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Oct 20, 2014

परंपरा

छत्तीसगढ़ में राउत नाचा 

छत्तीसगढ़ के राउत नाचा अपनी बहुरंगी नृत्य छटा एवं नयनाभिराम छवि की वजह से छत्तीसगढ़ में नहीं अपितु देश भर में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह महज पर्व ही नहीं अपितु जीवन की प्रमाणिक अभिव्यक्ति है जो वर्ष भर सपुत्र के रुप में बंधी रहती है और वर्षांत में अपने सामूहिक उल्लास का प्रकटीकरण गली-गली, घर-घर और बाजार के चौपालों में देख पाते हैं।
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में जहाँ टीवी प्रिंट मीडिया व सायबर युग में सिमटकर लोक संस्कृति अपनी अस्मिता व अस्तित्व के लिए संघर्षरत है वहीं अनेक लोक परम्पराएँ अपने जीवंतरूप में आज भी विद्यमान हैं। वहीं लोकनृत्य में पंडवानी, गम्मत व राउत नाचा जीवन में नया प्राण फूंक रहा जिनमें रावत नाच, शौर्य और संस्कृति को अपने में समेट कलात्मकता का परिचय दे रहा है।
सिर में धोती का पागा उसमें लगे मोर पंख की कलगी मुँह में पीली मिट्टी, आंखों में काजल, गाल में डिठौनी माथे पर चंदन का टीका और कपड़े के रंगीन जूते मोजे बंधी गोटिस और घुँघरु घुटने के ऊपर तक कसा हुआ चोलना व उस पर फुंदरीकमीज की जगह पूरे आस्तीन का रंगीन सलमा सितारा युक्त आस्किट जिसके ऊपर कौडिय़ों से बनी पेटी एवं बाहों में कौडिय़ां बाँधे, तेंदू की लाठी एक हाथ में दूसरे हाथ में सुरक्षा रूपी लोहे या तांबे की फरी जब रावत चलता है तो ऐसा लगता है मानो युद्ध के लिए श्रीकृष्ण की सेना रथ पर चल पड़ी हो। उनके थिरकते पांव से सारा जहाँ रूक जाता है। वे नृत्य में अपनी लाठी द्वारा शौर्य प्रदर्शन करते हैं और अपने आंगन में देवउठनी एकादशी के दिन से दस्तक देते है।
राउत नाचा की उत्पत्ति का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन पौराणिक गाथाओं के आधार पर जो धारणा प्रचलित है उसके अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन श्री कृष्ण ने कंस के अत्याचार से पीडि़त जनता को मुक्ति दिलाई तब से यदुवंशियों ने मुक्ति का पर्व मनाते हुए उत्सव का आयोजन किया। सम्भवत: तभी से रावत नाच की शुरुआत हुई।
श्रीमद्भागवत कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने यमुना के तट पर बालुका लिंग की स्थापना की, उसी अवसर पर यदुवंशियों ने 7 दिन तक नृत्य किया। रावत नाच उद्भव के मूल में पुराण सम्मत यह घटना ही सर्वमान्य हैं रावत नाच अपने प्रारंभिक रूप से अब तक जीवित है परंतु आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से अछूता नहीं है। गाँव में जब गोवर्धन पूजा मनाते है उसी दिन राउत नाचा पर्व की शुरुआत होती है। इस अवसर पर सभी ग्रामवासी गोवर्धन पर्वत की मूर्ति पवित्र गोबर से बनाकर उसे सिलयारी घास गेंदाफूल व धान से सजाते संवारते हैं और पूजा अर्चना करते है । जिस बात का प्रतीक श्रीकृष्ण के नेतृत्व में अन्यायी शासक घमण्डी इन्द्र का विद्रोह कर पहाड़ मैदान व चारागाह की पूजा की अपनी इसी पशुधन पर्वत व चारागाह के लिए यादव ने इन्द्र व क्रूर शासक कंस से युद्ध किया। यह युद्ध किन्हीं दो शासकों के मध्य न होकर अन्यायी शासक के खिलाफ (विरुद्ध) सामाजिक युद्ध था जो कि शोषण व अत्याचार के विरुद्ध था।
यादव ही संघर्ष गाथा अनुत्पादक तथ्य और सामाजिक श्रम की उपयोगिता से जुड़ी है। यह संघर्ष किसी एक विशेष जाति का नहीं अपितु सभी वर्गों की मुक्ति के लिए था।
आज यह नाच छत्तीसगढ़ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। जब भी कभी रावत नाच हमारे गली मुहल्ले से गुजरता है तब उनकी पारम्परिक वेशभूषा जो कि सिर से पैर तक आकर्षित नैनाभिराम वस्त्र धारण किये गुरदुम बाजा के  थाप पर उनके पैर थिरकते व एक लय में ऊपर उठते हैं। जिनके हाथों में ढाल सुरक्षा रूपी फरी तथा दूसरे हाथ में तेंदूसार की लाठी 40 या 80 के समूह में लोग रहते हैं के समूह में लोग रहते है तथा एक या दो नर्तक भी हाते है। बाजों की आवाज से संयुक्त रूप से जोश एवं आवेश साहस व उत्सव न केवल रावत के मन में अपितु दखने वाले के मन में उत्सव का संचार होता है।
राऊत नाच के समय बोलने वाले दोहे हास्य व्यंग्य एवं विभिन्न रसों के अलावा सूर, तुलसी, कबीर के ज्ञानमार्ग शामिल हैं।
राऊत नाचा के दोहे में नीति धर्म एवं ज्ञान से संबंधी दोहे शामिल हैं इसके अलावा इनके पारम्परिक एवं मौलिक दोहों की भी संख्या फिर भी कम नहीं है। इनके दोहों हास्य, व्यंग्य, करुण, रौद्र शांत तथा देवी देवताओं से संबंधित एवं देश प्रेम तथा जन सामान्य के प्रति विशेष नीति एवं ज्ञान से परिपूर्ण होता है। जिसके माध्यम से जनता को अपनी ओर आकर्षित करने तथा जोर से तेन्दुसार की लाठी ऊपर किये हुए दोहे को उच्चारित करके बोलते है।
इस प्रकार रावत नाच में इन विभिन्न प्रकार के दोहे का समन्वय कर नाच को रोचकता एवं चमत्कृत प्रदान करने के लिए रावत लोग  ने विभिन्न प्रकार के दोहे का सृजन किया है जिससे दर्शक के मन को उत्साह वर्धन कर रस मग्न कर दे साथ ही उसमें व्यंग्य के छींटे भी होते है जिसके माध्यम से बच्चों के मन में खुशी का संचार होता है और वे रावत नाच में अपनी भागीदारी का निर्वहन करते है।
दोहे के द्वारा व्यक्ति के एक नए ज्ञान का आभास होता है एवं मन में तर्क वितर्क भी पनपते है वास्तव में यदि गहराई से देखा जाए तो रावत नाच में दोहे  के माध्यम से नाच में सेाने पर सुहागा का कामकरती है जो जन सामान्य को अपनी ओर सहज ही ढंग से खिंचता चला जाता है इसकी प्रासंगिकता का वर्णन करना साहित्यकारों के बस की बात नहीं है।
गाँव में अन्य जातियों की तरह रावत जाति संस्कृति की अपनी अलग विशेषता है, वेदों में उल्लेख होने के कारण इन्हें वैदिक जाति कहते है ये कला प्रेमी, लोकसंस्कृति के माध्यम से पौराणिक संस्कृति को जीवित रखे हुए है।
अहीरों के गौरवशाली परंपरा रीरिवाज के सुनहरे पन्ने के इतिहास में गो-पालन प्रमुख रहा, इनके अराध्य देव श्रीकृष्ण थे। यदुवंशी अपनी गाय भैंसों को विभिन्न रोग व बाधाओं से सर्वथा मुक्त रखने के लिए दूल्हा देव, ठाकुर देव, सड़हा देव, गोसाई देव व अपने पूर्वजों से जनित भूत प्रेत, बैताल, अखरादेव, छट कमानिय को प्रमुख श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। अहीरों में पूजा का विशेष प्रचलन है, पुत्र की शादी या संतान उत्पत्ति पर बकरे या मुर्गे की मान्य देवों की दुगुनी संख्या में बलि दी जाती है, घर की किसी कोने में गड्ढा खोदा जाता है जिसे सगरी कहते हैं किसी विशेष दिवस पर समाज के लोग एकत्रित होकर पूजा पाठ कर बलि देते हैं।
हरेली के दिन गाय भैंस को स्नान करा पूजा करते है रावत लोग जिनकी गाय-भैंस चरानी होती है उनके द्वारा देशमुख की शाख या नीम की पत्ती खोंच का प्रचलन है ये जन्माष्टमी को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाते है। श्रीकृष्ण की पूजा भक्ति भाव से विभोर होकर करते है। मटकी फोडऩा मंदिर जाना व दही व हल्दी एक दूसरे पर खुशियों से मस्त होकर डालते हैं। दीपावली के पर्व के पश्चात का कार्तिक एकादशी, कार्तिक पूर्णिमा, कार्तिक पुत्री, देवउठनी, जेठानी, छेरछेरा, यदुवंशियों के संस्कृति के विशेष महत्त्व को प्रतिपादन करते हैं। देवारी शौर्य वीरता का प्रतीक है। देवारी के समय अपने कुल देवता को घर के भीतर पूजते हैं। देव उन लोगों को आशीर्वाद देने आते हैं तो उन पर काछन चढ़ता है सिर पर साज श्रृंगार की पगड़ी मोर पंख धारण करते हैं। रावत संस्कृति सिर्फ चरवाही और देवारी पर नाचने कूदने की संस्कृति मात्र नहीं है। राजनीति में राजा के बाद दूसरा राजा या सेना का सेनापति को रावत कहा जाता है। इन्हें चरवाहा बताकर व मजदूर बताकर उनकी संस्कृति की गरिमा को आघात पहुंचाया जा रहा है।
रावत लोग अपनी ही बिरादरी में उत्सव व त्यौहार में खान-पान का प्रचलन चलता है। जिससे सामाजिक व्यवहार बना रहे। कृष्ण युगनी इतिहास में पशु बलि प्रथा का विधान मिलता है। इस प्रकार इनके खान-पान में सामाजिक सद्भावना जुड़ी रहती है। रावत समाज में मुख्यत: निम्न रिवाज व संस्कार है-  जन्म से क्षीर कर्म, छट्ठी मनाना, मुंडन, नामकरण, अन्नप्रासन, अक्षरज्ञान, स्कूल भेजना, अस्त्र-शस्त्र संचालन, नृत्य कला, विवाह, गौना कराना, धार्मिक पर्व, आरती पूजा, विवाह भोज, मृत्यु भोज इत्यादि प्रमुख रीति रिवाज व संस्कार है।

इस संस्कृति की गरिमा एवं स्वयं भगवान कृष्ण है जिसने गाय चराई, कंसवध, शिशुपाल किया महाभारत के द्वारा पूंजीवादी शासन का अंत और गीता के उपदेश द्वारा दिया। हर धर्म के बच्चे बड़ों में धार्मिक दार्शनिक व समाजवादिता का परिचय दिया ताकि भारत जैसा कृषि प्रधान देश फिर से समृद्ध हो सके। (यादव समाज पर आधारित ब्लॉग यदुवंश से)

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