October 20, 2014

सेहत

बेअसर होती एंटीबायोटिक दवाएँ
                           - प्रमोद भार्गव

एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर अर्से से जताई जा रही चिंता ने अब गंभीर रूप ले लिया है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपनी एक रिपोर्ट में एंटीबायोटिक दवाओं के विरुद्ध पैदा हो रही प्रतिरोध क्षमता को मानव स्वास्थ के लिए एक वैश्विक खतरे की संज्ञा दी है। इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि जिन महामारियों के दुनिया से समाप्त होने का दावा किया गया था वे फिर आक्रामक हो रही हैं। डब्ल्यूएचओ में सहायक महानिदेशक डॉ. कीजी फुकुदा का दावा है कि दुनिया ऐसे भयानक अँधकार की ओर बढ़ रही है जहाँ सामान्य बीमारियाँ भी जानलेवा साबित होंगी।
डब्ल्यूएचओ ने 129 देशों से जुटाए गए आँकड़ों का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट में कहा है कि यह प्रतिरोध क्षमता दुनिया के हर कोने में दिख रही है। रिपोर्ट में एक ऐसे एंटीबायोटिक-पश्चात युग की आशंका जताई गई है जिसमें लोगों के सामने फिर उन्हीं सामान्य संक्रमणों के कारण मौत का खतरा होगा जिनका पिछले कई दशकों से इलाज संभव हो रहा है। रिपोर्ट निमोनिया, डायरिया और रक्त संक्रमण का कारण बनने वाले सात अलग-अलग जीवाणुओं पर केंद्रित है। रिपोर्ट के अनुसार अध्ययन में शामिल आधे से ज़्यादा लोगों पर दो प्रमुख एंटीबायोटिक का प्रभाव नहीं पड़ा। स्वाभाविक तौर पर जीवाणुओं में धीरे-धीरे एंटीबायोटिक के विरूद्ध प्रतिरक्षा क्षमता पैदा हो जाती है लेकिन इन दवाओं के अंधाधुंध प्रयोग से यह स्थिति अनुमान से कहीं जल्दी सामने आ रही है। चिकित्सकों द्वारा इन दवाओं की सलाह देना और मरीज़ की ओर से दवा की पूरी मात्रा न लेना इसकी प्रमुख वजह है। डॉ. फुकुदा का मानना है कि जब तक हम संक्रमण रोकने के बेहतर प्रबन्धन के साथ एंटीबायोटिक के निर्माण व उपयोग की प्रक्रिया को नहीं बदलेंगे यह खतरा बना रहेगा। इंग्लैण्ड के प्राध्यापक डेम सैली डेविस ने इस खतरे को ग्लोबल वार्मिंग के जितना ही भयावह बताया है।
वैज्ञानिकों ने एंटीबायोटिक दवाओं की खोज करके महामारियों पर एक तरह से विजय-पताका फहरा दी थी। लेकिन चिकित्सकों ने इन दवाओं का इतना ज़्यादा उपयोग किया कि बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों में प्रतिरोध शक्ति  विकसित हो गई। मानव शरीर में सूक्ष्मजीव भरे पड़े हैं। सभी सूक्ष्मजीव हानिकारक नहीं होते, कुछ पाचन क्रिया के लिए लाभदायी भी होते हैं। प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर में 200 किस्म के ऐसे सूक्ष्मजीव डेरा डाले हुए हैं, जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मज़बूत व शरीर को निरोगी बनाए रखने का काम करते हैं। एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल इन्हें नष्ट करने का काम करता है।
एंटीबायोटिक की खोज एक वरदान साबित हुई थी क्योंकि इनसे अनेक संक्रामक रोगों से छुटकारा मिलने की उम्मीद बंधी थी। इसके पहले अस्पताल संक्रामक रोगियों से भरे रहते थे और चिकित्सक मरीज़ों को बचा नहीं पाते थे। निमोनिया और डायरिया के रोगियों को भी बचाना मुश्किल था। चोट लगने पर टिटनेस और सेप्सिस की चपेट में आए मरीज़ों की मौत तो निश्चित थी। एंटीबायोटिक दवाओं ने संक्रामक रोगों पर अंकुश लगा रखा था। मगर जल्दी ही सूक्ष्मजीवों में रूपांतरण होने लगे। जैसे, वैज्ञानिकों ने देखा कि कुछ ऐसे सूक्ष्मजीव सामने आए हैं, जिन पर पेनिसिलीन भी बेअसर है।
सूक्ष्मजीव किसी भी कोशिका में पहुँचकर शरीर को नुकसान पहुँचाना शुरु कर देते हैं। ये हमारी त्वचा, मुँह, नाक और कान के ज़रिए शरीर में प्रवेश करते हैं। फिर एक से दूसरे व्यक्ति में फैलने लगते हैं। इसीलिए अब चिकित्सक सलाह देने लगे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के बीच एक हाथ की दूरी बनी रहनी चाहिए। किसी का जूठा नहीं खाना-पीना चाहिए। वैसे हमारी त्वचा सूक्ष्मजीवों को रोकने का काम करती है और जो शरीर में घुस भी जाते है उन्हें एंटीबायोटिक मार डालते हैं।
 1940 से 1980 के बीच बड़ी मात्रा में असरकारी एंटीबायोटिक्स की खोज हुई। नतीजतन चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। किंतु 1980 के बाद कोई बड़ी खोज नहीं हुई जबकि पूरी दुनिया में इस दौरान चिकित्सा शिक्षा संस्थागत ढांचे के रूप में ढल चुकी थी। आविष्कार में उपयोगी माने जाने वाले उपकरण भी शोध संस्थानों में आसानी से उपलब्ध थे। 1990 में एक नए किस्म की एंटीबायोटिक की खोज ज़रूर हुई मगर बाज़ार में जो भी नई दवाएँ आई वे हकीकत में पुरानी दवाओं के ही नए संस्करण थे। विडंबना है कि नई एंटीबायोटिक दवाएँ विकसित नहीं हो रही हैं जबकि प्रतिरोधी सूक्ष्मजीव सामने आ रहे हैं। इन सूक्ष्मजीवों ने मौजूद दवाओं की सीमाएँ चिन्हित कर दी हैं। ज़ाहिर है इस पृष्ठभूमि में संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ रहा है। हाल ही में अस्तित्व में आया सुपरबग एक ऐसा ही सूक्ष्मजीव है। इस परिप्रेक्ष्य में विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह रिपोर्ट दुनिया के लिए एक खतरे की घंटी है।
सुपरबग यानी महाजीवाणु 2010 में चर्चा में आया था जो दिल्ली में पाया गया था। इस जीवाणु का नामकरण ही 'न्यू डेल्ही मेटेलो-बीटा लेक्टेमेज़-1'रखा गया है। बताया गया है कि इसका जन्म भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हुआ है। इस सुपरबग पर कोई भी मौजूदा एंटीबायोटिक दवा काम नहीं करती। इस जीवाणु के कारण पेशाब की नली में संक्रमण होता है। भारत में साफ पानी और शौच का उचित प्रबन्ध नहीं हैं इसलिए चिकित्सा विज्ञानियों को आशंका है कि यह महाजीवाणु भारत में कहर ढा सकता है।
इसी से मिलता-जुलता एक और महाजीवाणु है एमआरएसए। माना जाता है कि यह त्वचा और नाक से भीतर घुसकर हरकत में आ जाता है। इससे त्वचा, मुलायम ऊतकों, हड्डियों, फेफड़ों और हृदय के वॉल्व में संक्रामक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इस पर नियंत्रण के लिए मेथिसिलीन नामक दवा का उपयोग शु डिग्री किया गया था। परंतु धीरे-धीरे सुपरबग ने इसके विरुद्ध प्रतिरोध क्षमता विकसित कर ली है। युरोप के देशों में एमआरएसए की वजह से होने वाले संक्रामक रोगों से लडऩे में आज अरबों रुपए की राशि खर्च हो रही है लेकिन कारगर परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। अमरीका जैसे विकसित देश में हर साल हज़ारों मौतें हो रही हैं।
प्रकृति ने मनुष्य को बीमारियों से बचाव के लिए शरीर के भीतर ही मज़बूत प्रतिरक्षा तंत्र दिया है। इन्हें श्वेत रक्त कणिकाओं के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा रोग-रोधी एंज़ाइम लाइसोज़इम भी होता है जो जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। जिस तरह मानव शरीर विभिन्न प्राकृतिक तापमान, वायुमंडल व भौगोलिक परिस्थिति और पर्यावरण के अनुकूल अपने को ढाल लेता है उसी तरह से धरती पर हमारे अस्तित्व के समय से ही सूक्ष्मजीव और उनके विरुद्ध शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोध शक्ति का भी विकास होता रहा है।

एंटीबायोटिक दवाएँ जब-जब सूक्ष्मजीवों पर मारक साबित हुई तब-तब जीवाणु और विषाणुओं में प्रतिरोध क्षमता का विकास हुआ। महाजीवाणु तो कभी न नष्ट होने वाले रक्तबीजों की श्रेणी में आ गए हैं। इसलिए आज वैज्ञानिक कह रहे हैं कि एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग के तौर-तरीकों का नियमन होना चाहिए। दवा कंपनियों की मुनाफे की हवस और चिकित्सकों का बढ़ता लालच इसमें बाधा बने हुए हैं। चिकित्सक सर्दी-ज़ुकाम और पेट के साधारण रोगों तक के लिए बड़ी मात्रा में एंटीबायोटिक दवाएँ दे देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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