान देने की ज़रूरत है।
खैर, जब उपरोक्त वर्णित वह युवक अपनी झोला उठाये किसी अन्य पड़ाव तक जाने को उद्यत होगा तो उस थैले में ये ढेर सारी अच्छी यादें भी होंगी और होगा इस समूचे यात्रा में गिलहरी समान स्वयं के भी भागीदार होने का आत्मसंतोष भी।

2 Comments:

anjeev pandey said...

भाई जयराम दास जी ने जिम्मेदार मीडिया का गढ़ छत्तीसगढ़ नामक आलेख में राजधानी में पत्रकारिता के सकारात्मक पक्ष को बखूबी प्रस्तुत किया है। कई वर्ष नागपुर में पत्रकारिता करने के बाद जब मैं रायपुर आया था तो कई मुद्दों पर स्थानीय मीडिया से मेरा विरोध रहा। इसी क्रम में नक्सलवाद के मुद्दे पर भी मेरा पत्रकारिता का मन सदैव उद्वेलित रहा है। मुझे अच्छी तरह याद है कि राजधानी के कुछ प्रमुख समाचार पत्र हर उस खबर को प्रमुखता देते थे जिसे अंग्रेजी में प्रो-नक्सली कहा जा सकता है। इस अफवाह युद्ध के साथ हम लोगों ने संघर्ष का बिगुल फूंका और कुछ ही दिनों में समूची मीडिया का स्वर बदल गया। उस समय ऐसा लगा था कि हर सही कार्य के लिए ईश्वर मदद करता है। खैर, सलवा जुडूम और नक्सलवाद के मुद्दे पर राजधानी की मीडिया जगत का न्यायपरक नजरिया वाकई काबिलेतारीफ है। अब यह बात अलग है कि इस मानसिक समर्थन के बाद सरकार इस समस्या के समूल उच्चाटन के लिए क्या कदम उठाती है।
-अंजीव पांडेय
सिटी चीफ, जनसत्ता, रायपुर

FAFADIH said...

राजधानी बनने के साथ मध्यप्रदेश का रायपुर छत्तीसगढ़ का रायपुर हो गया है. भोपाल और दिल्ली दोनों शहरों में रहने का अवसर मिला है इसलिए बदलते समय के साथ बदलते मीडिया का स्वरुप भी देखने को मिला है. अच्छा मीडिया भी है और बुरा भी. दोनों एक साथ दिखाते तो और भी अच्छा लगता पर उम्मीद है आगे इस बारे में आपकी कलम बोलेगी.

- तेजपाल सिंह हंसपाल, फाफाडीह नाका, रायपुर (छत्तीसगढ़)

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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