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Dec 10, 2014

काठ का सपना

काठ का सपना

गजानन माधव मुक्तिबोध

 भरी, धुआँती मैली आग जो मन में है और कभी-कभी सुनहली आँच भी देती है। पूरा शनिश्चरी रूप। वे एक बालिका के पिता हैंऔर वह बालिका एक घर के बरामदे की गली में निकली मुँडेर पर बैठी हैअपने पिता को देखती हुई। उन्हें देख उसके दुबले पीले चेहरे पर मुस्कराहट खिलती है। और वह अपने दोनों हाथ आगे कर देती है जिससे कि उसके काका उसे अपने कंधों पर ले लें।
उसके पिता अपनी बालिकाओं को देख प्रसन्न नहीं होते हैं। विक्षुब्ध हो जाता है उनका मन। नन्हीं बालिका सरोज का पीला उतरा चेहरातन में फटा हुआ सिर्फ एक 'फ्राक’ और उसके दुबले हाथ उन्हें बालिका के प्रति अपने कर्त्तव्य की याद दिलाते हैंऐसे कर्त्तव्य की जिसे वे पूरा नहीं कर सकेकर भी नहीं सकेगेंनहीं कर सकते थे। अपनी अक्षमता के बोध से ये चिढ़ जाते हैं। और वे उस नन्हीं बालिका को डाँट कर पूछते हैं, 'यहाँ क्यों बैठी है अंदर क्यों नहीं जाती?’
बालिका सरोजगंभीरवृद्ध दार्शनिक-सी बैठी रहती है। अपने क्रोध पर पिता को लज्जा आती है। उनका मन गलने लगता है। उनके हृदय में बच्ची के प्रति प्यार उमड़ता है। वे उसे अपने कंधे पर ले लेते हैं। ऊँचे उठने का सुख अनुभव कर बच्ची मुस्करा उठती है।
पिता बच्ची को लिए घर में प्रवेश करते हैं तो एक ठंडा सूनामटियाली बास-भरा अँधेरा प्रस्तुत होता हैपिछवाड़े के अंतिम छोर में आसमान की नीलाई का एक छोटा चौकोर टुकड़ा खड़ा हुआ है! वह दरवाजा है।
घर में कोई नहीं है। सिर्फ दो साँसें हैं,
एक पिता की। दूसरी पुत्री की।
वे एक अँधेरे कोने में बैठ जाते हैं और उनके घुटनों में वह बालिका है। उसका चेहरा पिता को दिखाई नहीं देता। फिर भी वह पूरा-का-पूरा महसूस होता है। वे चुपचाप उसके गाल पर हाथ फेरते जाते हैं और सोचते हैं कि वह लड़की मेरे समान ही धैर्यवान् हैसब कुछ पहचानती है। बड़ी प्यारी लड़की है। उन्हें लगता है कि उनकी आँखे तर हो रही हैं।
एकाएक खयाल आता है कि अगर घर में बड़ा आईना होता तो अच्छा होताअपनी बड़ी आँसू-भरी सूरत की बदसूरती देख लेते। उन्हें उमर रसीदा आदमियों का रोना अच्छा नहीं लगता।
सामनेअँधेरे मेंरंग-बिरंगी पर धुँधली आकृतियाँ तैर जाती हैं। सुंदर चेहरेवाली एक लड़की हैवह उनकी सरोज है! नारंगी साड़ी हैसुनहली किनारी है सफेद ब्लाउज है! गले में हार है। हाथों में रंग-बिरंगी चूडिय़ाँ हैं एक-एक दर्जन! पति के घर से वापस लौटी है। खुश हैदामाद मैकेनिकल इंजीनियर है जिसकी गरीब सूरत है। और वह बाहर बरामदे में कुरसी पर बैठा हैक्या करे सूझता नहीं!
घर में उनकी स्त्री पूड़ी बना रही है। पकौडिय़ाँ बन रही हैं। बहुत-बहुत-सी चीजें हैं। भाग-दौड़ है। हल्ला-गुल्ला है। शोर-शराबा है। लोग आ-आ कर बैठ रहे हैं- आ रहे हैंजा रहे हैं। पास-पड़ोस की लुगाइयाँ चौके में मदद कर रही हैं। और उनके दिल में... क्या करेंक्या न करेंसब कुछ कर डालें! क्या ही अच्छा होता कि उनमें यह ताकत होती कि वे सबको प्रसन्न कर सकते और सारी दुनिया को खुश देख सकते। ...कि इतने में सपना टूट जाता है।
बरामदे का दरवाजा बज उठता है। पैरों की आवाज से साफ जाहिर होता है कि स्त्रीजो कहीं गई थी लौट आई है।
अंदर आ कर देखती है। उसे अचंभा होता है। 'यहाँ क्या कर रहे हो?’
उसकी आवाज गूँजती है। जैसे लोहे की साँकल बजती है। जैसे ईमान बजता है!
'सरोज कहाँ है?’
कोई आवाज नहीं! सरोज और उसके पिता स्तब्ध बैठे हैं।
पिता बोलते हैं मानो छाती के कफ को चीरती हुई घरघराती आवाज आ रही हो। कहते हैं, 'कहाँ गई थी घर बड़ा सूना लग रहा था।?’
स्त्री कोई जवाब नहीं दे कर वहाँ से चली जाती है। आँगन में पहुँच करजमीन में गड़ा हुआ एक पुराना पेड़जो कट चुका है और जिसकी झिल्लियाँ बिखरी हैंउस पर पैर रख कर खड़ी होती है। जमीन में उस कटे पेड़ में से जमीन की तहें छूते हुए नए अंकुर निकले हैं। बाद में उन पर से उतर कर वह झिल्लियाँ बीनती है। पड़ोस से लाई हुई कुल्हाड़ी चला कर उन अधकटे ठूँठों से लकड़ी निकालने का खयाल आता है। लेकिन काटने का जी नहीं होता। इसलिए झिल्लियाँ बीन कर वह उनका एक ढेर बना देती है और फिर आँगन की दीवार की मुँडेर पर चढ़ जाती हैक्योंकि उस मुँडेर के एक ओर नीम की एक सूखी डाल निकल आई है।
उसे वह तोड़ती है। ऊँची मुँडेर पर चढ़ कर नीम की सूखी डाल तोड़ लाने का जो साहस हैउस साहस से दीप्त हो कर वह प्रफुल्ल हो जाती है। सारी लकड़ी ठंडे चूल्हे के पास लाती हैजमा कर देती है।
सरोज पिता की गोद से उठ आई है। वह देखती है कि चूल्हे में सुनहली ज्वाला निकल रही है! वह देखती हैऔर देखती रह जाती है। उसे उस ज्वाला का रंग अच्छा लगता है। वह चूल्हे के पास जा कर बैठ गई है। उसकी रीढ़ की हड्डी दु:ख रही हैपर चूल्हे में जलती हुई ज्वाला उसे अच्छी लग रही है।
सारा चौका सुहाना हो उठता है- भूरा-मटियालासाफ-सुथरा! भीत की पटिया पर रखी पीतल की एक भगोनीछोटे-छोटे दो गिलास और दो कटोरियाँकैसी चमचमा रही हैंकितनी सुंदर! उन पर माँ का हाथ फिरा है। तभी तो... तभी तो...।
सुबह के पकाए भात में पानी डाला जाता है और नमक! चूल्हे पर चढ़ गया है भात! सुबह का बेसन भी है। उसमें पानी मिला दिया जाता है। उसे भी चूल्हे के दूसरे मुँह पर रख दिया गया हैसीझता रहेगा!
सरोज बोलती नहींमाँ बोलती नहींपिता बोलते नहीं!
जब वह नन्ही बालिका भोजन कर चुकी तो उसकी जान में जान आई। बोरे पर बिछेमाँ के चिथड़े से बनेअपने मुलायम बिस्तर पर वह सो गई। पिताजी के बिस्तर से सटा हुआ उसका बिस्तर है! वे उसे अपने पास नहीं लेते। रात को वह बिस्तर गीला करती हैइसलिए!
दोनों तथाकथित बिस्तरों पर लेट गए हैं! दोनों को नींद नहीं! दोनों एक दूसरे से कुछ कहना चाहते हैंकहना आवश्यक है। उस पूर्व-ज्ञान को वे कहना-सुनना नहीं चाहते। वह पूर्व-ज्ञान वेदनाकारक हैइसलिए उसे न कहना ही अच्छा! फिर भी न कहने से काम नहीं बनताक्योंकि कह-सुन लेने से अपने-अपने निवेदनों पर सील लग जाती हैव्यक्तिगत मुहर लग जाती है। वह व्यक्तिगत मुहर अभी लगी नहीं हैं। हर एक उत्तर हर एक ज्ञान है। फिर भी बहुत कुछ अज्ञात छूट जाता है!
वे नहीं चाहते थे कि रात में नींद के पहले के ये कुछ क्षण खराब हो जाएँमन:स्थिति विकृत हो और दुर्दमनीय चिंता से ग्रस्त हो कर वे रात-भर जागते-कराहते रहें। नहींऐसा नहीं! चिंता सुबह उठ कर करेंगे। रात है। यह रात अपनी है। कल की कल देखी जाएगी!
किंतु इन खयालों से माथे का दुखना नहीं थमतादेह की थकान दूर नहीं होतीअसंतोष की आग और बेबसी का धुआँ दूर नहीं होता।
नहींउसका एक उपाय है! जबरदस्ती नींद लाने के लिए आप एक से सौ तक गिनते जाइए! इस तरहआप कई बार गिनेंगेदिमाग थक जाएगा और आप ही आप भीतर अँधेरा छा जाएगा। एक दूसरा तरीका है! रेखागणित की एक समस्या ले लीजिए। मन-ही-मन चित्र तैयार कीजिए। उसके कोणों को नाम दीजिए और आगे बढ़ते जाइए। अंत तक आने के पहले ही नींद घेर लेगी। एक और भी मार्ग हैजिसे इस लेख का लेखक अपनाया करता है! मस्तिष्क की सारी नसें ढीली कर दीजिए। आँखे मूँद कर पलकें बिलकुल बंद करकेसिर्फ अँधेरे को एकाग्र देखते रहिए। तरह-तरह की तसवीरें बनेंगी। पेड़दार रास्ते और उस पर चलती हुई भीड़ अथवा पहाड़ और नदियाँ जिनकों पार करती हुई रेलगाड़ी... भक-भक-भक ।
अँधेरा जड़ हो गया और छाती पर बैठ गया। नहींउसे हटाना पड़ेगा ही- सरोज के पिता सोच रहे हैं! और उनकी आँखे बगल में पड़े हुए बिस्तर की ओर गईं।
वहाँ हलचल है। वहाँ भी बेचैनी है। लेकिन कैसी
...लेकिन उन दोनों में न स्वीकार है न अस्वीकार! सिर्फ एक संदेह हैयह संदेह साधार है कि इस निष्क्रियता में एक अलगाव है- एक भीतरी अलगाव है। अलगाव में विरोध हैविरोध में आलोचना हैआलोचना में करुणा है। आलोचना पूर्णत: स्वीकरणीय हैजिसे इस पुरुष ने कभी पूरा नहीं किया। वह पूरा नहीं कर सकता।
कर्त्तव्य कर्म को पूरा करना केवल उसके संकल्प-द्वारा ही नहीं हो सकता। उसके लिए और भी कुछ चाहिए! फिर भीवह पुरुष मन-ही-मन यह वचन देता हैयह प्रतिज्ञा करता है कि कल जरूर वह कुछ-न-कुछ करेगाविजयी हो कर लौटेगा।
पुरुष में भी आवेश नहीं है। वह भी ठंडा हैसिर्फ गरमी लाने की कोशिश कर रहा है।
वह उसकी बाँहों में थी। निश्चेष्ट शरीर! फिर भीउसमें एक ऊष्मा हैजो मानो सौ नेत्रों से अपने पुरुष को देख रही होनिर्णय प्रदान करने के लिए प्रमाण एकत्र कर रही हो। फिर भी निश्चेष्ट और सक्रिय!
पुरुष संवेदनाओं के जाल में खो गया। उसे स्त्री के होठ गुलाब की सूखी पँखुरियों-से लगेजिससे उसे सूरज की गरमी की याद आई। उसके कपोल मिट्टी-से थे - भुसभुसीनमकीनशुष्क मृत्तिका! उसका हृदय एक अनजानी गूढ़ करुणा की सूचना से भर उठा। ...हाँउसका पेटउसकी त्वचा में तो घरेलू बास थी। उसने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और वहमन-ही-मनउस पूरी गरम चिलकती हुई पृथ्वी को याद करने लगा जिस पर वह बेसहारा मारा-मारा फिरता है। क्या यह पृथ्वी उतनी ही दु:खी रही है जितना कि वह स्वयं है!
एक उर्जा उठी और गिर गई। पुरुष निश्चेष्ट पड़ा रहा। मन जाग्रत था।
...दोनों स्त्री-पुरुष के जीवन पर विराम का पूर्ण चिह्न लग गया हैकाठ हो गए हैं। बाढ़ आती है। किनारे पर पड़े हुए काठों को बहा कर ले जाती है। जल-विप्लव में। काठ बहते जाते हैंफिर भी वे प्राणहीन काठआपस में गुँथे हुए बहे जा रहे हैं।
बादल-तूफान के कारणपेड़ तिरछे हो रहे हैं। पर वे गुँथे-बँधे बहे जा रहे हैंबहे जा रहे हैं... औरहाँ गुँथे-बँधे काठ खाली नहीं हैं। उन पर एक बालिका बैठी हुई है। हाँवह सरोज है। अपने नन्हे दो हाथ उसने दोनों के काठों पर टेक दिए हैंजिनके सहारे वह स्वयं चली जा रही है।
सरोज की उस बाल मूर्ति की रक्षा करनी ही होगी! उन दो निष्प्राण काठ-लोगों का यही कर्त्तव्य है।
पुरुष इस स्वप्न को देखता ही रहता है। बारह का गजर होता है। रात और आगे बढ़ती है। सप्तर्षिजो अब तक कोने में थेसामने आ कर साफ दिखाई देते हैं।

नामालूम -सी एक खता

 नामालूम -सी  एक खता

- आचार्य चतुरसेन शास्त्री


गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतखाने में चले आए थे।
रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाड़ों की चोटियां बर्फ से सफेद होकर चांदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी। मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी।
खुले हुए बाल उसकी फिरोजी रंग की ओढऩी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुंथी हुई फिरोजी रंग की ओढनी पर, कसी कमखाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बडे मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती के समान था। उसकी देह की गठन निराली थी। संगमरमर के समान पैरों में जरी के काम के जूते पड़े थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे।
कमरे में एक कीमती ईरानी कालीन का फर्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धंस जाता था। सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे। कमरे में चार पूरे कद के आईने लगे थे। संगमरमर के आधारों पर सोने-चांदी के फूलदानों में ताजे फूलों के गुलदस्ते रखे थे। दीवारों और दरवाजों पर चतुराई से गुंथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएं झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था। कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएं करीने से सजी हुई थीं।
बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे। इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे। सलीमा खिड़की में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। सलीमा ने उकताकर दस्तक दी। एक बांदी दस्तबस्ता हाजिर हुई।
बांदी सुंदर और कमसिन थी। उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा-'साकी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बांसुरी?'
बांदी ने नम्रता से कहा- 'हुजूर जिसमें खुश हों।'
सलीमा ने कहा- 'पर तू किसमें खुश है?'
बांदी ने कम्पित स्वर में कहा- 'सरकार! बांदियों की खुशी ही क्या!'
सलीमा हंसते-हंसते लोट गई। बांदी ने बंशी लेकर कहा- 'क्या सुनाऊं?'
बेगम ने कहा- 'ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाजे और खिड़कियां खोल दे। चिरागों को बुझा दे, चटखती चांदनी का लुत्फ उठाने दे और वे फूलमालाएं मेरे पास रख दे।'
बांदी उठी। सलीमा बोली- 'सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूं।'
बांदी ने सोने के गिलास में खुशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा। बेगम ने कहा- 'उफ! यह तो बहुत गर्म है। क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?'
बांदी ने नम्रता से कहा- 'दिया तो है सरकार!'
'अच्छा, इसमें थोड़ा सा इस्तम्बोल और मिला।'
साकी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई। इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज मिलाई। फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा।
एक ही सांस में उसे पीकर बेगम ने कहा- 'अच्छा, अब सुनो। तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है, सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना।'
इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढ़काकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर खुद भी लुढक गई और रस-भरे नेत्रों से साकी की ओर देखने लगी। साकी ने बंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया -
'दुखवा मैं कासे कं मोरी सजनी...'
बहुत देर तक साकी की बंशी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही। धीरे-धीरे साकी खुद भी रोने लगी। साकी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी।
गीत खत्म करके साकी ने देखा, सलीमा बेसुध पड़ी है। शराब की तेजी से उसके गाल एकदम सुर्ख हो गए हैं और और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फड़क रहे हैं। सांस की सुगंध से कमरा महक रहा है। जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती कांपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे कांप रहा है। प्रस्वेद की बूंदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं।
बंशी रखकर साकी क्षणभर बेगम के पास आकर खड़ी हुई। उसका शरीर कांपा, आंखें जलने लगी, कंठ सूख गया। वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी। इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुंह चूम लिया।
फिर ज्यों ही उसने अचानक आंख उठाकर देखा, तो पाया खुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहां खड़े उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं।
साकी को सांप डस गया। वह हतबुद्धि की तरह बादशाह का मुंह ताकने लगी। बादशाह ने कहा- 'तू कौन है? और यह क्या कर रही थी?'
साकी चुप खड़ी रही। बादशाह ने कहा- 'जवाब दे!'
साकी ने धीमे स्वर में कहा- 'जहांपनाह कनीज अगर कुछ जवाब न दे, तो?'
बादशाह सन्नाटे में आ गए- 'बांदी की इतनी हिम्मत?'
उन्होंने फिर कहा- 'मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे निर्वस्त्र करके कोडे लगाए जाएंगे!'
साकी ने अकम्पित स्वर में कहा- 'मैं मर्द हूं।'
बादशाह की आंखों में सरसों फूल उठी। उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा। वह बेसुध पड़ी सो रही थी। उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पड़ा था। उनके मुंह से निकला- 'उफ! फाहशा! और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया। फिर उन्होंने कहा- दोजख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!'
फिर कठोर स्वर से पुकारा-'मादूम!'
एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खड़ी हुई। बादशाह ने हुक्म दिया- 'इस मरदूद को तहखाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए।'
मादूम ने अपने कर्कश हाथों से युवक का हाथ पकड़ा और ले चली। थोडी देर बाद दोनों एक लोहे के मजबूत दरवाजे के पास आ खड़े हुए। तातारी बांदी ने चाभी निकाल दरवाजा खोला और कैदी को भीतर ढकेल दिया। कोठरी की गच कैदी का बोझ ऊपर पड़ते ही कांपती हुई नीचे धसकने लगी!
प्रभात हुआ। सलीमा की बेहोशी दूर हुई। चौंककर उठ बैठी। बाल संवारने, ओढनी ठीक की और चोली के बटन कसने को आईने के सामने जा खड़ी हुई। खिड़कियां बंद थीं। सलीमा ने पुकारा- 'साकी! प्यारी साकी! बड़ी गर्मी है, जरा खिड़की तो खोल दे। निगोड़ी नींदने तो आज गजब ढा दिया। शराब कुछ तेज थी।'
किसी ने सलीमा की बात न सुनी। सलीमा ने जरा जोर से पुकारा- 'साकी!'
जवाब न पाकर सलीमा हैरान हुई। वह खुद खिड़की खोलने लगी। मगर खिड़कियां बाहर से बंद थीं। सलीमा ने विस्मय से मन-ही-मन कहा क्या बात है दासियां सब क्या हुईं?
वह द्वार की तरफ चली। देखा, एक तातारी बांदी नंगी तलवार लिए पहरे पर मुस्तैद खड़ी है। बेगम को देखते ही उसने फिर झुका लिया।
सलीमा ने क्रोध से कहा- 'तुम लोग यहां क्यों हो?'
'बादशाह के हुक्म से।'
'क्या बादशाह आ गए।'
'जी हां।'
'मुझे इत्तिला क्यों नहीं की?'
'हुक्म नहीं था।'
'बादशाह कहां हैं?'
'जीनतमहल के दौलतखाने में।'
सलीमा के मन में अभिमान हुआ। उसने कहा- 'ठीक है, खूबसूरती की हाट में जिनका कारोबार है, वे मुहब्बत को क्या समझेंगे? तो अब जीनतमहल की किस्मत खुली?'
तातारी स्त्री चुपचाप खड़ी रही। सलीमा फिर बोली- 'मेरी साकी कहां है?'
'कैद में।'
'क्यों?'
'जहांपनाह का हुक्म।'
'उसका कुसूर क्या था?'
'मैं अर्ज नहीं कर सकती।'
'कैदखाने की चाभी मुझे दे, मैं अभी उसे छुड़ाती हूं।'
'आपको अपने कमरे से बाहर जाने का हुक्म नहीं है।'
'तब क्या मैं भी कैद हूं?'
'जी हां।'
सलीमा की आंखों में आंसू भर आए। वह लौटकर मसनद पर गड़ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। कुछ ठहरकर उसने एक खत लिखा-'हुजूर! कुसूर माफ फर्मावें। दिनभर थकी होने से ऐसी बेसुध सो गई कि हुजूर के इस्तकबाल में हाजिर न रह सकी। और मेरी उस दासी को भी जां बख्शी की जाए। उसने हुजूर के दौलतखाने में लौट आने की इत्तला मुझे वाजिबी तौर पर न देकर बेशक भारी कुसूर किया है। मगर वह नई कमसिन, गरीब और दुखिया है।'
'कनीज'
सलीमा
चिट्ठी बादशाह के पास भेज दी गई। बादशाह ने आगे होकर कहा- 'लाई क्या है?'
बांदी ने दस्तबस्ता अर्ज की- 'खुदावन्द! सलीमा बीबी की अर्जी है!'
बादशाह ने गुस्से से होंठ चबाकर कहा- 'उससे कह दे कि मर जाए! इसके बाद खत में एक ठोकर मारकर उन्होंने उधर से मुंह फेर लिया।'
बांदी सलीमा के पास लौट आई। बादशाह का जवाब सुनकर सलीमा धरती पर बैठ गई। उसने बांदी को बाहर जाने का हुक्म दिया और दरवाजा बंद करके फूट-फूटकर रोई। घंटों बीत गए, दिन छिपने लगा। सलीमा ने कहा- हाय! बादशाहों की बेगम होना भी क्या बदनसीबी है। इंतजारी करते-करते आंखें फूट जाएं, मिन्नतें करते-करते जबान घिस जाए, अदब करते-करते जिस्म टुकड़े-टुकड़े हो जाए फिर भी इतनी सी बात पर कि मैं जरा सो गई, उनके आने पर जग न सकी, इतनी सजा! इतनी बेइज्जती! तब मैं बेगम क्या हुई? जीनत और बांदियां सुनेंगी तो क्या कहेंगी? इस बेइज्जती के बाद मुंह दिखाने लायक कहां रही? अब तो मरना ही ठीक है। अफसोस- मैं किसी गरीब किसान की औरत क्यों न हुई!
धीरे-धीरे स्त्रीत्व का तेज उसकी आत्मा में उदय हुआ। गर्व और दृढ प्रतिज्ञा के चिन्ह उसके नेत्रों में छा गए। वह सांपिन की तरह चपेट खाकर उठ खड़ी हुई। उसने एक और खत लिखा-
'दुनिया के मालिक! आपकी बीवी और कनीज होने की वजह से मैं आपके हुक्म को मानकर मरती हूं। इतनी बेइज्जती पाकर एक मलिका का मरना ही मुनासिब भी है। मगर इतने बड़े बादशाह को औरतों को इस कदर नाचीज तो न समझना चाहिए कि एक अदना-सी बेवकूफी की इतनी कड़ी सजा दी जाए। मेरा कुसूर सिर्फ इतना ही था कि मैं बेखबर सो गई थी। खैर, सिर्फ एक बार हुजूर को देखने की ख्वाहिश लेकर मरती हूं। मैं उस पाक परवरदिगार के पास जाकर अर्ज करूंगी कि वह मेरे शौहर को सलामत रखे। -सलीमा'
खत को इत्र से सुवासित करके ताजे फूलों के एक गुलदस्ते में इस तरह रख दिया कि जिससे किसी कि उस पर फौरन ही नजर पड़ जाए। इसके बाद उसने जवाहरात की पेटी से एक बहुमूल्य अंगूठी निकाली और कुछ देर तक आंखें गड़ा-गड़ाकर उसे देखती रही। फिर उसे चाट गई।
बादशाह शाम की हवाखोरी को नजरबाग में टहल रहे थे। दो-तीन खोजे घबराए हुए आए और चि_ी पेश करके अर्ज की- 'हुजूर गजब हो गया! सलीमा बीबी ने जहर खा लिया है और वह मर रही हैं!'
क्षण-भर में बादशाह ने खत पढ़ लिया। झपटे हुए सलीमा के महल पहुंचे। प्यारी दुलहिन सलीमा जमीन पर पड़ी है। आंखें ललाट पर चढ़ गई है। रंग कोयले के समान हो गया है। बादशाह से न रहा गया। उन्होंने घबराकर हा- हकीम, हकीम को बुलाओ! कई आदमी दौड़े।
बादशाह का शब्द सुनकर सलीमा ने उसकी तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा- 'जहे-किस्मत!'
बादशाह ने नजदीक बैठकर कहा- 'सलीमा! बादशाह की बेगम होकर क्या तुम्हें यही लाजिम था?'
सलीमा ने कष्ट से कहा- 'हुजूर! मेरा कुसूर बहुत मामूली था।'
बादशाह ने कड़े स्वर में कहा- 'बदनसीब! शाही जनानखाने में मर्द को भेष बदलकर रखना मामूली कुसूर समझती है? कानों पर यकीन कभी न करता, मगर आंखों-देखी को भी झूठ मान लूं?'
तडफ़कर सलीमा ने कहा- 'क्या?'
बादशाह डरकर पीछे हट गए। उन्होंने कहा- 'सच कहो, इस वक्त तुम खुदा की राह पर हो, यह जवान कौन था?'
सलीमा ने अचकचाकर पूछा- 'कौन जवान?'
बादशाह ने गुस्से से कहा- 'जिसे तुमने साकी बनाकर पास रखा था।'
सलीमा ने घबराकर कहा- 'हैं! क्या वह मर्द है?'
बादशाह- 'तो क्या तुम सचमुच यह बात नहीं जानतीं?'
सलीमा के मुंह से निकला- 'या खुदा!'
फिर उसके नेत्रों से आंसू बहने लगे। वह सब मामला समझ गई। कुछ देर बाद बोली- 'खाविन्द! तब तो कुछ शिकायत ही नहीं, इस कुसूर को तो यही सजा मुनासिब थी। मेरी बदगुमानी माफ फर्माई जाए। मैं अल्लाह के नाम पर पड़ी कहती हूं, मुझे इस बात का कुछ भी पता नहीं है।'
बादशाह का गला भर आया। उन्होंने कहा- 'तो प्यारी सलीमा! तुम बेकुसूर ही चलीं? - बादशाह रोने लगे।'
सलीमा ने उनका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखकर कहा-'मालिक मेरे! जिसकी उम्मीद न थी, मरते वक्त वह मजा मिल गया। कहा-सुना माफ हो और एक अर्ज दासी की मंजूर हो।'
बादशाह ने कहा- 'जल्दी कहो सलीमा!'
सलीमा ने साहस से कहा- 'उस जवान को माफ कर देना।'
इसके बाद सलीमा की आंखों से आंसू बह चले, और थोड़ी ही देर में वह ठंडी हो गई।!
बादशाह ने घुटनों के बल बैठकर उसका ललाट चूमा और फिर बालक की तरह रोने लगे।
गजब के अंधेरे और सर्दी में युवक भूखा-प्यासा पड़ा था। एकाएक घोर चीत्कार करके किवाड़ खुले। प्रकाश के साथ ही एक गंभीर शब्द तहखाने में भर गया- 'बदनसीब नौजवान! क्या होश-हवास में है?'
युवक ने तीव्र स्वर में पूछा- 'कौन?'
जवाब मिला- 'बादशाह।'
युवक ने कुछ भी अदब किए बिना कहा- 'यह जगह बादशाहों के लायक नहीं है। क्यों तशरीफ लाए हैं?'
'तुम्हारी कैफियत नहीं सुनी थी, उसे सुनने आया हूं।'
कुछ देर चुप रहकर युवक ने कहा- 'सिर्फ सलीमा को झूठी बदनामी से बचाने के लिए कैफियत देता हूं। सुनिए, सलीमा जब बच्ची थी, मैं उसके बाप का नौकर था। तभी से मैं उसे प्यार करता था। सलीमा भी प्यार करती थी, पर वह बचपन का प्यार था। उम्र होने पर सलीमा पर्दे में रहने लगी और फिर वह शहंशाह की बेगम हुई। मगर मैं उसे भूल न सका। पांच साल तक पागल की तरह भटकता रहा, अंत में भेष बदलकर बांदी की नौकरी कर ली। सिर्फ उसे देखते रहने और खिदमत करके दिन गुजारने का इरादा था। उस दिन उज्ज्वल चांदनी, सुगंधित पुष्पराशि, शराब की उत्तेजना और एकांत ने मुझे बेबस कर दिया। उसके बाद मैंने आंचल से उसके मुख का पसीना पोंछा और मुंह चूम लिया। मैं इतना ही खतावार हूं। सलीमा इसकी बावत कुछ नहीं जानती।'
बादशाह कुछ देर चुपचाप खड़े रहे। इसके बाद वे बिना दरवाजा बंद किए ही धीरे-धीरे चले गए।
सलीमा की मृत्यु को दस दिन बीत गए। बादशाह सलीमा के कमरे में ही दिन-रात रहते है। सामने नदी के उस पार पेड़ों के झुरमुट में सलीमा की सफेद कब्र बनी है। जिस खिड़की के पास सलीमा बैठी उस दिन-रात को बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी, उसी खिड़की में उसी चौकी पर बैठे हुए बादशाह उसी तरह सलीमा की कब्र दिन-रात देखा करते हैं। किसी को पास आने का हुक्म नहीं। जब आधी रात हो जाती है, तो उस गंभीर रात्रि के सन्नाटे में एक मर्मभेदिनी गीतध्वनि उठ खड़ी होती है। बादशाह साफ-साफ सुनते हैं, कोई करुण-कोमल स्वर में गा रहा है.. 'दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सजनी...'

कानून के दरवाजे पर

कानून के दरवाजे पर
- फ्रांज काफ्का
'मेरे मना करने के बावजूद तुम भीतर जाने को इतने उतावले हो तो फिर कोशिश करके क्यों नहीं देखते, पर याद रखना मैं बहुत सख्त हूं, जबकि मैं दूसरे रखवालों से बहुत छोटा हूं।
कानून के द्वार पर रखवाला खड़ा है। उस देश का एक आम आदमी उसके पास आकर कानून के समक्ष पेश होने की इजाज़त मांगता है। मगर वह उसे भीतर प्रवेश की इजाज़त नहीं देता।
आदमी सोच में पड़ जाता है। फिर पूछता है- 'क्या कुछ समय बाद मेरी बात सुनी जाएगी?
'देखा जाएगा' ... कानून का रखवाला कहता है- 'पर इस समय तो कतई नहीं!'
कानून का दरवाज़ा सदैव की भांति आज भी खुला हुआ है। आदमी भीतर झांकता है।
उसे ऐसा करते देख रखवाला हंसने लगता है और कहता है- 'मेरे मना करने के बावजूद तुम भीतर जाने को इतने उतावले हो तो फिर कोशिश करके क्यों नहीं देखते, पर याद रखना मैं बहुत सख्त हूं, जबकि मैं दूसरे रखवालों से बहुत छोटा हूं। यहां एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने के बीच हर दरवाजे पर एक रखवाला खड़ा है और हर रखवाला दूसरे से ज़्यादा शक्तिशाली है। कुछ के सामने जाने की हिम्मत तो मुझ में भी नहीं है।'
आदमी ने कभी सोचा भी नहीं था कि कानून तक पहुंचने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। वह तो यही समझता था कि कानून तक हर आदमी की पहुंच हर समय होनी चाहिए। फर कोटवाले रखवाले की नुकीली नाक, बिखरी-लम्बी काली दाढ़ी को नज़दीक से देखने के बाद वह अनुमति मिलने तक बाहर ही प्रतीक्षा करने का निश्चय करता है। रखवाला उसे दरवाज़े की एक तरफ स्टूल पर बैठने देता है। वह वहां कई दिनों तक बैठा रहता है। यहां तक कि वर्षों बीत जाते हैं। इस बीच वह भीतर जाने के लिए रखवाले के आगे कई बार गिड़गिड़ाता है। रखवाला बीच-बीच में अनमने अंदाज में उससे उसके घर एवं दूसरी बहुत-सी बातों के बारे में पूछने लगता है, पर हर बार उसकी बातचीत इसी निर्णय के साथ ख़त्म हो जाती है कि अभी उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता।
आदमी ने सफऱ के लिए जो भी सामान इकट्ठा किया था और दूसरा जो कुछ भी उसके पास था, वह सब वह रखवाले को ख़ुश करने में खर्च कर देता है। रखवाला उससे सब-कुछ इस तरह से स्वीकार करता जाता है मानो उस पर अहसान कर रहा हो।
वर्षों तक आशा भरी नजऱों से रखवाले की ओर ताकते हुए वह दूसरे रखवालों के बारे में भूल जाता है! कानून तक पहुंचने के रास्ते में एकमात्र वही रखवाला उसे रुकावट नजर आता है। वह आदमी जवानी के दिनों में ऊंची आवाज़ में और फिर बूढ़ा होने पर हल्की बुदबुदाहट में अपने भाग्य को कोसता रहता है। वह बच्चे जैसा हो जाता है। वर्षों से रखवाले की ओर टकटकी लगाए रहने के कारण वह उसके फर के कॉलर में छिपे पिस्सुओं के बारे में जान जाता है। वह पिस्सुओं की भी ख़ुशामद करता है ताकि वे रखवाले का दिमाग उसके पक्ष में कर दें। अंतत: उसकी आंखें जवाब देने लगती हैं। वह यह समझ नहीं पाता कि क्या दुनिया सचमुच पहले से ज़्यादा अंधेरी हो गई है या फिर उसकी आंखें उसे धोखा दे रही हैं। पर अभी भी वह चारों ओर के अंधकार के बीच कानून के दरवाजे से फूटते प्रकाश के दायरे को महसूस कर पाता है।
वह नज़दीक आती मृत्यु को महसूस करने लगता है। मरने से पहले वह एक सवाल रखवाले से पूछना चाहता है जो वर्षों की प्रतीक्षा के बाद उसे तंग कर रहा था। वह हाथ के इशारे से रखवाले को पास बुलाता है क्योंकि बैठे-बैठे उसका शरीर इस कदर अकड़ गया है कि वह चाहकर भी उठ नहीं पाता। रखवाले को उसकी ओर झुकना पड़ता है क्योंकि कद में काफ़ी अंतर आने के कारण वह काफ़ी ठिगना दिखाई दे रहा था।
'अब तुम क्या जानना चाहते हो' ... रखवाला पूछता है...'तुम्हारी चाहत का कोई अंत भी है?'
'कानून तो हरेक के लिए है' ... आदमी कहता है... 'पर मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि इतने वर्षो में मेरे अलावा किसी दूसरे ने यहां प्रवेश हेतु दस्तक क्यों नहीं दी?'
रखवाले को यह समझते देर नहीं लगती कि वह आदमी अंतिम घडिय़ां गिन रहा है। वह उसके बहरे होते कान में चिल्लाकर कहता है-- 'किसी दूसरे के लिए यहां प्रवेश का कोई मतलब नहीं था क्योंकि कानून तक पहुंचने का यह द्वार सिर्फ तुम्हारे लिए ही खोला गया था और अब मैं इसे बंद करने जा रहा हूं।'

लघुकथाएँ

-सआदत हसन मंटो


उर्दू अदब में मंटो सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले और बेहद विवादास्पद रचनाकार रहे जिन्होंने विभाजन से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखा और अदब को ठंडा गोश्त, खोल दो, टोबा टेक सिंह, काली सलवार और बू जैसी चर्चित कहानियों के रूप में कई नायाब तोहफे दिये। उन्होंने उर्दू कहानी को एक नयी शैली और बिल्कुल नया मिजाज दिया। उनकी कहानियां मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं। सआदत हसन मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा बीते दशक में हुई है उतनी उर्दू और हिंदी और दुनिया के दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है। अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उसे देखकर एक ओर तो आश्चर्य होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच को सामने लाने के लिए इतना निर्मम भी हो सकता है लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि अपनी इस कोशिश में मानवीय संवेदनाओं का सूत्र लेखक के हाथों से एक क्षण के लिए भी नहीं छूटता। प्रस्तुत है उनकी चार लघु कहानियाँ -

बेखबरी का फायदा

लबलबी दबी-पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली।
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया।
लबलबी थोड़ी देर बाद फिर दबी– दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली।
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा।
लबलबी तीसरी बार दबी- निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई।
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख भी न सकी और वहीं ढेर हो गई।
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, न कोई हलाक हुआ और न  कोई जख्मी।
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया।
दफ्तन सड़क पर एक छोटा- सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया।
गोलियाँ चलाने वाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ मोड़ा।
उसके साथी ने कहा- यह क्या करते हो?
गोलियां चलाने वाले ने पूछा- क्यों?
गोलियां तो खत्म हो चुकी हैं!
तुम खामोश रहो... इतने- से बच्चे को क्या मालूम?

करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए।
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि कानूनी गिरफ्त से बचे रहें।
एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा खुद भी साथ चला गया।
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं।
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया।
लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया।
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।
उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे।

खबरदार

बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए। कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा- तुम मुझे मार डालो, लेकिन खबरदार, जो मेरे रुपए- पैसे को हाथ लगाया...!
हलाल और झटका
मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले- हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।
यह तुमने क्या किया?
क्यों?
इसको हलाल क्यों किया?
मजा आता है इस तरह।
मजा आता है के बच्चे...तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।
और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया।
(शहरग- शरीर का सबसे बड़ा शिरा जो हृदय में मिलता है)

Oct 21, 2014

उदंती.com-सितम्बर- अक्टूबर- 2014

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जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर, कहीं रह न जाए -गोपाल दास नीरज