October 20, 2014

सीखने की समझ

सीखने की समझ
- विजय जोशी

महात्मा गाँधी ने कहा है- लिव एज एफ यू हेव टू डाय टूमारो एवं लर्न एज एफ यू हेव टू लिव फार एवर। अर्थात जियो ऐसे जैसे कल मर जाना हो और सीखो ऐसे जैसे अनंतकाल तक जीना हो। सीखने की कोई उम्र भी नहीं। हम जीवनपर्यन्त छात्र ही रहते हैं और जब सोच लिया कि अब ज्ञानी हो गए, वहीं से हमारे सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। आगे कुछ भी नहीं मात्र एक गहरी खाई के।
प्रसिद्ध सूफी संत जू - उल - नून एक बार नमाज अता करने के पूर्व वजू के लिए नज़दीक की एक नदी पर गए ,तो देखा सामने से एक बेहद खूबसूरत औरत आ रही थी। उस महिला ने भी उन्हें देखा। उन्हें लगा वह प्रभावित है और कुछ कहना चाहती है।
उन्होंने पूछा- ऐ हुस्न की मलिका आप कुछ कहना चाहती हैं।
महिला ने कहा - हाँ, मै दूर से देख रही थी कि आप मुझे गौर से देख रहे हैं। तब मुझे लगा कि कोई दीवाना है, लेकिन पास आते मुझे लगा कि आप आलिम - फाजि़ल यानी विद्वान हैं। लेकिन अब लग रहा है कि आप शायद आरिफ यानी परवरदिगार के भक्त हैं। और यदि सच कहूँ आप से बात करने के बाद अब लग रहा कि आप तो इन तीनों में से कुछ भी नहीं है।
बात बहुत सीधी- सी है। यदि आप दीवाने होते तो वजू नहीं करते। आलिम होते तो पराई औरत पर नजर नहीं डालते और उसके भक्त होते तो मुझसे बात नहीं करते। कुल मिलाकर बात का लुब्बे -लुबाब सिर्फ इतना है कि शायद आप इन में से कुछ नहीं हैं। अब आप खुद तय करें कि आप क्या हैं।
संत का सिर शर्म से झुक गया। एक अदना -सी औरत ने उन्हें जीवन की जंग जीने का कितना बड़ा सूत्र इतनी सरलता और सहजता से समझा दिया था।
इसलिए याद रखिए सीखने की समझ एक ऐसा अहंकार रहित निस्वार्थ भाव है जो आपके व्यक्तित्व को न केवल निर्मल करती है अपितु चरित्र को नई उँचाई प्रदान करती है। आपके ज्ञान रूपी कैनवास पर सुनहरे रंग भरते हुए उसे इन्द्रधनुषी रंगीन आभा प्रदान करती है।

शान्ति की खोज
शान्ति एक ऐसी चाह है जिसकी उधेड़बुन में हम तमाम उम्र लगे तो रहते हैं, लेकिन उसके मार्ग पर चलना तो दूर, चलने की मानसिकता से भी परहेज करते हैं। दरअसल शान्ति कोई भौतिक वस्तु नहीं, जिसे जब मन चाहा खरीद कर पा लिया। यह तो अंतस् की अनुभूति है, जिसमें व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व में तमाम अच्छी बातों, आदतों एवं सद्गुणों को गृहण करते हुए उन पर पूरी श्रद्धा, शिद्दत और निष्ठा से परिश्रम करना पड़ता है और यदि एक बार इसे पा लिया तो जीवन और आनंद एक दूसरे के पर्याय हो जाते हैं। यह तो फूल की मानिंद एक ऐसा एहसास है जिसकी यदि पँखुरी झर भी जा तो खुशबू बनी रहती है और मन में आनन्द की नदी बहती है। एक बार अशांत चित्त व्यक्ति कामना -पूर्ति हेतु एक महात्मा के पास पहुँचा।
महात्मा ने पूछा- वत्स! कहो क्या बात है ?
व्यक्ति ने कहा- गुरुदेव मेरा मन बड़ा अशांत रहता है। मुझे शान्ति चाहिए। कोई उपाय बताइये।
महात्मा ने कहा- पुत्र तुम्हें कभी भी शान्ति की प्राप्ति नहीं होगी।
व्यक्ति ने आश्चर्यपूर्वक पूछा- भला क्योंमेरी चाह तो अच्छी और सच्ची है।
महात्मा ने कहा- नहीं यह चाह सच्ची कतई नहीं।
भला क्यों? - व्यक्ति ने फिर पूछा।
महात्मा ने कहा- देखो तुम्हारी कामना  ‘मुझे शान्ति चाहिए’  में तो पहला शब्द ही पूरी तरह गलत है मुझे तो अहं यानी अहंकार  का प्रतीक है। पहले उससे निजात पाओ। तुम जब तक अपना स्व, अहं यानी अहंकार तिरोहित नहीं करोगे, शान्ति कहाँ से प्राप्त होगी।
ठीक। शान्ति चाहिए। अब तो ठीक है।
नहीं, अब भी नहीं। चाह तो कामना है। मोह और लोभ की प्रतीक है। जब तक चाह, कामना या इच्छा के पराधीन रहेंगे कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो सकेगी।
तो ठीक है, तो अब चाहिए शब्द भी हटाता हूँ।  
तो अब तो केवल शान्ति ही शेष है ,जो तुम्हारे अपने ही पास थी, लेकिन जब तक तुम अहं व लोभ के बन्धन में जकड़े रहे ,वह भी इन्हीं के मध्य कैद थी। इन दोनों के हटते ही वह भी स्वतंत्र होकर स्वमेव तुम्हें प्राप्त हो गई।
इसलिए यह कहा भी गया है कि -
 जंगल-जंगल ढूँ रहा मृग, अपनी ही कस्तूरी
कितना मुश्किल है तय करना, खुद से खुद की दूरी
याद रखिशान्ति का भाव वह ध्यात्मिक सुख है, जो एक बार प्राप्त हो गया तो जीवन स्वर्ग समान है, वरना सारा जीवन, कष्ट, कठिनाई से जूझते जीवित नरक के समान है।


सम्पर्क: 8/ सेक्टर- 2, शान्ति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641, Email-v.joshi415@gmail.com

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